411 REFERENCE · Wikipedia
सुनीता-मगही का प्रथम उपन्यास
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
सुनीता Sunita-Magahi-Novel.jpg 200px सुनीता जयनाथ पति 1927 मगही भारत सामाजिक प्रिंट
सुनीता 1927 में रचित मगही भाषा का पहला उपन्यास है।रासबिहारी पांडेय, मगही साहित्य व साहित्यकार, लोकसाहित्य संगम, 1976 इसकी रचना नवादा (बिहार) के मोख्तार बाबू जयनाथ पतिBindeshwari Prasad Sinha, Kayasthas in Making of Modern Bihar, Impression Publication, 2003, p 252 ने की थी। उपन्यास की कथावस्तु सामाजिक रूढ़ि बेमेल विवाह और उसका नकार है।मगही साहित्य का इतिहास, मगही अकादमी, 1998 सामाजिक वर्जना को तोड़ने और अंतरजातीय विवाह संबंध की वकालत करने वाले नायिका केन्द्रित इस उपन्यास को प्रकाशन के बाद समाज के उच्च जातियों का जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था।मुख बंध, ‘फूल बहादुर’, दूसरा संस्करण, 1974 वर्तमान में इस उपन्यास की एक भी प्रति उपलब्ध नहीं है।
उपन्यास की कथावस्तु
‘सुनीता’ 1930 के दशक में लिखा गया एक सामाजिक और क्रांतिकारी उपन्यास है। उपन्यास की नायिका सुनीता एक उच्च जाति वाले एक सभ्रांत परिवार की लड़की है। परिवार वाले उसका विवाह एक जाति-समाज के एक धनी लेकिन वृद्ध व्यक्ति से कर देते हैं। सुनीता इस अनमेल विवाह को पसंद नहीं करती है। बचपन से ही उसका लगाव गांव के एक निम्न जाति के लड़के के साथ रहता है जो युवावस्था में आपसी प्रेम में परिणत हो चुका है। वह परिवार-समाज द्वारा की गई शादी का बंधन तोड़कर अपने निम्न जातीय प्रेमी के चली जाती है। सुनीता का यह कदम उसके परिवार-समाज को बर्दाश्त नहीं होता है। उसके बिरादरी वाले कचहरी में मुकदमा दायर कर सुनीता और उसके प्रेमी को दंडित कराना चाहते हैं। सुनीता इस सामाजिक और कानूनी हमले का प्रतिवाद करती है। बड़ी बहादुरी से वह समाज और मुकदमे का सामना करती है और अंततः विजयी होती है।
उपन्यास की आलोचना
‘सुनीता’ उपन्यास पर पहली परिचयात्मक समीक्षा सुप्रसिद्ध भाषाविद् सुनीति कुमार चटर्जी ने लिखी है। अप्रैल 1928 के ‘द मॉडर्न रिव्यू’ में वे लिखते हैं, ‘दक्षिण बिहार की मगही भाषा में अपनी तरह का यह पहला प्रकाशन है जिसके द्वारा हमारे समक्ष एक भयावह सामाजिक बुराई का उद्घाटन होता है। मगही समाज के जिन कुछ पहलुओं की तस्वीर इस कहानी में चित्रित की गई है, निःसंदेह वे अत्यंत विश्वनीय हैं, लेकिन इसमें चरित्रों का बहुत अधिक विकास नहीं हो सका है। यह एक छोटा-सा काम है परंतु प्राथमिक तौर पर भाषाई दृष्टि से बेशकीमती है। ...एक कृति के रूप में इस मौजूदा प्रयास को आने वाले दिनों में भारतीय भाषा और सामाजिक नृवंशविज्ञान के छात्रा निश्चित रूप से याद करेंगे क्योंकि इसमें भाषाई और सामाजिक तथ्यों का संग्रहण है।’‘द मॉडर्न रिव्यू’, अंक 43, अप्रैल 1928, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कलकत्ता, पृष्ठ 430
इन्हें भी देखें
जयनाथ पति
फूल बहादुर : मगही का पहला उपलब्ध उपन्यास
खाँटी किकटिया : मगही का नवीनतम उपन्यास
मगही साहित्यकार
सन्दर्भ
श्रेणी:भारतीय साहित्य
श्रेणी:भारतीय उपन्यास
श्रेणी:मगही उपन्यास