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411 समाचार
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अक़ीदह

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इस्लाम धर्म-कर्म के प्रमुख मत यह हैं। इसे अक़ीदह (عقیدہ) कहते हैं। शब्दावली शब्द ``अकीदा सेमिटिक रूट ``ʿا-قب-د से आया है, जिसका अर्थ है "बांधना; बांधना"।और इसीलिए कक्षा 8 की क्रिया "इतकादा" "दृढ़ता से विश्वास करना", क्रिया संज्ञा "इतिकाद" "विश्वास, आध्यात्मिक विश्वास, विश्वास, विश्वास, गवाही; पंथ, सिद्धांत", काल कृदंत "मुतक़वाड़" "विश्वास, सिद्धांत, अंधविश्वास, सबूत, विश्वास, राय"। (स्रोत: बेहर, हैंड, (“अकड”): जे. मिल्टन कोवान (संपा.), “ए डिक्शनरी ऑफ मॉडर्न रिटेन अरेबिक”, चौथा संस्करण (1979))। ("अकीदाह" शब्द न केवल इस्लामी धर्मशास्त्र या विश्वास प्रणाली को संदर्भित करता है, बल्कि इस्लाम में "धर्मशास्त्र" के पर्याय के रूप में भी प्रयोग किया जाता है: "धर्मशास्त्र (अकीदाह) में मुसलमानों के विश्वास की सभी मान्यताएं और प्रणालियां शामिल हैं, सांप्रदायिक मतभेद सहित। और संघर्ष के मुद्दे भी शामिल हैं।)Theology (Aqidah) https://www.madinainstitute.com/studies_programs/aqidah-theology Madina Institute 12 August 2021 ১৪ আগস্ট ২০২১ https://web.archive.org/web/20210814171953/https://www.madinainstitute.com/studies_programs/aqidah-theology অকার্যকর 14 अगस्त 2021 https://web.archive.org/web/20210814171953/https://www.madinainstitute.com/studies_programs/aqidah-theology dead पारंपरिक अरबी में, अकीदाह शब्द का प्रयोग विश्वास या पंथ के अर्थ के लिए किया जाता है। विद्वान अक़ीदा और ईमान के बीच अंतर करते हैं और कहते हैं कि अक़ीदा धर्म के सभी प्रकारों, तरीकों, प्रथाओं, किस्मों और स्पेक्ट्रम को संदर्भित करता है और ईमान का उपयोग केवल विशिष्ट शुद्ध इस्लामी आस्था को संदर्भित करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा, अरबी शब्द अक़ीदा का शाब्दिक अर्थ विश्वास है, और ईमान शब्द का शाब्दिक अर्थ है पहचानना, स्वीकार करना या स्वीकार करना। अर्थात् किसी विषय में विश्वास की प्रकृति या प्रकार का नाम विश्वास है और किसी विश्वास या विश्वास को मानने या स्वीकार करने का नाम उस पर विश्वास करना है। ईश्वर की एकता मुसलमान एक ही ईश्वर को मानते हैं, जिसे वो अल्लाह (फ़ारसी: ख़ुदा) कहते हैं। एकेश्वरवाद को अरबी में तौहीद कहते हैं, जो शब्द वाहिद से आता है जिसका अर्थ है एक। इस्लाम में ईश्वर को मानव की समझ से ऊपर समझा जाता है। मुसलमानों से ईश्वर की कल्पना करने के बजाय उसकी प्रार्थना और जय जयकार करने को कहा गया है। मुसलमानों के अनुसार ईश्वर अद्वितीय हैः उसके जैसा और कोई नहीं। इस्लाम में ईश्वर की एक विलक्षण अवधारणा पर ज़ोर दिया गया है। साथ में यह भी माना जाता कि उसकी पूरी कल्पना मनुष्य के बस में नहीं है। कहो: है ईश्वर एक और अनुपम। है ईश्वर सनातन, हमेशा से हमेशा तक जीने वाला। उसकी न कोई औलाद है न वह खुद किसी की औलाद है। और उस जैसा कोई और नहीं॥” (कुरान, सूरत ११२, आयते १ - ४) नबी और रसूल इस्लाम के अनुसार ईश्वर ने धरती पर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिये समय समय पर किसी व्यक्ति