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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

पराशर (कृषि पराशर के रचयिता)

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पराशर नाम के एक मुनि हुए हैं। उनके द्वारा रचित ग्रंथों में 'कृषिसंग्रह', 'कृषि पराशर' एवं 'पराशर तंत्र' के नाम गिनाए जाते हैं। किंतु इनमें से मूल ग्रंथ 'कृषि पराशर' ही है। इस ग्रंथ के रचयिता पराशर मुनि कौन से हैं, इस विषय पर यथेष्ट मतभेद है। ग्रंथ की शैली के आधार पर यह 8वीं शती के पूर्व का लिखा नहीं समझा जाता। 'कृषि पराशर' में कृषि पर ग्रह नक्षत्रों का प्रभाव, मेघ और उसकी जातियाँ, वर्षामाप, वर्षा का अनुमान, विभिन्न समयों की वर्षा का प्रभाव, कृषि की देखभाल, बैलों की सुरक्षा, गोपर्व, गोबर की खाद, हल, जोताई, बैलों के चुनाव, कटाई के समय, रोपण, धान्य संग्रह आदि विषयों पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं। ग्रंथ के अध्ययन से पता चलता है कि पराशर के मन में कृषि के लिए अपूर्व सम्मान था। किसान कैसा होना चाहिए, पशुओं को कैसे रखना चाहिए, गोबर की खाद कैसे तैयार करनी चाहिए और खेतों में खाद देने से क्या लाभ होता है, बीजों को कब और कैसे सुरक्षित रखना चाहिए, इत्यादि विषयों का सविस्तार वर्णन इस ग्रंथ में मिलता है। हलों के संबंध में दिया हुआ है कि ईषा, जुवा, हलस्थाणु, निर्योल (फार), पाशिका, अड्डचल्ल, शहल तथा पंचनी ये हल के आठ अंग हैं। पाँच हाथ की हरीस, ढाई हाथ का हलस्थाणु (कुढ़), डेढ़ हाथ का फार और कान के सदृश जुवा होना चाहिए। जुवा चार हाथ का होना चाहिए। इस ग्रंथ से पता लगता है कि पराशर के काल में कृषि अत्यंत पुष्ट कर्म थी। कृषि पराशर कृषि पराशर संस्कृत भाषा में निबद्ध कृषि का सर्चवाधिक चर्चित ग्रन्थ है। यह महर्षि पराशर के द्वारा विरचित माना जाता है। इसमें प्रारम्भ में ही कहा गया है कि अन्न ही प्राण है, बल है; अन्न ही समस्त अर्थ का साधन है। देवता, असुर, मनुष्य सभी अन्न से जीवित हैं तथा अन्न धान्य से उत्पन्न होता है और धान्य बिना कृषि के नहीं होता। इसलिए सभी कर्म छोड़कर कृषि कर्म ही करना चाहिए।अन्न प्राणा बलं चान्नमन्नं सर्वार्थसाधनम्। देवासुरमनुष्याश्च सर्वे चान्नोपजीविनः ॥ (६)अन्नं हि धान्यसंजातं धान्यं कृपया विना न च। तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत् ॥ (७) कृषि के लिए जल की आवश्यकता को देखते हुए तथा जल के प्रमुख साधन होने के कारण वृष्टि ज्ञान को पराशर ने प्रमुखता दी हैवृष्टिमूला कृषिः सर्वा वृष्टिमूलं च जीवनम्। तस्मादादौ प्रयत्नेन वृष्टिज्ञानं समाचरेत् ॥ (१०) तथा इसी क्रम में बतलाया है कि विभिन्न ग्रहों का वर्षा पर क्या प्रभाव पड़ता है जैसे कि चन्द्रमा के संवत्सर का राजा होने पर पृथ्वी धान्य से पूर्ण होती है तथा शनि के राजा होने पर वर्षा मन्द होती है। इसी प्रकार मेघों के प्रकार का वर्णन, अलग-अलग ऋतुओं में होने वाली वर्षा के लक्षणों का वर्णन तथा अनावृष्टि के लक्षणों का भी पराशर ने वर्णन किया है। साथ ही ऋषि ने कृषि कर्म में नियुक्त पशुओं के भी उचित रखरखाव करने को कहा है तथा उतना ही कृषि कर्म करने का निर्देश किया है जिससे पशु को कष्ट न हो जो पशुओं के प्रति भारतीय व्यवहार का द्योतक है।कृषिं च तादृशीं कुर्याद्यथा वाहान्न पीडयेत्। वाहपीडार्जितं शस्यं गर्हितं सर्वकर्मसु ॥ (८४) इसके पश्चात् गौशाला की स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान देने की बात कही है। पशुओं के त्यौहारों का तथा हल सामग्री का भी वर्णन ऋषि ने किया है। इसके पश्चात कृषि कर्म प्रारम्भ करने के समय का वर्णन करते हुए कहा है कि शुभ समय में ही यथाविधि पूजन करके हल प्रसारण करना चाहिए। इसके पश्चात शोधित किए तथा संरक्षित हुए बीजों को उचित समय में बोने का निर्देश है साथ ही धान्य को काटने तथा उसको तृणरहित करने का वर्णन है। पराशर ऋषि कहते हैं कि जो धान्य तृण रहित नहीं किया जाता वो क्षीण हो जाता है।निष्पन्नमपि यद्धान्यं न कृतं तृणवर्जितम्। न सम्यक् प्हलमाप्नोति तृणक्षीणा कृषिर्भवेत् ॥ (१८९) इसके साथ ही जलरक्षण का भी वर्णन प्राप्त होता है। ऋषि पराशर इसके लिए निर्देश करते हुए कहते हैं कि शरत्काल आने पर जल का संरक्षण करना चाहिए तथा क्षेत्र में नल का रोपण करना चाहिए। इसके साथ पराशर ने धान्य काटने से पूर्व पुष्ययात्रा का विधान किया है जो सभी विघ्नों की शान्ति तथा धान्य की वृद्धि केलिए होती थी। तत्पश्चात् पौष मास में धान्य काटने का निर्देश किया गया है। इन्हें भी देखें पराशर ऋषि पराशर (बहुविकल्पी) सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ कृषिपराशरम् (संस्कृत विकिस्रोत) कृषि पराशर Krishi-Parashara (Agriculture by Parashara)A text on ancient Indian agriculture in SanskritTranslated By Nalini Sadhale संस्कृत भाषा में कृषि ग्रन्थ (डॉ॰ सुधा सिंह) प्राचीन भारत के कृषि वैज्ञानिक पाराशर (पाञ्चजन्य) श्रेणी:कृषि श्रेणी:ऋषि मुनि