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ईर्यापथ आस्रव
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ईर्यापथ आस्रव, जैनमत में वर्णित आस्रव का एक भेद है। मन, वचन और काया की सहायता से आत्मप्रदेशों में गति होना जैन धर्म में 'योग' कहलाता है और इसी योग के माध्यम से आत्मा में कर्म की पुद्गलवर्गणाओं का जो संबंध होता है उसे आस्रव कहते हैं। आस्रव के दो भेद हैं : (१) सांपरायिक आस्रव तथा (२) ईर्यापथ आस्रव। सभी शरीरधारी आत्माओं को ज्ञानावरणादि कर्मों का (आयुकर्म के अतिरिक्त) हर समय बंध होता रहता है। मोह, माया, मद, क्रोध, लोभ आदि से ग्रस्त आत्माओं को सांपरायिक आस्रव (शुभाशुभ फल देनेवाले कर्मों का होना) होता है और जो आत्माएँ क्रोधाधि रहित हैं उन्हें ईर्यापथ आस्रव (फल न देनेवाले कर्मों का होना) होता है।
श्रेणी:जैन दर्शन