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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मत्तविलास प्रहसन

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right|thumb|मालाबार के मन्दिरों में कूडियाट्टम् नामक प्राचीन संस्कृत नाट्यपरम्परा में मत्तविलासप्रहसन का मंचन ; कलाकार : मणि दामोदर चक्यार (कपाली की भूमिका में) मत्तविलास प्रहसन (शाब्दिक अर्थ : शराबी की खुशी) एक प्राचीन संस्कृत एकांकी नाटक है। यह सातवीं शताब्दी की शुरुआत में विद्वान राजा महेन्द्रवर्मन प्रथम (571- 630 सीई) द्वारा लिखित दो महान एकांकी नाटकों में से एक है।Bhat and Lockwood, pg. 51 यह संस्कृत का प्राचीनतम प्रहसन है। यह प्रहसन छोटा होने पर भी बड़ा रोचक है। इसमें मदिरा के नशे में धूत एक कापालिक की मनोदशा का वर्णन है। इस नाटक में धार्मिक आडंम्बरो पर कटाक्ष है तथा बौद्ध तथा कापालिकों की हँसी उड़ाई गयी है। इस नाटक में एक शाक्य भिक्षु है जिसे पूरा विश्वास है कि बुद्ध के पिटक ग्रन्थोंं की मूल प्रति में सुरापान और स्त्री-समागम का समावेश अवश्य रहा होगा। उसे लगता है कि यह वृद्ध बौद्धों का युवा बौद्धों के विरुद्ध रचा हुआ षड्यन्त्र है। वह उस मूल पिटक के अनुसंधान में रत है, वह उसे खोजना चाहता है। या उनमें यह प्रावधान जोड़ऩा चाहता है। इसी कर्म में वह शाक्य भिक्षु निमग्न रहता है। एक दिन बौद्ध-मठ जाते हुए वह सोचता है-’अत्यंत दयालु भगवान बुद्ध ने महलों में निवास, सुन्दर सेज लगे पलंगों पर शयन, पहले प्रहर में भोजन, अपराह्म में मीठे रसों का पान, पाँचों सुगन्धों से युक्त ताम्बूल और रेशमी वस्त्रों का पहनना इत्यादि उपदेशों से भिक्षु-संघ पर कृपा करते हुए क्या स्त्री-सहवास और मदिरापान का विधान भी नहीं किया होगा? अवश्य किया होगा। अवश्य ही इन निरुत्साही तथा दुष्ट वृद्ध बौद्धोंं ने हम नवयुवकों से डाह कर पिटक-ग्रन्थों में स्त्री-सहवास और सुरापान के विधान को अलग कर दिया है। इस नाटक मे तांत्रिक कपाली का कपाल ( कटोरा) खो जाता है तो वह अनुमान लगाता है कि क्योकि इसमे भोजन का मास लगा हुआ था इसलिये या तो कोई कुत्ता उठा कर ले गया होगा या फिर कोई बौद्ध भिक्षु। बौद्ध भिक्षु जी बुद्ध को बिना काम किये खाना पीना धन एशोआराम मिलने के लिये बुद्ध को धन्यवाद देते है और सुरा ( शराब) और किसी भी स्त्री के चक्कर मे लगे हुये है। जब उस बौद्ध भिक्षु से सामना होता है तो वह कपाली बौद्ध भिक्षु से अपना कपाल मांगता है। कहता है कि बौद्धों का तो काम ही चोरी करना है, बौद्ध मत अपने आप मे एक चोरी का मत है जिसने वेदान्त से दर्शन चुरा लिया और महाभारत से कहानियां। दान्तेभ्यो गृहीतार्थान् यो महाभारतादपि । विप्रान् मिषतामेव कृतवान् कोषसञ्चयान् ॥ कथानक कांची नगर के राजमार्ग में सत्यसोम नाम के एक कापालिक मदिरा पीकर देवसोमा नाम की युवती के साथ उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए घूम रहा है। कापालिक धर्म के प्रवर्तक परमशिव की भी वह स्तुति करता है। देवसोमा जैनधर्म सिद्धान्तों द्वारा उसका खण्डन करती है। चोरी हुए अपने कपाल को ढूँढते-ढूँढते वह पूरे काँची नगर का भ्रमण करता है। उसी समय अपने भिक्षापात्र को वस्त्रों में छिपाकर नागसेन नाम के एक बौद्ध भिक्षुक का वहाँ प्रवेश होता है। वह उपासक धनदास के घर से उत्तम भोजन करने के पश्चात् राजविहार के लिए जा रहा था। कपाल के चोर को खोजते हुए सत्यसोम भी वहाँ पहुँचता है। कापालिक के प्रश्न करने पर नागसेन उत्तर देता है कि बुद्ध के उपदेशानुसार ही वह कपाल को गुप्त रखकर चलता है। नागसेन देवसोमा के सौन्दर्य का अवलोकन करता है। देवसोमा कापालिक से मदिरा पीकर शक्ति अर्जित करने एवं बौद्ध भिक्षुक नागसेन से तर्क करने का प्रस्ताव रखती है। सत्यसोम तो नागसेन को भी मदिरा पिलाने के लिए देवसोमा से कहता है। मधुमत्त कापालिक बलपूर्वक नागसेन से भिक्षापात्र हड़पने का प्रयास करता है, किन्तु नागसेन के प्रहार से वह भूमि पर पसर जाता है। देवसोमा भी लहरी से गिर जाती है। नागसेन देवसोमा को उठाने के लिए उसका हाथ पकड़ता है। तब कापालिक चिल्लाता है कि नागसेन उसकी प्रियतमा का पाणिग्रहण कर रहा है। तभी वहाँ बभ्रुकल्प नामक बौद्ध भिक्षु प्रवेश करता है। नागसेन उसको बुद्ध का धर्मोपदेश सुनाता है। किन्तु उसके बाद फिर से उनके बीच कपाल को लेकर झगड़ा होता है। तब बभ्रुकल्प उनसे इस विषय पर निर्णय लेने हेतु न्यायालय जाने को कहता है। इसी समय एक पागल आदमी अपने हाथ में एक कपाल लेकर वहाँ आ पहुँचता है। चोरी हुए अपने कपाल को कापालिक उसके हाथों से अपनाता है और कापालिक प्रसन्न हो जाता है। वह नागसेन से क्षमा माँगता है। भरतवाक्य के साथ प्रहसन की समाप्ति होती है।मत्तविलासप्रहसनम् सन्दर्भ इन्हें भी देखें प्रहसन बाहरी कड़ियाँ मत्तविलासप्रहसनम् (संस्कृत विकिस्रोत) मत्तविलास प्रहसन श्रेणी:संस्कृत नाटक