को अपना दूत बनाया। यह दूत भी मनुष्य जाति में से होते थे और ईश्वर की ओर लोगों को बुलाते थे। ईश्वर इन दूतों से विभिन्न रूपों से समपर्क रखते थे। इन को इस्लाम में नबी कहते हैं। जिन नबियों को ईश्वर ने स्वयं शास्त्र या धर्म पुस्तकें प्रदान कीं उन्हें रसूल कहते हैं। मुहम्मद साहब भी इसी कड़ी का हिस्सा थे। उनको जो धार्मिक पुस्तक प्रदान की गयी उसका नाम कुरान है। कुरान में ईश्वर के २५ अन्य नबियों का वर्णन है। स्वयं कुरान के अनुसार ईश्वर ने इन नबियों के अलावा धरती पर और भी कई नबी भेजे हैं जिनका वर्णन कुरान में नहीं है। सभी मुसलमान ईश्वर द्वारा भेजे गये सभी नबियों की वैधता स्वींकार करते हैं और अधिकतम मुसलमान मुहम्मद साहब को ईश्वर का अन्तिम नबी मानते हैं। अहमदिय्या समुदाय के लोग मुहम्मद साहब को अन्तिम नबी नहीं मानते हैं और स्वयं को इस्लाम का अनुयायी भी कहते हैं। भारत के उच्चतम न्यायालय के अनुसार उनको भारत में मुसलमान माना जाता है।http://www.thedailystar.net/law/2004/03/03/index.htm On right to freedom of religion and the plight of Ahmadiyas Hoque, Ridwanul The Daily Star March 21, 2004 5 अक्तूबर 2009 https://web.archive.org/web/20170614152430/http://www.thedailystar.net/law/2004/03/03/index.htm 14 जून 2017 live कई अन्य प्रतिष्ठित मुसलमान विद्वान समय समय पर पहले भी मुहम्मद साहब के अन्तिम नबी होने पर सवाल उठा चुके हैं।http://www.real-islam.org/khatim5.htm On Finality of Prophethood – Opinions of Islamic Scholars 5 अक्तूबर 2009 https://web.archive.org/web/20090201004110/http://real-islam.org/khatim5.htm 1 फ़रवरी 2009 dead रूमी: Mathnawi, Vol. VI, p.8, 1917 ed. Mathnavi Maulana Room, Daftar I, pg. 53 भी देखें।इबन अरबी: Futuhat-e-Makkiyyah vol. 2, p. 3 धर्म पुस्तकें right|thumb|कुरान की एक पांडुलिपि में उसका प्रथम अध्याय। मुसलमानों के लिये ईश्वर द्वारा रसूलों को प्रदान की गयी सभी धार्मिक पुस्तकें वैध हैं। मुसलमानों के अनुसार कुरान ईश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान की गयी अन्तिम धार्मिक पुस्तक है। कुरान में चार और पुस्तकों की चर्चा है: सहूफ़ ए इब्राहीमी जो कि इब्राहीम को प्रदान की गयीं। यह अब लुप्त हो चुकी है। तौरात जो कि मूसा को प्रदान की गयी। ज़बूर जो कि दाउद और कुछ अन्य रसूलों को प्रदान किये गये शास्त्रों का संगठन है। इंजील जो कि ईसा को प्रदान की गयी। मुसलमान यह समझते हैं कि ईसाइयों और यहूदियों ने अपनी पुस्तकों के संदशों में बदलाव कर दिये हैं। वह इन चारों के अलावा अन्य धार्मिक पुस्तकों के होने की सम्भावना से इन्कार नहीं करते हैं। फरिश्ते मुसलमान फरिश्तों (अरबी में मलाइका) के अस्तित्व को मानते हैं। उनके अनुसार फरिश्ते स्वयं कोई इच्छा शक्ति नहीं रखते और केवल ईश्वर की आज्ञा का पालन ही करते हैं। वह खालिस रोशनी से बनीं हुई अमूर्त और निर्दोष हस्तियों हैं जो कि न मर्द हैं न औरत बल्कि इंसान से हर लिहाज़ से अलग हैं। हालांकि अगणनीय फरिश्ते है पर चार फरिश्ते कुरान में प्रभाव रखते हैं: जिब्राईल (Gabriel) जो नबीयों और रसूलों को इश्वर का संदेशा ला कर देता है। इज़्राईल (Azrael) जो इश्वर के समादेश से मौत का फ़रिश्ता जो इन्सान