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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

रामशरण दर्नाल

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रामशरण दर्नाल (10 जुलाई 1937 – 18 सितंबर 2011) नेपाली लोक संगीत और संस्कृति की खोज और अन्वीक्षण में कार्यरत एक मशहूर नेपाली संगीतकार एवं अनुसंधाता थे। नेपाली साहित्य में संगीत संबंधी लेखों की अभिवृद्धि से लेकर नेपाल में पश्चिमी वाद्य-यंत्रों की पहचान और लोकप्रियता तक उन्होंने विशेष भूमिका निभाई है। == प्रारंभिक जीवन और शिक्षा == नामकरण संस्कार अनुसार दंड कुमार के नाम से भी परिचित रामशरण दर्नाल 10 जुलाई 1937 को तत्कालीन ड्रम मेजर सत्यकुमार दर्नाल और उनकी पत्नी दिलकुमारी दर्नाल के यहाँ काठमांडू में स्थित धोबीचौर में पैदा हुए थे। राणा शासन के दौरान एक अछूत परिवार में जन्मे दर्नाल का बचपन उतना आसान नहीं था। अपने माता-पिता की दूसरी औलाद होने के बावजूद वे जीवित​ रहनेवाली पहली संतति थे। अपने पिता और ताऊ की बैंड तालीमें देखकर पले-बढ़े दर्नाल की छोटी उम्र से ही संगीत में दिलचस्पी थी। काठमांडू में स्थित दरबार हाई स्कूल में अपनी आधारिक पढ़ाई पूरी करने के बाद दर्नाल को सेंट रॉबर्ट्स स्कूल में अपनी माध्यमिक शिक्षा हासिल करने के लिए दार्जिलिंग भेजा गया, जहाँ उन्होंने गिटार और मैंडोलिन बजाना सीखा। == व्यक्तिगत जीवन == जन्मजात कम प्रतिरक्षण क्षमता होने की वजह से दर्नाल को समय-समय में स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों में पहुँचाया जाता था। उन दिनों के अंधविश्वास पर आधारित होकर 11 साल के रामशरण की शादी काभ्रेपलांचोक ज़िला में स्थित महादेवस्थान मंडन की 9 साल की हरिमाया से तय की गई। 1951 में वे अपनी पढ़ाई पूरी करने हेतु दार्जिलिंग चले गए और विदेश में ही 12 साल बिताए। दर्नाल के तीन बेटे और एक बेटी थी। == कार्य जीवन == भारत में पढ़ाई के क्रम में ही दर्नाल ने कोलकाता में स्थित एक रिकॉर्डिंग कंपनी में अपने काम की शुरुआत की, जहाँ धर्मराज थापा, नातिकाजी, शिव शंकर और तारादेवी श्रेष्ठ जैसे नेपाली संगीतकारों से उनकी पहचान हुई। 1958 में दर्नाल अपने साथ नेपाल में मैंडोलिन लाए। ख़ासकर उन्हें नेपाल में पश्चिमी वाद्य-यंत्रों की पहचान और लोकप्रियता का श्रेय दिया जाता है। अपने कार्य संपर्क बढ़ाते हुए उनहोंने 1959 में नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान में मैंडोलिन वादक के पद में नौकरी की। पाँच साल बाद उन्हें महेंद्र वीर विक्रम शाह द्वारा लाई गई त्रिवर्षीय योजना के अंतर्गत नेपाल संगीत और नृत्य अकादमी में सचिव के पद में नियुक्त किया गया। 1966 में केदारमान व्यथित ने उन्हें नौकरी से निकाल देने के बावजूद सूर्य विक्रम ज्ञवाली की सिफ़ारिश में उन्हें 2004 तक वहीं काम करने का मौक़ा मिला। लोक संगीत के क्षेत्र में दर्नाल के योगदान प्रशंसनीय हैं ही लेकिन पुष्कल बूढ़ापीर्थी के निदेशन अनुसार नेपाल में पश्चिमी बाजाओं की लोकप्रियता में पहुँचाए योगदान भी कम नहीं हैं। गीत-लेखन, गायन और वादन के क्षेत्रों में उनके अत्यावश्यक कार्यों की वजह से उन्हें एक सांस्कृतिक हस्ती माना जाता है। प्रज्ञा प्रतिष्ठान में दर्नाल संगीत संग्रहालय के एकमात्र प्रभारी थे, जो 2500 साल पहले बुद्ध के समय में बजाई जानेवाली क्वताः सहित 127 वाद्य-यंत्रों का भंडार था। 35 साल के लिए नोटेशनकार के पद में काम करने के बाद दर्नाल प्रतिष्ठान से सेवानिवृत्त हो गए। संगीत शिरोमणि यज्ञराज शर्मा की सिफ़ारिश में रु॰ 150 प्रति महीना की तनख़ा में नियुक्त दर्नाल ने 2009 तक क़रीब 50 साल प्रज्ञा प्रतिष्ठान में बिताए। 