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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

सरस्वती पत्रिका

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महावीर प्रसाद द्विवेदी (1903–1920), पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, ठाकुर श्रीनाथ सिंह, देवीदत्त शुक्ल साहित्यिक पत्रिका मासिक इण्डियन प्रेस, प्रयाग चिन्तामणि घोष yes 1900 1 1 भारत प्रयाग हिन्दी सरस्वती हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध रूपगुणसम्पन्न प्रतिनिधि पत्रिका है। इस पत्रिका का प्रकाशन इण्डियन प्रेस, प्रयाग से सन 1900 ई० के जनवरी मास में प्रारम्भ हुआ था। 1900 ई. में प्रकाशित इस पत्र का प्रथम वर्ष प्रकाशन एक सम्पादक मण्डल द्वारा हुआ था। इसमें जगन्नाथदास 'रत्नाकर', राधाकृष्णदास, श्यामसुन्दर दास, किशोरीलाल गोस्वामी तथा कार्तिक प्रसाद खत्री शामिल थे। इस पत्रिका का नामकरण चिन्तामणि घोष ने किया था।साहित्य की 'सरस्वती' के इतिहास में 20 अगस्त newsdaily24 20 August 2022 https://newsdaily24.news.blog/2022/08/20/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF/ newsdaily24 2022 4 July 2026 32 पृष्ठ की क्राउन आकार की इस पत्रिका का मूल्य 4 आना मात्र था। 1903 ई० में महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक हुए और 1920 ई० तक रहे। इसी बीच 1910 तथा 1919 ई. में द्विवेदी जी के अस्वस्थ होने पर देवीप्रसाद शुक्ल ने इसका कामकाज देखा। इसका प्रकाशन पहले झाँसी और फिर कानपुर से होने लगा था।Shukla Sudha Mahila Patrakarita: Bestseller Book by Sudha Shukla: Mahila Patrakarita Prabhat Prakashan 1 January 2012 978-93-5048-118-9 https://books.google.co.in/books?id=0FSDBQAAQBAJ&lpg=PT160&ots=k2YQ993sEm&dq=%25E0%25A4%25B6%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A5%2520%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%25B9%2520%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%2580&pg=PT163#v=onepage&q=%25E0%25A4%25B6%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A5%2520%25E0%25A4%25B8%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%25B9%2520%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%2580&f=false hi 4 July 2026 श्यामसुन्दर दास (1901-1902 ई.) के बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा उनके पश्चात् 1920 से 1925 ई. तक इसका सम्पादन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी तथा देवीदत्त शुक्ल ने किया। वस्तुतः इस अवधि में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी दो बार सम्पादक बने थे। इस पत्रिका के अन्य सम्पादक समय-समय पर रहे हैं- ठाकुर श्रीनाथ सिंह, उमेश चन्द्र देव, हरिकेशव घोष, देवीदयाल चतुर्वेदी, श्रीनारायण चतुर्वेदी, श्रीमती शीला शर्मा, निशीथ कुमार दास इत्यादि। इसके मुखपृष्ठ पर काशी नागरी प्रचारिणी सभा का नाम होता था जो 1905 ई० में मुखपृष्ठ से हटा दिया गया। 