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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मुहम्मद (सूरा)

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जून 2015 सूरा मुहम्मद (इंग्लिश: Muhammad (surah) इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 47 वां सूरा (अध्याय) है। इसमें 38 आयतें हैं। नाम सूरा 'मुहम्मद'अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ भाष्य: मौलाना मौदूदी अनुदित क़ुरआन - संक्षिप्त टीका सहित 732 से https://archive.org/details/TranslationOfTheMeaningsOfTheNobleQuranInTheHindipdfका नाम सूरा अल्-अह़्क़ाफ़ का अनुवाद (किंग फ़हद प्रेस) https://quranenc.com/en/browse/hindi_omari/47 https://quranenc.com 16 जुलाई 2020 https://web.archive.org/web/20200622083734/https://quranenc.com/en/browse/hindi_omari/47 22 जून 2020 dead आयत 2 के वाक्यांश “उस चीज़ को मान लिया जो मुहम्मद पर अवतरित हुई उद्धृत है। मतलब यह है कि यह वह सूरा है जिसमें मुहम्मद (सल्ल.) का प्रतिष्ठित नाम आया है। इसके अतिरिक्त इसका एक मशहूर नाम ' क़िताल ' (युद्ध) भी है, जो आयत 20 के वाक्यांश , “जिसमें युद्ध (क़िताल) का उल्लेख था से उद्धृत है। अवतरणकाल सूरा मदनी सूरा अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद के मदीना के निवास के समय हिजरत के पश्चात अवतरित हुई। इसकी विषय-वस्तुएँ यह गवाही देती हैं कि यह हिजरत के पश्चात् मदीना में उस वक्त अवतरित हुई थी, जब युद्ध का आदेश तो दिया जा चुका था, किन्तु अभी युद्ध व्यवहारतः आरम्भ नहीं हुआ था। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जिस कालखण्ड में यह सूरा अवतरित हुई है, उस समय परिस्थिति यह थी कि मक्का मुअज्जमा विशेष रूप से और अरब भू-भाग में सामान्यतः हर जगह मुसलमानों को जुल्म और अत्याचार का निशाना बनाया जा रहा था और उनपर जीवनकाल तंग कर दिया गया था। मुसलमान हर ओर से सिमटकर मदीना तैबा के शान्तिगृह में एकत्र हो गए थे, किन्तु कुरैश के काफ़िर यहाँ भी उनको चैन से बैठने देने के लिए तैयार न थे। मदीने की छोटी-सी बस्ती हर तरफ़ से काफ़िरों के घेरे में थी और वे उसे मिटा देने पर तुले हुए थे । मुसलमानों के लिए इस स्थिति में दो ही उपाय शेष रह गए थे— या तो वे अपने धर्म की ओर बुलाने और उसके प्रचार ही से नहीं, बल्कि उसके अनुपालन तक को त्याग कर अज्ञान के आगे हथियार डाल दें, या फिर मरने-मारने के लिए उठ खड़े हों और सिर-धड़ की बाज़ी लगाकर हमेशा के लिए इस बात का फैसला कर दें कि अरब भू भाग में इस्लाम को रहना है या दूसरे धर्म को । अल्लाह ने इस अवसर पर मुसलमानों को उसी दृढ संकल्प और साहस की राह दिखाई जो ईमानवालों के लिए एक ही राह है। उसने पहले सूरा 22 (हज्ज) आयत 39 में उनको युद्ध की अनुज्ञा दी और फिर सूरा 2 (बक़रा) आयत 190 में इसका आदेश दे दिया। किन्तु उस समय हर व्यक्ति जानता था कि इन परिस्थितियों में युद्ध का अर्थ क्या है। मदीना में ईमानवालों का एक मुट्ठीभर जन समूह था जो पूरे एक हज़ार युद्ध-योग्य पुरुष भी जुटाने की क्षमता न रखता था और उससे कहा जा रहा था कि सम्पूर्ण अरब से टकरा जाने के लिए खड़ा हो, युद्ध के लिए जिस सामान की ज़रूरत थी, एक ऐसी बस्ती अपना पेट काटकर भी मुश्किल ही से जुटा सकती थी, जिसके अन्दर सैकड़ों बेघर मुहाजिर अभी पूरी तरह से बसे भी न थे और