की आत्मा ले जाता है। मीकाईल (Michael) जो इश्वर के समादेश पर मौसम बदलनेवाला फ़रिश्ता। इस्राफ़ील (Raphael) जो इश्वर के समादेश पर कयामत के दिन की शुरूवात पर एक आवाज़ देगा। क़यामत मध्य एशिया के अन्य धर्मों की तरह इस्लाम में भी क़यामत का दिन माना जाता है। इसके अनुसार ईश्वर एक दिन संसार को समाप्त करेगा। यह दिन कब आयेगा इसकी सही जानकारी केवल ईश्वर को ही है। इसे मुसलमान क़यामत का दिन कहते हैं। इस्लाम में शारीरिक रूप से सभी मरे हुए लोगों का उस दिन जी उठने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। उस दिन हर इंसान को उसके अच्छे और बुरे कर्मों का फल दिया जाएगा। इस्लाम में हिन्दू मत की तरह समय के परिपत्र होने की अवधारणा नहीं है। क़यामत के दिन के बाद दोबारा संसार की रचना नहीं होगी। अकीदा के सिद्धांत इस्लामी आस्था के सिद्धांत पारंपरिक सुन्नी सिद्धांत कलाम (सुन्नी) अशरी(सुन्नी) मटुरिदी (सुन्नी) आचारी (सुन्नी) सुन्नी मुसलमानों का मानना ​​है कि आध्यात्मिक विश्वास (इस्लाम में "विश्वास" कहा जाता है) के छह पहलू हैं: अल्लाह, स्वर्गदूतों में विश्वास। विश्वास में], दैवीय रूप से प्रेरित पुस्तकें (जिन्हें इस्लाम में "स्वर्गीय पुस्तकें" कहा जाता है), जैसे कि तौरात, जबूर, इंजिल और कुरान, पैगंबर और संदेशवाहकमें विश्वास, "आखिरी बार" या आखिरी उम्र में विश्वास (इस्लाम में "क़ियामत" कहा जाता है) और भविष्यवाणी या पुनरुत्थान में विश्वास। कलाम कलाम इस्लामी दर्शन सूफी तत्वमीमांसा कलाम, यानी इल्मुल कलाम (भाषण का ज्ञान) आपसी तर्क के माध्यम से धर्मशास्त्र के सिद्धांतों की खोज का इस्लामिक दर्शन है। अरबी भाषा में, कलाम शब्द का अर्थ "भाषण" है। कलाम में पारंगत विद्वानों को मुतकाल्लीम (मुस्लिम धर्मशास्त्री, बहुवचन मुताकल्लीमिन) कहा जाता है। मंज़ूर इलाही ने अपनी पुस्तक "समाज संस्कारे साथिका अकीदार गुरुत्बा" ((सही विश्वास का महत्व: सामाजिक सुधार में) में कलामशास्त्र के बारे में कहा है,Ilahi Muhammad Manzoor Zakariya Abu Bakr Muhammad "Samāja sanskārē saṭhika ākīdāra gurutba" (The Importance of Right Aqeedah in Social Reformation) Islamic Propagation Office in Rabwah Riyadh, Saudi Arabia 19-28 https://d1.islamhouse.com/data/bn/ih_articles/single3/bn_somaj_songoskare_sothik_aqidar_gurutto.pdf 23 November 2022 bn मुताकल्लीमिन अक़ीदा ग्रंथों "इल्मुल कलाम" और दार्शनिकों बुलाया "अल-फालसाफा अल-इस्लामियाह" या इस्लामी दर्शन, "अल-इलाहियत" और "तत्वमीमांसा" (अलौकिकवाद) कहा जाता है। बाद के नामों के बारे में डॉ. नासिर अल-अक्ल और कई अन्य कहते हैं कि इस्लामी आस्था को इन नामों से पुकारना शुद्ध नहीं है। कारण बताते हुए मुहम्मद इब्राहिम अल हमद ने कहा, “क्योंकि इल्मुल कलाम का स्रोत मानव बुद्धि है, जो हिंदू और यूनानी दर्शन पर आधारित है। दूसरी ओर, तौहीद का मुख्य स्रोत रहस्योद्घाटन है। इसके अलावा, इल्मुल कलाम में बेचैनी, असंतुलन, अज्ञान और संदेह शामिल हैं। इसीलिए सलफ सालेहीन ने इल्मुल कलाम की निंदा की। और तौहीद ज्ञान, दृढ़ विश्वास और विश्वास पर आधारित है,….. एक और कारण यह कहा जा सकता है कि दर्शन की नींव मान्यताओं, झूठी मान्यताओं, काल्पनिक विचारों और अंधविश्वासों पर आधारित है”। इमाम