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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

द्वैत वेदान्त

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मध्वाचार्य द्वारा प्रतिपादित तथा उनके अनुयायियों द्वारा उपबृंहित द्वैतवाद रामानुज के विशिष्ट द्वैतवाद से काफी मिलता-जुलता है। मध्व बिना संकोच द्वैत का प्रतिपादन करते हैं। अद्वैत वेदांत को मध्व "मायावादी दानव' कहते हैं। इनके अनुसार जगत्प्रवाह पाँच भेदों से समन्वित है- (१) जीव और ईश्वर में, (२) जीव और जीव में, (३) जीव और जड़ में, (४) ईश्वर और जड़ में तथा (५) जड़ और जड़ में भेद स्वाभाविक है। संसार सत्य है और इसमें होनेवाले भेद भी सत्य हैं। वस्तु का स्वरूप ही भेदमय है। ज्ञान में हम वस्तु को अन्य वस्तुओें से अलग करके एक विलक्षण रूप में जानते हैं। चूँकि ज्ञेय विषय भिन्न हैं अत: हमारा ज्ञान भी ज्ञेय के अनुसार भिन्न भिन्न होता है। रामानुज की तरह द्वैतवाद में भी ईश्वर, चित्‌ और अचित्‌ इन तीन नित्य, परस्पर भिन्न तत्वों को सत्य माना गया है। इनमें से चित्‌ और अचित्‌ ईश्वराश्रित हैं। केवल ईश्वर अनाश्रित तत्व है। वह अनंत सद्गुणों से युक्त है। वही विश्व का स्रष्टा, पालक और संहारक है। वह दिव्य शरीरधारी विश्वातीत और विश्वांतर्यामी दोनों माना गया है। ईश्वर पूर्ण है- कर्मों का अधिष्ठाता ईश्वर केवल भक्ति से प्रसन्न होता है। वह अवतारों और व्यूहों में प्रकट होता है तथा मूर्तियों में निवास करता है। उसकी सहचरी लक्ष्मी उसी की तरह सर्वव्यापिनी है पर उसके गुण लक्ष्मीपति से कुछ न्यून हैं। उसी को ईश्वर की शक्ति कहते हैं। वेदों के अध्ययन से ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान होता है, अत: वह अनिर्वचनीय नहीं है। पर उसको पूर्ण रूप से जानना भी सहज नहीं है। ईश्वर के गुण अनंत हैं, अत: उसकी सत्ता सीमित नहीं है- असीमता के कारण उसका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता। वही ईश्वर विष्णु है। अपनी इच्छा से वह विश्व का नियमन करता है- वह जीव और जड़ को नए सिरे से बना नहीं सकता और न ही उनका विनाश कर सकता है। वह केवल निमित्त कारण है - उपादान कारण नहीं। जीवों की संख्या अनंत है और वे अणुरूप हैं। मूलत: वे चेतन और आनंदमय नित्य तत्व हैं पर भौतिक शरीर के संसर्ग से एवं कर्मबंधन से वे दुख भोगते हैं। ईश्वर जीवों का अंतर्यामी रूप से नियंता है, फिर भी वास्तविक कर्ता, भोक्ता तथा कर्म का उत्तरदायी जीव ही है। ज्ञानपूर्वक ईश्वर से नित्य स्नेह करना भक्ति है जिससे ही जीव मुक्त हो सकता है। इस विश्व में सब कुछ सजीव है - अणु अणु जीव से व्याप्त है। निष्काम धर्म से जीव को तत्वज्ञान में सहायता मिलती है - ध्यान से ईश्वरानुग्रह का लाभ होता है और अंत में उसे ईश्वर के स्वरूप का अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है। जब ज्ञान की प्रतिष्ठा हो जाती है, जीव बंधमुक्त हो जाता है। ईश्वर के पास वायु के ही माध्यम से पहुँचा जा सकता है। ईश्वर का अनुग्रह सबको नहीं मिलता - वह कुछ लोगों को मुक्ति के लिए चुनता है, बाकी लोगों को छोड़ देता है। जिनको वह उनकी भक्ति के अनुसार मोक्ष देता है वे ईश्वर में लीन नहीं होते। उनको केवल ईश्वर की सन्निधि मिलती है। मुक्त जीव ईश्वर की समानता भी नहीं प्राप्त कर सकते। भक्ति की तीव्रता के अनुसार मुक्ति चार प्रकार की मानी गई है - सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य। ईश्वर को जब सृष्टि करने की इच्छा होती है, मूल प्रकृति नाना भौतिक पदार्थों के रूप में अपना विकास करती है। सृष्टि का अर्थ है सूक्ष्म का स्थूल रूप में परिणाम तथा जीवों को कर्मानुसार फल देने के लिए शरीरप्रदान। द्वैत वेदांत अद्वैत-मत-परक वैदिक वाक्यों का खींच तानकर अर्थ निकालता है - जैसे "एकमेवाद्वितीयम्‌' का अर्थ होगा - ब्रह्म के समान कोई दूसरा नहीं है। इसीलिए द्वैतवाद वेदों की अपेक्षा आगमों और पुराणों को अधिक महत्व देता है। सन्दर्भ इन्हें भी देखें अद्वैत वेदान्त वेदान्त दर्शन श्रेणी:दर्शन