1982 ई. में इस पत्रिका का प्रकाशन बन्द हो गया। सन २०२० से पुनः प्रकाशित हो रही है। सरस्वती पत्रिका के संपादक और उनका संपादन काल क्रम संपादक सम्पादन काल (ई०)1 जगन्नाथदास रत्नाकर 1899 में 2 श्याम सुन्दर दास 1899 से 1902 के मध्य 3 राधाकृष्ण दास 1900 से 1902 के मध्य 4 कार्तिक प्रसाद खत्री 1900 से 1902 के मध्य 5 किशोरी लाल गोस्वामी 1900 से 1902 के मध्य 6 महावीर प्रसाद द्विवेदी 1903 से 1920 तक 7 कामताप्रसाद 'गुरु' 1920 में 8 पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी 1921 से 1928 के मध्य 9 देवीदत्त शुक्ल ठाकुर 1921 से 1946 के मध्य 10 हरिकेशव घोष (व्यवस्थापक इण्डियन प्रेस) 1926 में 11 उदयनारायण वाजपेयी (सहायक संपादक) 1928 से 1933 के मध्य 12 गणेश शंकर 'विद्यार्थी' 1928 से 1933 के मध्य 13 हरिभाऊ उपाध्याय 1928 से 1933 के मध्य 14 देवी प्रसाद शुक्ल 1928 से 1933 के मध्य 15 शंभु प्रसाद शुक्ल 1928 से 1933 के मध्य 16 ठाकुरप्रसाद सिंह 1928 से 1933 के मध्य 17 श्रीनाथ सिंह 1934 में 18 देवीदयाल चतुर्वेदी ‘मस्त’ 1935 से 1955 के मध्य 19 लल्लीप्रसाद पांडेय, उमेश चंद्र मिश्र (संयुक्त सम्पादक) 1935 से 1945 के मध्य 20 श्रीनारायण चतुर्वेदी "भइया साहब"सरस्वती : द्विवेदी, महावीरप्रसाद : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive Internet Archive 23 October 2016 https://archive.org/details/dli.ministry.30516/18477.11574-%2520%2528part-1%2529/ Internet Archive 2016 4 July 2026 1955 से 1976 के मध्य 21 निशीथ राय 1977 से 1980 तक पुनः प्रकाशन १९७५ में सरस्वती का प्रकाशन बन्द हो गया था। दिसम्बर २०१७ में समाचार आया कि सरस्वती पुनः प्रकाशित होगी लेकिन कुछ कानूनी अड़चनों से यह सम्भव नहीं हो सका। अन्ततः २०२० में इसका पुनः प्रकाशन इंडियन प्रेस, प्रयाग से हो रहा है और इसके सम्पादक देवेन्द्र शुक्ल बनाये गये।प्रयागराज से 40 साल बाद फिर निकली 'सरस्वती की साहित्य धारा' 17 अक्टूबर 2020 को 'हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज' के 'गांधी सभागार' में उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष श्री हृदय नारायण दीक्षित के द्वारा 'सरस्वती' पत्रिका का लोकार्पण हुआ। सरस्वती पत्रिका की लेखनी में बनाए रखें गुणवत्ता : विधानसभा अध्‍यक्ष 2022 से रविनन्दन सिंह व अनुपम परिहार इसका सम्पादन कर रहे हैं। सरस्वती का नया अंक नए कलेवर के साथ आया सामने, साहित्यिक उत्कृष्टता और गुणवत्ता से भरी है पत्रिका पत्रिका नियमित प्रकाशित हो रही है। वर्तमान में ‘सरस्वती’ पत्रिका त्रैमासिक पत्रिका है। योगदान सरस्वती हिन्दी नवजागरण के अपनी शक्ति थी। नागरी लिपि और हिंदी प्रचार एवं प्रसार का आरम्भ सरस्वती पत्रिका से ही माना जाता है। नियमित रूप से संपादित किए टिप्पणियों का लेखन सबसे पहले सरस्वती ने हीं प्रारम्भ किया था। 