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कीर्तिमुख
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thumb|right|लक्कुंडी के काशीविश्वेश्वर मंदिर में कीर्तिमुख
कीर्तिमुख संस्कृत : कीर्तिमुखम का अर्थ है "शानदार चेहरा"। इसे हिंदू और बौद्ध मंदिर वास्तुकला में एक भयंकर, निगलने वाले चेहरे के रूप में दर्शाया जाता है, जिसके बड़े नुकीले दाँत और खुला मुँह होते हैं। यह भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई मंदिरों में देवताओं की मूर्तियों, मुख्य द्वार तथा शिखरों पर सजावटी आकृति के रूप में पाया जाता है।http://www.khandro.net/mysterious_vyali_mukha.htm यल्ली और मुख 2007-02-25 इसका मूल उल्लेख स्कंद पुराण और शिव पुराण में मिलता है, इसे भगवान शिव द्वारा उत्पन्न एक भयानक मुख के रूप में वर्णित किया गया है। यह आत्म-संयम, विनम्रता और रक्षक का प्रतीक माना जाता है।
विशेषताएं
दक्षिण भारतीय द्रविड़ वास्तुकला में यह एक भयंकर, उभरी आँखों वाला चेहरा होता है जो भय और विस्मय दोनों उत्पन्न करता है। जैसा कि विद्वान ज़िमर लिखते हैं, कीर्तिमुख मुख्यतः एक दुष्ट शक्तियों को दूर करने वाला राक्षसी मुखौटा है, जो दहलीज़ पर बुरी शक्तियों को दूर करने के लिए लगाया जाता है। यह सिंहमुख से भिन्न होता है, क्योंकि कीर्तिमुख का स्वरूप "स्वयं को निगलने" की क्रिया से जुड़ा होता है, जो संसार की अस्थिरता और सब कुछ भस्म करने वाली शक्ति का प्रतीक है। द्रविड़ वास्तुकला में यह प्रायः मंदिरों के शीर्ष पर दिखाई देता है। अधिकांश मूर्तियों में केवल इसका ऊपरी जबड़ा और मुख का भाग प्रदर्शित किया जाता है, किंतु कुछ स्थलों पर इसे भुजाओं सहित भी दिखाया गया है। यह रूपांकन भगवान शिव की जटाओं में भी पाया जाता है। कई विद्वानों ने इसकी तुलना ग्रीक पौराणिक प्रतीक ऑरोबोरोस से की है, जो स्वयं को निगलने वाले सर्प का प्रतीक हैhttp://www.pittsburghts.org/downloads/winter2006.pdf थियोसोफिकल सोसाइटी - खुद को ही निगलने वाला शिकारी। 2011-09-19 2016-07-17 https://web.archive.org/web/20160717022159/http://www.pittsburghts.org/downloads/winter2006.pdf dead , अर्थात् सृष्टि और विनाश के शाश्वत चक्र का द्योतक।
इन्हें भी देखें
राहु
कालचक्र
संदर्भ
श्रेणी : लोककथा
श्रेणी: वास्तुकला