2004 से लेकर 2009 तक वे प्रज्ञा-परिषद के सदस्य थे। सेवानिवृत्ति के बाद उनहोंने म्यूज़िक नेपाल में काम किया। वे त्रिभुवन विश्वविद्यालय संगीत विभाग, नेपाली लोक बाजा संग्रहालय और नेपाल दलित साहित्य एवं सांस्कृतिक अकादमी सहित कई सांस्कृतिक संगठनों में सलाहकार के पद में भी कार्यरत थे। === गीत रचना === दार्जिलिंग में अपने प्रवास के दौरान दर्नाल ने लक्खी देवी सुंदास और शिव कुमार राई जैसे विद्वानों के संपर्क में संगीत के क्षेत्र में काफ़ी तरक़्क़ी की। वे पियानो, ड्रम और गिटार बजाने में माहिर थे। कोलकाता से काठमांडू लौटते वक़्त उन्होंने अपने साथ मैंडोलिन और गिटार सहित कई और वाद्य-यंत्र लाए। रामशरण नेपाल में गिटार और मैंडोलिन की पहचान करानेवाले पहले शख़्स थे। उन्हें संगीतकार प्रेमध्वज प्रधान को गिटार की शिक्षा देने के लिए जाना जाता है। उन्हें ईश्वरबल्लभ के कई गानों की संगीत रचना करने का श्रेय दिया गया है। उन्होंने माधवप्रसाद घिमिरे की "गाउँछ गीत नेपाली" के लिए संगीत तैयार किया था। एम॰ बी॰ बी॰ शाह की "उसका लागि र फेरि उसैका लागि" में नोटेशन भी उन्होंने ही लिखा था। लेकिन दर्नाल की संगीतात्मकता की विशुद्ध झलक "हे वीर हिँड अघि सरी" में देखी जा सकती है। === संगीत अन्वीक्षण और लेखन === ख़ुद​ को संगीत अन्वीक्षण और अनुसंधान को समर्पित किए दर्नाल ने परंपरागत वाद्य-यंत्र और लोक संगीत की खोज में सुदूरपश्चिम प्रदेश के दुर्गम गाँवों समेत संपूर्ण नेपाल की यात्रा की। माना जाता है कि उन्होंने अपने सफ़र में हुड़का सहित कुल 365 क़िस्म के बाजाएँ इकट्ठे किए। उन्हें आधिकारिक अभिलेखों में वाद्य-यंत्रों के पंजीकरण की शुरुआत करनेवाले पहले शख़्स के रूप में जाना जाता है। 1968 में भारी मॉनसून बरसात की वजह से दर्नाल का घर ढह गया, जिसके नीचे उनकी माँ और अन्य 15 क़िस्म के बाजाएँ दब गई। इस घटना को वे अपने जीवन के न्यूनतम बिंदु मानते थे। बाद में संगीत से मुड़कर साहित्य की तरफ़ ज़्यादा सक्रिय होने पर उनकी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ ले लिया। 1967 के आसपास उन्होंने वाराणसी में स्थित सँगालो नामक अख़बार में अपना पहला लेख, "नेपाली संस्कृति में वाद्यवादन का स्थान" प्रकाशित किया। एक साल बाद सो लेख को संशोधित करके गोरखापत्र में प्रकाशित किया गया। उन्होंने कुल मिलाकर नेपाली संगीत और 375 विलुप्तप्राय परंपरागत बाजाओं पर आधारित 11 किताबें लिखीं, जो 1960 के दशक में नेपाल में दुर्लभ थीं। बिसे नगर्ची की जीवनी के अध्ययन शुरू करनेवाले दर्नाल को मेहनत और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। == कृतियाँ == संगीत परिक्रमा (1981) नेपाली संगीत साधक (1981) विश्वविख्यात संगीतकार (1984) संगीत के विस्तृत अवलोकन (1984) नेपाली संगीत-संस्कृति (1988) संगीत सौरभ (2002) नेपाली बागीना और कला (2003) नेपाली बाजा (2004) गायनशैली (2004) काठमांडू उपत्यका के प्राचीन समसामयिक गाने (2010) == पुरस्कार और सम्मान == नेपाली सांगीतिक क्षेत्र में उनके योगदान के लिए दर्नाल ने कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त की है। दर्नाल के सम्मान में नेपाल डाकघर ने 10 रुपये के दाम पर दिए जानेवाले दर्नाल की तस्वीर से अंकित टिकटें प्रकाशित की है। नेपाल सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी पाठ्यक्रम अनुसार कक्षा 9 की नेपाली किताब में "संगीतज्ञ रामशरण दर्नाल" नामक पाठ समावेश की गई है। === पुरस्कार === जगदंबाश्री पुरस्कार (2009) नारायणगोपाल संगीत पुरस्कार (2009) लूनकरणदास गंगादेवी चौधरी पुरस्कार (2005) इंद्र राज्यलक्ष्मी पुरस्कार (2005) नूरगंगा पुरस्कार (2004) झपट पुरस्कार (2003) राष्ट्रीय प्रतिभा पुरस्कार (1996) === सम्मान === == मृत्यु == नेपाली संगीत साधक रामशरण दर्नाल कई सालों से पार्किंसन से जूझ रहे थे। अंततः 18 सितंबर 2011 को 74 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। == सन्दर्भ ==