'सरस्वती' उस दौर की अकेली पत्रिका है जिसने बहुत ही का समय में न केवल साहित्य जगत में बल्कि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अपनी गहरी पैठ बनाई। सरस्वती पत्रिका के एक अंक के संपादकीय में इसके उद्देश्य एवं महत्ता के संबंध में संपादक ने लिखा है- "सरस्वती में केवल उत्कृष्ट कोटि की रचनाओं को ही महत्त्व दिया जाएगा और उनकी उत्कृष्टता का निर्णय लेखकों की प्रसिद्धि के आधार पर नहीं बल्कि रचना के अपने वैशिष्ट्य के आधार पर किया जाएगा।" इस पत्रिका की मुख्यप विशेषता यह भी रही है कि इसमें यथासंभव लगभग सभी विधाओं जैसे- कविता, कहानी, एकांकी, समालोचना और पुस्तक परिचय, कला-सभ्यता, इतिहास, लोकगीत आदि सांस्कृतिक विषयों पर लेख तथा अन्यय भाषाओं के साहित्य के अनुवाद को प्रत्येक अंक में लाने का भरसक प्रयास किया। सरस्वाती पत्रिका ने न केवल हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में, अपितु समग्र हिंदी साहित्य के विकास की दृष्टि से कई मानदंड स्थानपित किए। इस पत्रिका के माध्यषम से हिंदी के मानक रूप गढ़े गए और हिंदी साहित्य को परिष्कृषत रूप में समृद्ध किया गया। पत्रिका के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए यदि इसके शुरुआती अंकों को देखा जाय तो इसने अपने उद्देश्यों के प्रति हमेशा सजगता बरती ही साथ ही उसका सफल निर्वहन भी किया है। 1903 ई. में महावीर प्रसाद द्द्विवेदी ने सरस्वती का सम्पादन का कार्य संभाला। एक ओर भाषा के स्तर पर और दूसरी ओर प्रेरक बनकर मार्गदर्शन किया। इसके माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय चेतना को स्वर प्रदान किया। उन्होंने भाषा को समृद्ध करके नए साहित्यकारों को राह दिखायी। सरस्वती राष्ट्रीय जागरण की मुख्य पत्रिका बन गयी थी। इस काल में साहित्यिक मूल्यों के विकास पर डॉ0 रामविलास शर्मा लिखते हैं, - "इसके लेखक विज्ञान सम्बन्धी लेखों द्वारा समाज के पुराने विचार बदलकर नई सामाजिक चेतना का प्रसार करना चाहते थे तथा साहित्य द्वारा जनता के पुराने संस्कार बदलकर उसका मानस नए सांचे में ढालना चाहते थे।" डॉ० रामविलास शर्मा ने ब्रजभाषा के जगह हिंदी की खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करने का श्रेय सरस्वती के सम्पादक महावीर प्रसाद द्विवेदी को दिया है।सरस्वती पत्रिका का हिन्दी भाषा के विकास में योगदान आचार्य द्विवेदी ने देशव्यापी भाषा की आवश्यकता तथा उसके प्रभाव को स्पष्ट करते हुए 'देशव्यापक भाषा' पर लेख लिखा। हिंदी भाषा राष्ट्रभाषा होने की इसलिए भी अधिकारी है क्योंकि उसमें दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपनी प्रकृति के अनुसार तराश कर पचाने की शक्ति सबसे अधिक है I द्विवेदी जी के अतिरिक्त सरस्वती के दूसरे लेखक भी हिंदी भाषा को ही राष्ट्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास कर रहे थेI आचार्य द्विवेदी ने देवनागरी लिपि को निर्दोष, सरल तथा पूर्ण बताकर हिंदी भाषी विद्वानों से रागद्वेष मुक्त होकर अपनाने की अपील कीI लिपि की एकता से विभिन्न भाषाभाषी लोगों में परस्पर सहानुभूति बढ़ेगी, विचारों का आदान-प्रदान होगा, परायेपन का भाव कम होगा और सबके मन में यह भाव पैदा होगा कि यदि हम भिन्न-भिन्न भाषा बोलते हैं तब भी हम सब एक ही देश के निवासी हैंI सरस्वती हिंदी की एकमात्र ऐसी पत्रिका थी जिसने भारत सरकार की दोगली भाषा-नीति की कटु आलोचना की I सरस्वती ने शिक्षा के माध्यम के रूप में देशी भाषाओं की अपनाने के लिए संघर्ष किया। 