हरावी ने धिम अल-कलाम वल्लाह नामक 5-खंडों वाली पुस्तक लिखी और इमाम ग़ज़ाली ने تهافت الفلاسفة नामक पुस्तक लिखी। इसके अलावा, इमाम इब्न तैमियाह और इब्नुल कय्यिम, कई अन्य मुस्लिम विद्वानों ने विस्तार से चर्चा की है कि 'इल्मुल कलाम' और 'फलसफा' सही इस्लामी विश्वास का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। तक़दीर मुसलमान तक़दीर को मानते हैं। तक़दीर का मतलब इनके लिये यह है कि ईश्वर बीते हुए समय, वर्तमान और भविष्य के बारे में सब जानता है। कोई भी चीज़ उसकी अनुमति के बिना नहीं हो सकती है। मनुष्य को अपनी मन-मर्ज़ी से जीने की आज़ादी तो है पर इसकी अनुमति भी ईश्वर ही के द्वारा उसे दी गयी है। इस्लाम के अनुसार मनुष्य अपने कुकर्मों के लिये स्वयं जिम्मेदार इस लिये है क्योंकि उन्हें करने या न करने का निर्णय ईश्वर मनुष्य को स्वयं ही लेने देता है। उसके कुकर्मों का भी पूर्व ज्ञान ईश्वर को होता है। महत्त्व मंज़ूर इलाही ने अपनी पुस्तक "समाज संस्कार सहिका अकीदार गुरुत्बा" (सामाजिक सुधार में अधिकार अक़ीदा का महत्व) में "समाज में सुधार की आवश्यकता और उस संदर्भ में सही इस्लामी अकीदा की भूमिका और महत्व" के बारे में कहा है।Ilahi Muhammad Manzoor Zakariya Abu Bakr Muhammad "Samāja sanskārē saṭhika ākīdāra gurutba" (The Importance of Right Aqeedah in Social Reformation) Islamic Propagation Office in Rabwah Riyadh, Saudi Arabia 19-28 https://d1.islamhouse.com/data/bn/ih_articles/single3/bn_somaj_songoskare_sothik_aqidar_gurutto.pdf 23 November 2022 bn मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज में रहता है। किसी भी समाज का मुख्य लक्ष्य उस समाज के सभी सदस्यों के समग्र कल्याण और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को सुनिश्चित करना है। लेकिन अशिक्षा, घटिया शिक्षा और व्यक्तिगत जीवन की स्वार्थपरता का सामाजिक जीवन पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे समाज दूषित हो जाता है और भ्रष्टाचार, भेदभाव, विभाजन, हिंसा आदि जैसे रोगों से जहर हो जाता है। सामाजिक सुधार के लिए, जैसा कि हम इसे अपने वर्तमान सामाजिक संदर्भ में अनुभव करते हैं। यदि हम समाज की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करें तो हम देख सकते हैं कि इस समाज के लोग समस्याओं से ग्रस्त हैं और भ्रष्ट आचरण में फंसे हुए हैं। इसका अपरिहार्य परिणाम विश्वास में असमानता है और जो कोई भी वृत्ति की मांग के अनुसार चाहता है, वह कुरान और सुन्नत के आधार पर सही है या नहीं। दूसरी तरफ़ लोगों का ईमान बहुत कमज़ोर हो गया है, उनके दिलों से परहेज़गारी दूर हो गई है और आख़िरत के अज़ाब को वे भूल गए हैं। फलस्वरूप समाज में अस्थिरता, अस्थिरता, लूटपाट की प्रवृत्ति, अनेक प्रकार के आतंकवाद तथा कुसंस्कृति का प्रसार तथा अन्य अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। पैगंबर की जीवनी में, अल्लाह उन्हें आशीर्वाद दे और उन्हें शांति प्रदान करे, हम देखते हैं कि उन्होंने तत्कालीन जाहिली समाज को बदल दिया और इसे उस समय के सर्वश्रेष्ठ समाज में बदल दिया। