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411 समाचार
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पटना में दशहरा

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पटना में दशहरा में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की लम्बी पर क्षीण होती परम्परा है। शुरुआत इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1944 में मध्य पटना के गोविंद मित्रा रोड मुहल्ले से हुई थी। फिर वर्ष 1949 में लंगर टोली और वर्ष 1950 में पटना जंक्शन के पूजा पंडालों से जुड़े आयोजकों ने कमाल दिखाया. उन्होंने होड़ पैदा कर दी कि देखें कौन कितने बड़े कलाकारों को अपने मंच से जोड़ पाता है। फिर तो पूर्वी पटना के मारूफ़गंज से लेकर पश्चिमी पटना के बोरिंग रोड तक छोटे-बड़े संगीत समारोहों का तांता-सा लगने लगा। धुरंधर संगीतज्ञों के साथ-साथ बड़े क़व्वाल और मुकेश या तलत महमूद जैसे गायक भी यहाँ से जुड़ते चले गए। 1950 से लेकर 1980 तक तो यही लगता रहा कि देश के शीर्षस्थ संगीतकारों का तीर्थ-सा बन गया है पटना। भूतो न भविष्यति वाली दुर्लभ संगीत प्रस्तुतियों वाला वह कालखंड भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय माना जाएगा। सितार, सरोद, तबला, शहनाई, घुंघरू और कंठ-स्वर की उस कलात्मक पराकाष्ठा की तो अब याद भर बाकी रह गई है। डीवी पलुस्कर, ओंकार नाथ ठाकुर, भीमसेन जोशी, अली अकबर ख़ान, निखिल बनर्जी, विनायक राव पटवर्धन, पंडित जसराज, कुमार गंधर्व, बीजी जोग, अहमद जान थिरकवा, बिरजू महाराज, सितारा देवी, किशन महाराज, गुदई महाराज, बिस्मिल्ला ख़ान, हरिप्रसाद चौरसिया, शिवकुमार शर्मा ... बड़ी लंबी सूची है। सिर्फ़ यही जान लें कि पंडित रविशंकर और उस्ताद अमीर ख़ान को छोड़कर बाक़ी प्रायः सभी नामी संगीतज्ञ उन दिनों पटना के दशहरा संगीत समारोहों की शोभा बन चुके थे। यादें ही शेष हैं।.. नवरात्र में सप्तमी से लेकर विजयादशमी तक चारों दिन रात-रात भर नृत्य संगीत का आनंद उठाते श्रोताओं का सैलाब-सा उमड़ा रहता था पटना की सड़कों पर। ऐसा समां बँधता था कि गाने-बजाने वाले और देखने-सुनने वाले दोनों सुरताल में निबद्ध यानी एकाकार हो जाते थे। कई संगीतकार इन समारोहों में आने के अवसर के आगे बाक़ी आमंत्रण छोड़ दिया करते थे। यहाँ की तमाम संगीत सभाओं के सबसे निकट साक्षी रहे हैं एक वयोवृद्ध संगीत मर्मज्ञ गजेंद्र प्रसाद सिंह। वो बताते हैं, "भूतो न भविष्यति वाली दुर्लभ संगीत प्रस्तुतियों वाला वह कालखंड भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय माना जाएगा. सितार, सरोद, तबला, शहनाई, घुंघरू और कंठ-स्वर की उस कलात्मक पराकाष्ठा की तो अब याद भर बाकी रह गई है।" 60 वर्ष पहले पटना के दशहरा और संगीत का जो संबंध सूत्र क़ायम हुआ था वह 80 के दशक में आकर टूट-बिखर गया। एक नाकाम कोशिश उसी परंपरा को फिर से जोड़ने की एक तथाकथित सरकारी कोशिश इस बार (2006) दशहरा के मौक़े पर हुई ज़रूर लेकिन नाकाम रही। नाकाम इसलिए कि धूमधड़ाम वाले नाच-गाने की सस्ती माँग को आयोजक ने आगे करके बेशक़ीमती राग-संगीत को पीछे धकेल दिया। जब एक ही थाली में गोश्त-क़वाब और मलाई, दोनों परोस दी जाएगी तब स्वाद तो बिगड़ेगा ही। नाराज़गी स्वाभाविक थी और किशोरी अमोनकर जैसी संगीत विदुषी बीच में अपना गायन छोड़ मंच से उतर गईं। राज्य सरकार के मुखिया नीतीश कुमार अपने आजू-बाजू प्रकाश झा और शेखर सुमन को बिठाए हुए वहाँ मौजूद थे। उनमें से किसी ने मंच पर जाकर किशोरी अमोनकर को तत्काल मना लेना उचित नहीं समझा। जब मीडिया वालों ने आयोजनकर्ता सरकारी अधिकारियों को इस बाबत घेर कर सवाल दागे तब मुख्यमंत्री को लगा कि मामला गंभीर विवाद वाला बनता जा रहा है इसलिए उन्होंने किशोरी जी को मनाने प्रकाश झा और शेखर सुमन को भेजा। प्रख्यात तबला वादक किशन महाराज, नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली और सितार वादक देबू चौधरी, इन तीनों कलाकारों को भी उनके गायन-वादन के समय में अचानक परिवर्तन से बड़ा दुःख पहुँचा। किशन महाराज ने तो मंच से कह दिया कि अगर यही रवैया रहा तो अब कोई कलाकार यहाँ अपनी बेइज्ज़ती कराने नहीं आएगा। मनोज तिवारी के धूम-धड़ाकेदार लोकगीतों और क़व्वालियों के दीवाने श्रोताओं की माँग को तरजीह देने से समारोह की गरिमा को जो ठेस लगी, उस पर किशन महाराज बोले, "जब एक ही थाली में गोश्त-क़वाब और मलाई, दोनों परोस दी जाएगी तब स्वाद तो बिगड़ेगा ही." इस तरह पटना के दशहरा संगीत महोत्सव की टूटी परंपरा को जोड़ने का जो प्रयास सरकारी स्तर से इस बार किया गया, प्रेक्षकों की नज़र में ख़ुद आयोजकों ने ही उस पर पानी फेर दिया। (साभार - बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम) बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:पटना श्रेणी:बिहार श्रेणी:बिहार की संस्कृति