1913 में सरस्वती में लिखा : यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। सरस्वती के लेखकों ने भाषा के लिए व्याकरण पर बल देकर हिंदी भाषा के स्वरूप को स्थिर करने तथा उसके प्रयोग में एकरूपता लाने का प्रयास किया I हिंदी भाषा को देश व्यापक भाषा बनाने के लिए, उसे ज्ञान-विज्ञान, सरकारी दफ्तरों, कचहरियों तथा शिक्षा के माध्यम के रूप में स्वीकार करने के लिए सरकार से संघर्ष तथा जनता से अपील की। हिंदी भाषा के प्रचार के लिए, शिक्षित लोगों को हिंदी में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया I ‘सरस्वती’ के माध्यम से द्विवेदी जी ने रीतिवाद का जमकर विरोध किया। वे रीतिकालीन शृंगारिकता एवं नायिका-भेद के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि रस, भाव, अलंकार, छंद-शास्त्र और निरा नायिका-भेद का वर्णन करने से मानव-सभ्यता (जाति) का विकास संभव नहीं है। इसीलिए वे हमेशा कविता को रीतिवादी कूप से निकालकर काव्य-विषय के विस्तार के पक्षधर थे। एक प्रकार से देखें तो सरस्वती पत्रिका समकालीन रीतिवादी धारा के विरोध में और ब्रज भाषा के स्थान पर खड़ी बोली हिंदी के समर्थन में एक संघर्षरत पत्रिका थी। द्विवेदी जी के संपादन-काल में समाज-सुधार, स्त्री-शिक्षा, एवं बाल-साहित्य जैसे विषयों को भी ‘सरस्वती’ में विशेष स्थान दिया गया। नवजागरण की चेतना का प्रसार एवं उसे जनसाधारण तक पहुंचाने में 'सरस्वती' एवं महावीर प्रसाद द्विवेदी, दोनों ने संबल का काम किया। हिंदी साहित्य की सामयिक अवस्था का चित्रण करने एवं उसका गहरा प्रभाव डालने के लिए ‘सरस्वती’ में व्यंग्य-चित्रों को भी यथोचित स्थान मिला। यहाँ तक कि आधुनिक हिंदी कहानी का उदय एवं आधुनिक खड़ी-बोली कविता को प्रचार-प्रसार एवं प्रतिष्ठा भी सरस्वती से ही मिली। खड़ी बोली हिंदी को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना इस पत्रिका की नायाब उपलब्धि है। मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, राय देवी प्रसाद, गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही', हरिऔध, नाथू राम 'शंकर' शर्मा, रामनरेश त्रिपाठी आदि कवियों की रचनाएँ प्रकाशित करके द्विवेदी जी ने यह साबित कर दिया कि खड़ी बोली हिंदी में भी उच्च कोटि की कविताएं लिखी जा सकती है। कविता के साथ-साथ कहानी विधा के विकास में भी इस पत्रिका की महती भूमिका रही है। बंग महिला की 'दुलाई वाली', चंद्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था', विश्वंभर नाथ शर्मा की 'रक्षाबंधन', प्रेमचंद की 'सौत', जैसी महत्त्वपूर्ण कहानियाँ द्विवेदी जी के ही सम्पादन में प्रकाशित हुई। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का निबंध 'कविता क्या है ?', कामता प्रसाद गुरु का 'हिंदी व्याकरण', मैथिलीशरण गुप्त का 'कविता किस ढंग की हो', एवं सरदार पूर्ण सिंह द्वारा लिखे गए लाक्षणिक निबंध इसी अवधी की देन है। गौर करें तो उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, जीवनी, यात्रा-साहित्य एवं डायरी जैसी विधाओं के अतिरिक्त पुस्तक-समीक्षा के विकास में भी 'सरस्वती' की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मैथिलीशरण गुप्त, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, कामता प्रसाद गुरू, प्रेमचंद, लोचन प्रसाद पाण्डेय आदि ऐसे कई लेखक हैं जो ‘सरस्वती’ पत्रिका के द्वारा ही हिंदी जगत में परिचित एवं अपनी पहचान बना सके। द्विवेदी जी के संपादन काल में ‘सरस्वती’ में एक भी ऐसा लेख प्रकाशित नहीं हुआ जिससे समाज पर बुरा प्रभाव पड़े। द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के द्वारा हिंदी साहित्य में सुरुचि का प्रसार किया और साहित्य के क्षेत्र को खूब विस्तृत किया।