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए जो आंदोलन उन्होंने पैग़म्बरी हासिल करने के बाद शुरू किया, वह धार्मिक सुधार की प्राथमिक प्रक्रिया थी। इस बारे में सैय्यद कुतुब ने अपनी पुस्तक मकोमत التصور الإسلامي (इस्लामी समझ के तत्व) में कहा है: "पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को उस समय भेजा गया था जब जज़ीरत अल-अरब को उत्तर में रोमनों और दक्षिण में फारसियों के बीच लूटी गई संपत्ति के रूप में विभाजित किया गया था। उन्होंने उपजाऊ के लिए अपना हाथ बढ़ाया। जज़ीरत अल-अरब की भूमि, समुद्र, धन और व्यापार के सभी स्रोत। चीजों की भव्य योजना। अल्लाह के रसूल, ईश्वर की प्रार्थना और शांति उस पर हो, एक ऐसे समय में भेजा गया था जब मानव प्रकृति शराब, व्यभिचार, जुआ, खेल और मज़ाक में अज्ञान से प्रेरित थी, बुराई और आपदा पैदा कर रही थी। पवित्र नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इनमें से किसी के साथ भी सुधार कार्य शुरू नहीं किया। वह जज़ीरत अल-अरब की उपजाऊ भूमि से रोमनों और फारसियों को बाहर निकालने के लिए अरबों को राष्ट्रवादी एकता की ओर बुलाने में सक्षम थे। वह पूरी ताकत लगा सकता है उनके खिलाफ युद्ध और अरबों को राष्ट्रीय दुश्मनों के खिलाफ भड़काना। परिणामस्वरूप वे उसके नेतृत्व का पालन करेंगे और अपनी सारी दुश्मनी भूल जाएंगे। … लेकिन अल्लाह जानता था, उसने अपने पैगंबर को सूचित और निर्देशित किया, कि यह सही रास्ता नहीं है और यह मुख्य कार्य नहीं है। मनुष्य के लिए मुख्य कार्य अपने सच्चे भगवान को जानना और केवल उसकी दासता को स्वीकार करना है, और उसके दासों की दासता से मुक्त होना है, और अंत में अल्लाह की ओर से जो कुछ भी आता है उसे स्वीकार करना है… ”। ... विशेष रूप से, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पैगंबर के बाद मक्की के जीवन के 13 वें वर्ष के दौरान पंथ के बारे में ज्ञान के प्रसार को सबसे बड़ा महत्त्व दिया। पैगंबर इतना ही नहीं, बल्कि सभी पैगम्बरों और दूतों का पहला काम जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों को सही विश्वास के लिए बुलाना था। अल-कुरान के शब्दों में, उनके पास वह आह्वान था: “हे मेरे लोगों, अल्लाह की इबादत करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई सच्चा ईश्वर नहीं है।” [अल-आराफ़: 58] इसका कारण केवल एक था, यदि विश्वास शुद्ध नहीं है, तो व्यक्ति का जीवन पवित्र नहीं है, और यदि व्यक्ति पवित्र नहीं है, तो समाज पवित्र नहीं है। ...(1) बृहत्तर राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में दक्षिणपंथ की भूमिका: जिस तरह सही पंथ पर सहमत हुए बिना अधिक से अधिक एकता स्थापित करना संभव नहीं है, उसी तरह पूरी दुनिया में मुस्लिम उम्माह के लिए भी यह दूर की कौड़ी है। एकजुट हो। इस संदर्भ में (डॉ.) उमर सुलेमान अल-अशकर ने कहा: "मुस्लिम एकता तब तक महसूस नहीं की जा सकती जब तक कि एक ही पंथ मुसलमानों को एकजुट न करे।" वास्तव में यह धार्मिक भ्रम ही है जो समाज में फूट के बीज बोता है। समाज अलग-अलग गुटों में बंटा हुआ है। यदि प्रश्न उठता है कि सभी अपने-अपने मत और विश्वास को ही सही मानते हैं। उस स्थिति में, किसी निश्चित विश्वास को सही मानना ​​संभव नहीं होगा। क्योंकि हर पार्टी को अपनी राय पर भरोसा होता है। इस सवाल के जवाब में (डॉ.) उमर सुलेमान अल-अशकर ने कहा: "शुद्ध इस्लामी विश्वास के बारे