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गुरबाणी कीर्तन

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गुरबाणी कीर्तन सिख धर्म की प्रमुख धार्मिक साधना है। इसमें गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित बाणियों का रागों के अनुसार गायन किया जाता है। कीर्तन को सिख धार्मिक जीवन का हृदय माना जाता है, क्योंकि यह भक्तों को ईश्वर से जोड़ने तथा आध्यात्मिक शांति प्रदान करने का माध्यम है। परिभाषा और महत्व गुरबाणी कीर्तन का अर्थ है - गुरुओं के वचनों का गायन। इसे प्रायः रागी (कीर्तन करने वाले गायक) स्वर्ण मंदिर या अन्य गुरुद्वारों में सुबह से रात्रि तक प्रस्तुत करते हैं। माना जाता है कि कीर्तन के माध्यम से भक्त का मन नाम सिमरन में लीन होता है और उसे ईश्वर की अनुभूति होती है। इतिहास सिख धर्म में कीर्तन परंपरा का प्रारम्भ गुरु नानक देव से हुआ। उन्होंने ईश्वर की भक्ति और समाज में समानता का संदेश संगीतमय शब्दों में दिया। आगे चलकर गुरु अर्जुन देव ने गुरु ग्रन्थ साहिब का संकलन किया, जिसमें विभिन्न संतों और गुरुओं की वाणियों को संगीतात्मक ढंग से संकलित किया गया। इससे गुरबाणी कीर्तन की परंपरा और संगठित रूप में विकसित हुई। राग और संगीत गुरबाणी कीर्तन का विशेष पक्ष इसका भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित होना है। गुरु ग्रन्थ साहिब की बाणियों को 31 प्रमुख रागों और उप-रागों में विभाजित किया गया है। रागियों को इन रागों का ज्ञान होना आवश्यक है। कीर्तन में प्रायः निम्न वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है: तबला हारमोनियम तानपुरा ढोलकी मंजीरे और झांझ गुरुद्वारों में कीर्तन अमृतसर का स्वर्ण मंदिर गुरबाणी कीर्तन का प्रमुख केन्द्र है, जहाँ 24 घंटे रागी कीर्तन प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त दुनिया भर के गुरुद्वारों में प्रातःकालीन और संध्याकालीन कीर्तन एक नियमित परंपरा है। विशेष अवसरों, जैसे गुरुपर्व और अखण्ड पाठ, पर भी अखंड कीर्तन किया जाता है। प्रभाव गुरबाणी कीर्तन केवल धार्मिक साधना ही नहीं, बल्कि संगीत चिकित्सा (music therapy) के रूप में भी महत्वपूर्ण है। यह साधक को शांति, अनुशासन और भक्ति की अनुभूति कराता है। सिख परंपरा के अनुसार कीर्तन आत्मा को शुद्ध करने और ईश्वर से सीधा संवाद स्थापित करने का साधन है। इन्हें भी देखें सिख धर्म गुरु ग्रन्थ साहिब नाम सिमरन कीर्तन भक्ति आन्दोलन श्रेणी:सिख धर्म श्रेणी:संगीत श्रेणी:धार्मिक संगीत