चारों ओर से अरब निवासियों ने आर्थिक बहिष्कार करके उसकी कमर तोड़ रखी थी। विषय और वार्ता मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि इसका विषय ईमानवालों को युद्ध के लिए तैयार करना और उनको इस सिलसिले में आरम्भिक आदेश देना है। इसी सम्पर्क से इसका नाम सूरा क़िताल भी रखा गया है। इसमें क्रमशः नीचे की ये वार्ताएँ प्रस्तुत की गई हैं : आरम्भ में बताया गया है कि इस समय दो गिरोहों के मध्य मुक़ाबला आ पड़ा है। एक गिरोह (सत्य का इनकार करनेवालों और अल्लाह के शत्रुओं का है और दूसरा गिरोह सत्य के माननेवालों का है।) अब अल्लाह का दो टूक फैसला यह है कि पहले गिरोह के सभी प्रयास और क्रिया-कलाप को उसने अकारथ कर दिया और दूसरे गिरोह की परिस्थितियाँ ठीक कर दीं । इसके बाद मुसलमानों को युद्ध-सम्बन्धी प्रारम्भिक आदेश दिए गए हैं। उनको अल्लाह की सहायता और मार्गदर्शन का विश्वास दिलाया गया है। उनको अल्लाह की राह में कुरबानियाँ करने पर उत्कृष्ट प्रतिपादन की आशा दिलाई गई है। फिर काफ़िरों के सम्बन्ध में बताया गया है कि वे अल्लाह के समर्थन और मार्गदर्शन से वंचित हैं। उनका कोई उपाय ईमानवालों के मुक़ाबले में सफल न होगा और वे इस लोक में भी और परलोक में भी बहुत बुरा परिणाम देखेंगे। इसके बाद वार्ता का रुख़ मुनाफ़िक़ों की ओर फिर जाता है जो बड़े मुसलमान बने फिरते थे, किन्तु यह आदेश आ जाने के बाद अपने कुशल - क्षेत्र की चिन्ता में काफ़िरों से साठ - गाँठ करने लगे थे। उनको साफ़-साफ़ ख़बरदार किया गया है कि अल्लाह और उसके धर्म के विषय में कपटाचार की नीति अपनानेवालों का कोई कर्म स्वीकृत नहीं है। फिर मुसलमानों को उभारा गया है कि वे अपनी अल्पसंख्या और बेसरो-सामान होने और काफ़िरों की अधिक संख्या और उनके साज़-सामान की अधिकता देखकर हिम्मत न हारें। उनके आगे संधि का प्रस्ताव करके कमज़ोरी न दिखाएँ, जिससे उनके दुस्साहस इस्लाम और मुसलमानों के मुक़ाबले में और अधिक बढ़ जाएँ, बल्कि अल्लाह के भरोसे पर उठे और कुन के उस पहाड़ से टकरा जाएँ , अल्लाह मुसलमानों के साथ है। अन्त में मुसलमानों को अल्लाह की राह में ख़र्च करने का आमंत्रण दिया है। यद्यपि उस समय मुसलमानों की आर्थिक दशा बहुत दयनीय थी, किन्तु सामने यह समस्य खड़ी थी कि अरब में इस्लाम और मुसलमानों को जीवित रहना है या नहीं। इसलिए मुसलमानों से कहा गया कि इस समय जो व्यक्ति भी कंजूसी से काम लेगा वह वास्तव कुछ न बिगाड़ेगा, बल्कि स्वयं अपने आप ही को तबाही के ख़तरे में डाल देगा । सुरह "मुहम्मद'' का अनुवाद बिस्मिल्ला हिर्रह्मा निर्रहीम अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है। बिस्मिल्लाह क़ुरआन का हिन्दी अनुवाद इस सूरा का प्रमुख अनुवाद: क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी "मुहम्मद अहमद" Muhammad सूरा का अनुवाद http://tanzil.net/#trans/hi.farooq/47:1 http://tanzil.net 15 जुलाई 2020 https://web.archive.org/web/20180425183153/http://tanzil.net/#trans/hi.farooq/47:1 25 अप्रैल 2018 dead ने किया। बाहरी कडियाँ इस सूरह का प्रसिद्ध अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें Al-Ahqaf 47:1 47 - मुहम्मद अल-अहक़ाफ़ अल-फ़तह सन्दर्भ: इन्हें भी देखें क़ुरआन मुहम्मद क़ुरआन का हिन्दी अनुवाद सूरा आयत (क़ुरआन) इस्लामी शब्दावली मुहम्मद के नाम और ख़िताब मुहम्मद का वंश वृक्ष श्रेणी:सूरा