में कुरान और सुन्नत में एक स्पष्ट बयान है। इस पंथ के हर मूलभूत और मूलभूत पहलू पर प्रमाण प्रस्तुत करना संभव है। और सलफ सालेहिन की स्थापना सच्चे इस्लामी विश्वास पर की गई थी। उन्होंने इस पंथ को इतनी अच्छी तरह से दर्ज किया है कि यह विधर्मियों और गुमराह लोगों के पंथ से बिल्कुल अलग है। इन महान शख्सियतों में अल्लामा तहबी हैं, जिन्होंने अक़ीदे की एक किताब लिखी जो अपने नाम से मशहूर है। इस पुस्तक की व्याख्या मुहम्मद इब्न अबिल एज़ अल-हनफ़ी द्वारा लिखी गई है। बात यहीं नहीं रूकी, बल्कि सहीह अकीदे पर पहले और बाद में कई विद्वानों ने लिखा है। इनमें इमाम अहमद, इब्नू तैमिय्याह, शावकानी और सफ़ारीनी शामिल हैं। (2) सही विश्वास भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और उत्पीड़न से मुक्त नागरिक समाज के गठन के लिए एक मजबूत आधार बनाता है। जिसके आधार पर समाज की सभी गतिविधियों और आपसी लेन-देन का संचालन होता है। इसलिए यदि पंथ विकृति और असत्य पर आधारित होगा तो सामाजिक जीवन संकटापन्न, विक्षुब्ध और विनाश का सामना करने वाला हो जाएगा। यही मुख्य कारण है कि हमारा समाज आज जिस स्थिति में है। अत: समाज को विकृति, प्रलय और विनाश से बचाने के लिए सही विश्वास की ओर लौटना आवश्यक है। (3) समाज में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने में सही विश्वास का महत्व: एक मुस्लिम व्यक्ति के विश्वास का एक अभिन्न अंग यह है कि वह अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों के अनुसार जीना आवश्यक समझता है, भगवान उसे आशीर्वाद दे और उसे शांति प्रदान करे, और उनका मानना ​​है कि उनके आदेशों की अवज्ञा अवैध है। अल्लाह कहता है: "और किसी आस्तिक पुरुष या महिला को अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा के अलावा किसी अन्य अधिकार क्षेत्र का अधिकार नहीं है।" [अल-अहज़ाब: 36] समाज में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए, जब अल्लाह तआला मुसलमानों को भाई-भाई कहते हैं, किसी व्यक्ति के जीवन और संपत्ति पर अतिक्रमण को एक गंभीर अपराध के रूप में पहचानते हैं, और गैर-मुस्लिमों के साथ किए गए समझौते को पूरा करने का आदेश देते हैं, तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के उस आदेश का पालन करता है। लेता है, क्योंकि उसे इस तरह स्वीकार करना उसके पंथ का हिस्सा है। अल्लाह कहता है: "इसलिए, आपके भगवान द्वारा, वे विश्वास नहीं करेंगे जब तक कि आप उनके बीच विवाद का फैसला नहीं करते हैं, फिर उनके दिल में आपके द्वारा दिए गए निर्णय के बारे में कोई संदेह नहीं है और इसे पूर्ण सहमति से स्वीकार करें।" [अन-निसा: 65] (4) राजनीतिक स्थिरता लाने में अधिकार अकीदे का महत्व: इस्लामी अकीदा के आवश्यक मूलभूत सिद्धांतों में से एक यह दृढ़ विश्वास है कि अल्लाह इस दुनिया का निर्माता है, इसलिए वह इसके शासन और मार्गदर्शन का मालिक है। अल्लाह कहता है: "जान लो, उसका निर्माण और मार्गदर्शन है।" [अल-आराफ़: 54] "कहो, निश्चित रूप से सभी मामले अल्लाह के हैं।" [अले ​​इमरान: 154] "आदेश केवल अल्लाह की ओर से है।" [अल-अनआम: 57] इसके अलावा, अल्लाह सभी संप्रभु शक्तियों का मालिक है और एकमात्र कानून बनाने वाला और कानून बनाने वाला है। यह उन्हें भगवान के रूप में स्वीकार