महावीर प्रसाद द्विवेदी और 'सरस्वती' सरस्वती में प्रकाशित है प्रमुख हिंदी कविताएं कविता के क्षेत्र में ब्रजभाषा के युग में सरस्वती में सर्वप्रथम संस्कृत कविताओं का अनुवाद तथा कुछ खड़ी बोली की कविताएं भी प्रकाशित हुईं। इसमें पहली खड़ी बोली की कविता पं० किशोरी लाल गोस्वामी की और दूसरी खड़ी बोली की कविता महावीर प्रसाद द्विवेदी की थी। क्रम संख्या कविता प्रकाशन वर्ष कवि 1 भौरा और कलीप्रेमापहार 1900 ई0 किशोरी लाल गोस्वामी 2 कोकिलाष्टक 1901 ई0 किशोर लाल गोस्वामी 3 सेवावृत्ति की विगर्हणा 1902 ई0 महावीर प्रसाद द्विवेदी 4 रहिमनविलास 1902 ई0 राधा कृष्ण दास 5 वर्षा ऋतु वर्णन 1903 ई0 श्रीधर पाठक 6 हेमन्त 1905 ई० मैथिलीशरण गुप्त 7 जलद आह्वान 1912 ई0 जयशंकर प्रसाद 8 स्वपन 1924 ई0 सुमित्रानंदन पन्त 9 मुस्कान 1924 ई0 सुमित्रानंदन पंत 10 पतझड़ 1924 ई0 सुमित्रानंदन पंत 11 वंदना 1932 ई0 भगवती चरण वर्मा 12 रूपराशि 1932 ई0 रामकुमार वर्मा 13 मधुशाला 1932 ई0 हरिवंशरायबच्चन 14 मुझ को न मिला है कभी प्यार 1933 ई0 जयशंकर प्रसाद 15 जरा 1933 ई0 उदय शंकर भट्ट 16 शतदल 1933 ई0 आरसी प्रसाद सिंह 17 लघुता की महिमा 1933 ई0 जगन्नाथ प्रसाद मिश्र ‘मिलिंद’ 18 पग ध्वनि 1934 ई0 हरिवंश राय बच्चन 19 जीवन संगीत 1934 ई0 शांतिप्रिय द्विवेदी 20 प्यार 1934 ई0 जयशंकर प्रसाद 21 भ्रमरी 1935 ई0 रामधारी सिंह दिनकर 22 खिलौने 1935 ई0 हरि कृष्ण प्रेमी 23 कामायनी 1936 ई0 जयशंकर प्रसाद 24 मेरे पावन मेरे पुनीत 1936 ई0 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 25 कलिका से कलिका की ओर 1936 ई0 माखनलाल चतुर्वेदी 26 सांध्यगीत 1936 ई0 महादेवी वर्मा 27 उच्छ्वास 1937 ई0 रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ 28 सम्राट एडवर्ड अष्टम के प्रति 1937 ई0 सूर्यकांत त्रिपाठी’निराला’ 29 नाविक 1938 ई0 जानकी वल्लभ शास्त्री 30 मुकमार्ग 1938 ई0 सुमित्रा कुमारी सिन्हा 31 उठ उठ री मानस की उमंग 1939 ई0 सोहन लाल द्विवेदी 32 मेरे पावन मेरे पुनीत 1939 ई0 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ 33 पपीहा 1940 ई0 भैरव प्रसाद गुप्त 34 श्रद्धांजलि 1948 ई0 सोहनलाल द्विवेदी 35 अंतिम प्रणाम 1948 ई0 भगवती चरण वर्मा 36 एक उर्मिला छंद 1953 ई0 केदारनाथ मिश्र  सरस्वती में प्रकाशित प्रमुख हिन्दी कहानियां क्रम संख्या कहानी प्रकाशन वर्ष कहानीकार 1 इन्दुमती 1900 ई0 किशोरी लाल गोस्वामी 2 चंद्रलोक की यात्रा 1900 ई0 केशव प्रसाद सिंह 3 मुक्ति का उपाय 1901 ई0 रवीन्द्र नाथ ठाकुर 4 गुलबहार 1902 ई0 पंडित किशोरीलाल गोस्वामी 5 प्लैग की चुड़ैल 1902 ई0 मास्टर भगवानदास 6 पंडित और पंडितानी 1903 ई0 गिरजा दत्त वाजपेयी 7 ग्यारह वर्ष का समय 1903 ई0 आचार्य रामचंद्र शुक्ल 8 दुलाई वाली 1907 ई0 बंग महिला 9 