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मध्वाचार्य की कृतियाँ
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मध्वाचार्य द्वारा रचित कुल ३७ ग्रन्थ हैं। ब्रह्मसूत्र पर उनके चार भाष्य हैं - (१) ब्रह्मसूत्रभाष्य, (२) अणुभाष्य, (३) अनुव्याख्यान और (४) न्यायविवरण। भगवद्गीता पर उनके दो भाष्य हैं- गीताभाष्य और गीतातात्पर्यनिर्णय। ईश, केन, प्रश्न, मुण्डक, कठ, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और माण्डूक्य, दश उपनिषदों पर उनके अलग-अलग भाष्य हैं। भागवततात्पर्यनिर्णय, महाभारत-तात्पर्यनिर्णय, ऋग्भाष्य (ऋग्वेद के प्रथम ४० सूक्तों का भाष्य) और तन्त्रसारसंग्रह उनके अन्य ग्रन्थ हैं। इनके अतिरिक्त उनके द्वारा रचित दश प्रकरण ग्रन्थ हैं - प्रमाणलक्षण, उपाधिखण्डन, मायावाद-खण्डन, तत्त्वोद्योत, कथालक्षण, प्रपंचमिथ्यात्वानुमानखण्डन, तत्त्वसंख्यान, तत्त्वविवेक, विष्णुतत्त्वनिर्णय और कर्मनिर्णय। यमकभारत, नरसिंहनखस्तुति, द्वादशस्तोत्र, कृष्णामृतमहार्णव, सदाचारस्मृति, यतिप्रणवकल्प और कृष्णजयन्तीनिर्णय मध्वाचार्य के अन्य ग्रन्थ हैं। इन सभी ग्रन्थों में ब्रह्मसूत्र के चारों भाष्यों का विशेष महत्त्व है। मध्व ब्रह्मसूत्र को निर्णायकशास्त्र तथा अन्य शास्त्रों को निर्णय शास्त्र मानत है।
(१) ब्रह्मसूत्रभाष्य को पूर्णप्रज्ञभाष्य भी कहते हैं। इसमें ब्रह्मसूत्र का संक्षेप में अर्थ किया गया है। मध्व ने अपने अर्थ के पक्ष में पुराणों तथा आगमों से अनेक उद्धरण दिये हैं। इस पर जयतीर्थ की तत्त्वप्रकाशिका टीका है और तत्त्वप्रकाशिका पर व्यासतीर्थ की तात्पर्यचन्द्रिका टीका है। इस प्रकार माध्व-वेदान्त के मुनित्रय का सम्बन्ध ब्रह्मसूत्रभाष्य से हो गया है। अतः यह ग्रन्थ माध्व-वेदान्त में महत्त्वपूर्ण है। किन्तु इसको समझने के लिए मध्वाचार्य के उन अन्य तीन ग्रन्थों का अध्ययन भी अपेक्षित है जिन्हें उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर लिखा है। यह उल्लेखनीय है कि मध्वाचार्य ब्रह्मसूत्र के प्रत्येक सूत्र के आदि और अन्त में ॐ का प्रयोग करते हैं, जैसे उनके ब्रह्मसूत्रभाष्य में ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ के स्थान पर “ॐ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॐ” ऐसा सूत्र मिलता है।
(२) अणुभाष्य में केवल ३४ अनुष्टुप् श्लोकों में ब्रह्मसूत्र के अधिकरणों का संक्षेप दिया गया है।
(३) अनुव्याख्यान मध्वाचार्य की सर्वश्रेष्ठ कृति है। यह पद्य में है। इसमें ब्रह्मसूत्र की व्याख्या के साथ ही साथ अद्वैतवाद का विशद खण्डन किया गया है। इस पर त्रिविक्रम पंडित ने तत्त्वप्रदीप नामक टीका लिखी है, जयतीर्थ ने न्यायसुधा नामक एक विशालकाय व्याख्या लिखी है और राघवेन्द्र यति ने न्यायसुधा पर परिमल नामक टीका लिखी है। न्यायसुधा जयतीर्थ की सर्वश्रेष्ठ कृति है। इसके बारे में प्रसिद्धि है : “सुधा वा पठनीया वसुधा वा पालनीया" अर्थात् न्यायसुधा का अध्ययन करना उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना किसी राज्य का संचालन करना। न्यायसुधा का अध्ययन और राज्य-संचालन अथवा राज्यसेवा, इन दो विकल्पों में अधिकांश विद्वानों ने प्रथम विकल्प को चुना है और माध्ववेदान्त की महान् सेवा की है।
(४) न्यायविवरण में ब्रह्मसूत्र के अधिकरणों का संक्षेप तथा ब्रह्मसूत्र में उठाये गये सभी पूर्वपक्षों तथा सिद्धान्तपक्षों का गद्य में विवेचन है। इस पर भी जयतीर्थ की टीका है जो अपूर्ण है। उसे रघूत्तम तीर्थ ने बाद में पूरा किया है।
मध्व ने शास्त्रार्थ में अद्वैतवादी त्रिविक्रम पंडित को परास्त किया था। त्रिविक्रम पंडित तब मध्वाचार्य के शिष्य हो गये थे। उनके पुत्र नारायण भट्ट ने मध्वविजय और मणिमंजरी नामक दो ग्रन्थ लिखे। प्रथम ग्रन्थ में मध्वाचार्य की जीवनी है।
मध्वाचार्य द्वारा रचित सम्पूर्ण ग्रन्थ निम्नलिखित हैं-
ब्रह्मसूत्रभाष्यम्
अणुभाष्यम् (सर्वशास्त्रार्थसंग्रहः)
अनुव्याख्यानम्
न्यायविवरणम्
गीताभाष्यम्
गीतातात्पर्यम् (गीतातात्पर्यनिर्णयः)
दशोपनिषद्भाष्यम्
ऋग्भाष्यम्
महाभारततात्पर्यनिर्णयः
भागवततात्पर्यनिर्णयः
यमकभारतम्
उपाधिखण्डनम्
मायावादखण्डनम्
प्रपंचमिथ्यात्वानुमानखण्डनम्
तत्त्वोद्योतः
विष्णुतत्त्वविनिर्णयः
तत्त्वविवेकः
तत्त्वसांख्यानम्
कर्मनिर्णयः
कथालक्षणम्
प्रमाणलक्षणम्
तन्त्रसारसंग्रहः
द्वादशस्तोत्रम्
कृष्णामृतमहार्णवः
सदाचारस्मृतिः
जयन्तीनिर्णयः
यतिप्रणवकल्पः
न्यासपद्धतिः
तिथिनिर्णयः
कन्दुकस्तुतिः
नरसिंहनखस्तुतिः
श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