करने के अर्थों में से एक है। राजनीतिक स्थिरता हमारे समाज में तभी लौट सकती है जब राजनीतिक नेताओं का इस पंथ के प्रति दृढ़ विश्वास हो। मूल रूप से मानव निर्मित कानूनों से किसी भी मुस्लिम समाज में शांति, व्यवस्था और स्थिरता नहीं आ सकती है। शायद हकीकत इसका सबसे बड़ा सबूत और गवाह है। (5) गलत संस्कृति को रोकने के लिए सही मान्यताओं का महत्व: इसे गलत संस्कृति कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी जो वर्तमान में हमारे बांग्लादेशी समाज में विदेशी विदेशियों और विभिन्न धर्मों की नकल में संस्कृति के नाम पर प्रचलित है। चूंकि ये संस्कृतियां हमारे मूल विचारों और परंपराओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं, इसलिए वे काफी हद तक मुस्लिम आस्था के विरोध में हैं। हमें यह याद रखना होगा कि यह देश मुस्लिम बहुल देश है। इसलिए यदि हम अपने सभी सांस्कृतिक और सामाजिक संस्कारों को सही इस्लामी विश्वास के आलोक में व्यवस्थित करते हैं, तो देश को एक सुंदर, स्वादिष्ट, सभ्य और स्वस्थ संस्कृति का उपहार दिया जा सकता है। (6) समाज को अराजकता और भ्रम से मुक्त करने में सही पंथ का महत्त्व और विचार में शिर्क और बिदअत: सही इस्लामी पंथ का ज्ञान समाज के बौद्धिक वर्ग की सोच दुनिया को प्रबुद्ध कर सकता है ताकि वे राष्ट्र को मार्गदर्शन कर सकें। सही रास्ता। आज हम बुद्धिजीवियों के एक वर्ग की सोच में जो अराजकता और भ्रम देखते हैं, शायद सबसे बड़ा कारण यह है कि वे मुसलमान कहलाने के बावजूद इस्लाम के खिलाफ अपनी कलम की जंग जारी रखते हैं, क्योंकि वे इस्लाम को विकृत तरीके से जानते हैं, उन्हें नहीं जानते हैं। सौभाग्य से सही इस्लामी विश्वास प्राप्त करने के लिए। यही बात उन तमाम पढ़े-लिखे और अनपढ़ मुसलमानों पर भी लागू होती है जो इबादत की बात सोचते हैं और शिर्क और बिदअत में डूबे रहते हैं। कुरान और सुन्नत की रौशनी में उन्होंने शिर्क और बिद्दत को नहीं पहचाना। वे शिर्क और बेदअत को पहचानने के बुनियादी उसूलों से पूरी तरह बेखबर हैं। अकीदा का ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ सही अकीदे के प्रति जागरूकता बढ़ाना इन भ्रमों और शिर्क और बेदअत से पूरे समाज की मुक्ति की गारंटी दे सकता है। इसलिए प्रामाणिक इस्लामी आस्था का ज्ञान प्राप्त करना ही खुद को एक सच्चे आस्तिक और अल्लाह के मुस्लिम सेवक के रूप में विकसित करने का एकमात्र तरीका है। इसी तरह, अगर हम एक समाज को एक पूर्ण इस्लामी समाज के रूप में बनाना चाहते हैं, तो समाज में हर किसी को सहीह अकीदा के ज्ञान से समृद्ध करने का कोई विकल्प नहीं है। इस संबंध में सामाजिक और सांस्कृतिक इस्लामी संगठनों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभानी है। जो लोग इस्लामिक शरीयत और पढ़ाई में दक्ष हैं, वे सहीह अकीदा पर प्रामाणिक किताबें लिखकर बंगाली भाषा में लिखी गई किताबों की कमी को दूर कर सकते हैं। इस संबंध में इमाम, खतीब और मदरसा शिक्षकों की भी मदद ली जा सकती है। बेशक, इससे पहले उन्हें सहीह अकीदा के ज्ञान से समृद्ध किया जाना चाहिए। सही अकीदा के प्रसार के प्रयासों के माध्यम से, हमारे समाज को शिर्क और बेदअत से मुक्त एक सुंदर नागरिक समाज के रूप में विकसित किया जा सकता है। सन्दर्भ श्रेणी:इस्लाम श्रेणी:इस्लामी शब्द