आश्चर्यजनक घंटी 1908 ई0 सत्यदेव प्रवाजक 10 कानों में कंगना 1913 ई0 राजा राधिका रमन सिंह 11 उसने कहा था 1915 ई0 चंद्रधर शर्मा गुलेरी 12 मिलन 1915 ई0 ज्वाला दत्त शर्मा 13 सौत 1915 ई0 मुंशी प्रेमचंद 14 रक्षा बंधन 1916 ई0 विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' 15 पंच परमेश्वर 1916 ई0 मुंशी प्रेमचंद 16 संतु 1918 ई0 बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ 17 प्रलय की रात्रि 1922 ई0 सुदर्शन 18 अनाश्रित 1927 ई0 इलाचंद्रजोशी 19 ज्योत्स्ना 1933 ई0 सुमित्रानंदन पंत 20 मग्न हृदय 1933 ई0 चतुरसेन शास्त्री 21 दस मिनट 1933 ई0 रामकुमार वर्मा 22 विवशता 1936 ई0 भगवतीचरण वर्मा 23 रंगीन सपना 1936 ई0 लक्ष्मी नारायण मिश्र 24 ईद और होली 1940 ई0 सेठ गोविंद दास 25 तीन बच्चे 1941 ई0 सुभद्रा कुमारी सिन्हा 26 पेशावर एक्सप्रेस 1942 ई0 पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ सरस्वती पत्रिका पर साहित्यकारों के विचार आचार्य शुक्ल जी ने- सरस्वती पत्रिका को ‘प्रारंभिक काल का विश्वकोश’ कहा है। गुलाबराय के अनुसार -"मेरे बाल्यकाल की अतिरिक्त ज्ञान की एक मात्र साधिका है।" डॉ० रामविलास शर्मा ने सरस्वती को 'हिंदी का जातीय पत्रिका और आदर्श पत्रिका' कहा है। सुमित्रानन्दन पन्त के अनुसार- "सरस्वती निःसंदेह तब की हिंदी की सर्वश्रेष्ठ और उच्चकोटि की मासिक पत्रिका है।" मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में – "उस समय सरस्वती ही एक ऐसी पत्रिका थी जिसे भारत के सभी प्रांतों में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।" डॉ० बच्चन सिंह के शब्दों में – "सरस्वती के माध्यम से द्विवेदी जी ने हिंदी साहित्य के गद्य और पद्य की विभाजक रेखा को मिटा दिया।" प्रख्यात कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनाओं को शुद्ध करके सरस्वती में पवित्रता के साथ प्रकाशित करते हैं। इससे इसके नाम की सार्थकता समझ में आती है। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' कहते थे कि सरस्वती वास्तव में ज्ञान का सागर है जो रचनाकारों को शुद्ध हिंदी लिखना सिखाती है। महादेवी वर्मा ने सरस्वती पत्रिका को हिंदी साहित्य का आधार बताया था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि सरस्वती पत्रिका के जरिए मुझे हिंदी की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं अगले जन्म में भी इसी रूप में हिंदी की सेवा करना चाहता हूँ। सन्दर्भ इन्हें भी देखें नागरी प्रचारिणी पत्रिका - नागरीप्रचारिणीसभा की शोध पत्रिका इण्डियन प्रेस, प्रयाग नागरीप्रचारिणी सभा महावीर प्रसाद द्विवेदी बाहरी कड़ियाँ सरस्वती पत्रिका कविता कोश पर सरस्वती पत्रिका के सन १९१२ से लेकर सन १९२३ तक के अंक (डिजिटल रूप में) सरस्वती की कहानी (श्रीनारायण चतुर्वेदी) सरस्वती के आविर्भाव के समय हिन्दी की अवस्था (अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी) हिन्दी साहित्य में सरस्वती पत्रिका का योगदान (अंजू चतुर्वेदी) साहित्यिक पत्रकारिता : एक अन्तर्यात्रा (राजस्थान साहित्य अकादमी) साहित्‍यिक पत्र-पत्रिकाएँ श्रेणी:ऐतिहासिक हिन्दी पत्रिकाएँ श्रेणी:महावीरप्रसाद द्विवेदी