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411 समाचार
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मीमांसासूत्र

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मीमांसासूत्र , भारतीय दर्शन के सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थों में से एक है। इसके रचयिता महर्षि जैमिनि हैं। इसे पूर्वमीमांसासूत्र भी कहते हैं। इसका रचनाकाल ३०० ईसापूर्व से २०० ईसापूर्व माना जाता है। मीमांसासूत्र, मीमांसा दर्शन का आधारभूत ग्रन्थ है। परम्परानुसार ऋषि जैमिनि को महर्षि वेद व्यास का शिष्य माना जाता है। धर्म और वेद-विषयक विचार को मीमांसा कहते हैं। इस दर्शन का जिज्ञास्य विषय धर्म है। इस दर्शन में वेदार्थ का विचार होने से इसे मीमांसा दर्शन कहते हैं। इस दर्शन में यज्ञों की दार्शनिक दृष्टि से व्याख्या की गई है। इसके मुख्य तीन भाग हैं। प्रथम भाग में ज्ञानोपलब्धि के मुख्य साधनों पर विचार है। दूसरे भाग में अध्यात्म-विवेचन है और तीसरे भाग में कर्तव्या-कर्तव्य की समीक्षा है। मीमांसा दर्शन में ज्ञानोपलब्धि के साधन-भूत छह प्रमाण माने गये हैं –१. प्रत्यक्ष, २. अनुमान, ३. उपमान, ४. शब्द, ५. अर्थोपत्ति और ६. अनुपलब्धि। इस दर्शन के अनुसार वेद अपौरुषेय, नित्य एवं सर्वोपरि है। वेद में किसी प्रकार की अपूर्णता नहीं है, अतः हमारा कर्तव्य वही है, जिसका प्रतिपादन वेद ने किया है। हमारा कर्तव्य वेदाज्ञा का पालन करना है। यह मीमांसा का कर्त्तव्याकर्त्तव्यविषयक निर्णय है। मीमांसा का ध्येय मनुष्यों को सुःख प्राप्ति कराना है। मीमांसा में सुःख प्राप्ति के दो साधन बताए गये हैं – निष्काम कर्म और आत्मिक ज्ञान। मीमांसा दुःखों के अत्यन्ताभाव को मोक्ष मानता है। मीमांसासूत्र काे 'पूर्वमीमांसा' तथा वेदान्त काे 'उत्तरमीमांसा' भी कहा जाता है। पूर्ममीमांसा में धर्म का विचार है और उत्तरमीमांसा में ब्रह्म का। अतः पूर्वमीमांसा काे 'धर्ममीमांसा' तथा उत्तरमीमांसा काे 'ब्रह्ममीमांसा' भी कहा जाता है। जैमिनि मुनि द्वारा रचित सूत्र हाेने से मीमांसा काे 'जैमिनीय धर्ममीमांसा' कहा जाता है। पूर्वमीमांसा में वेद के यज्ञपरक वचनों की व्याख्या बड़े विचार के साथ की गयी है। मीमांसा शास्त्र में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है, इससे इसे 'यज्ञविद्या' भी कहते हैं । बारह अध्यायों में विभक्त होने के कारण यह मीमांसा 'द्वादशलक्षणी' भी कहलाती है। इस शास्त्र का 'पूर्वमीमांसा' नाम इस अभिप्राय से नहीं रखा गया है कि यह उत्तरमीमांसा से पहले बना। 'पूर्व' कहने का तात्पर्य यह है कि कर्मकाण्ड मनुष्य का प्रथम धर्म है, ज्ञानकाण्ड का अधिकार उसके उपरान्त आता है । 'मीमांसा' शब्द का अर्थ (पाणिनि के अनुसार) 'जिज्ञासा' है। जिज्ञासा, अर्थात् जानने की लालसा। मनुष्य जब इस संसार में अवतरित हुआ उसकी प्रथम जिज्ञासा यही रही थी कि वह क्या करे? ग्रन्थ का आरम्भ ही महिर्ष जैमिनि इस प्रकार करते हैं- अथातो धर्मजिज्ञासा॥ (अब धर्म (करने योग्य कर्म) के जानने की लालसा है।) अतएव इस दर्शनशास्त्र का प्रथम सूत्र मनुष्य की इस इच्छा का प्रतीक है। इस ग्रन्थ में ज्ञान-उपलब्धि के जिन छह साधनों की चर्चा की गई है, वे हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि। मीमांसा दर्शन के अनुसार वेद अपौरूषेय, नित्य एवं सर्वोपरि है और वेद-प्रतिपादित अर्थ को ही धर्म कहा गया है। इसके दूसरे सूत्र में कहा गया है- चोदनालक्षणार्थो धर्मः ( वेद में जिसकी प्रेरणा की गयी है, वह पदार्थ धर्म है। अर्थात् वेद में लिखे अनुसार कर्म करना धर्म है और उसमें निषेध किये हुए कर्म का न करना भी धर्म है।) मीमांसा का तत्वसिद्धान्त विलक्षण है। कई लोग इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में करते हैं। आत्मा, ब्रह्म, जगत् आदि का विवेचन इसमें नहीं है। यह केवल वेद वा उसके शब्द की नित्यता का ही प्रतिपादन करता है। इसके अनुसार मन्त्र ही सब कुछ हैं। वे ही देवता हैं; देवताओं की अलग कोई सत्ता नहीं। 'भट्टदीपिका' में स्पष्ट कहा है 'शब्दमात्रं देवता' । परन्तु मूल मीमांसासूत्र इसके विपरीत ईश्वरवाद के प्रमाण देता है। मीमांसा में में शंका की गई कि– लोके कर्माणि वेदवत् ततोऽधिपुरुषज्ञानम् -६,२.१६ 'लोक में भी वेद की भाँति कर्म किये जाते हैं, उनसे ही परमात्मा का ज्ञान हो जायेगा, फिर वेद के मानने की क्या आवश्यकता है) इसी बात की पुष्टि आगे है– अपराधेऽपि च तैः शास्त्रम् -६,२.१७ (अपराध करने पर लौकिक पुरुष भी अपराधी के लिये दंड बता देते हैं,फिर वेद के मानने की कोई आवश्यकता नहीं।) समाधान– अशास्त्रात् तूपसम्प्राप्तिः शास्त्रं स्यान् न प्रकल्पकं तस्माद् अर्थेन गम्येताप्राप्ते शास्त्रम् अर्थवत् -६,२.१८ ( यदि वेद को न माना जाये, तो परमात्मा का प्राप्ति अशास्त्रीय हो जायेगी, इसलिये शास्त्र को मानना चाहिये। इंद्रियगोचर परमेश्वर के बतलाने से शास्त्र सार्थक है, निरर्थक नहीं।) मीमांसकों का तर्क यह है कि सब कर्म, फल के उद्देश्य से होते हैं। फल की प्राप्ति कर्म द्वारा ही होती हैं अतः वे कहते हैं कि कर्म और उसके प्रतिपादक वचनों के अतिरिक्त ऊपर से और किसी देवता या ईश्वर को मानने की क्या आवश्यकता है। परन्तु ये बातें बाद के मीमांसकों की हैं महर्षि जैमिनि इसके विपरीत ईश्वरवादी थे। वे वेदव्यास के शिष्य थे, जो कि परमास्तिक थे, और ब्रह्मसूत्रों के रचयिता थे। भला, वे कैसे नास्तिक हो सकते हैं। मीमांसादर्शन में कहीं पर भी ईश्वर के अस्तित्व का खण्डन नहीं मिलता है। मीमांसकों और नैयायिकों में बड़ा भारी भेद यह है कि मीमांसक शब्द को नित्य मानते हैं और नैयायिक अनित्य । यह एक भ्राँति है कि सांख्य और मीमांसा दोनों अनीश्वरवादी माने जाते हैं, पर वेद की प्रामाणिकता दोनों मानते हैं । परन्तु मीमांसदर्शन में इसके विपरीत ईश्वर को मानने के कई प्रमाण मिलते हैं।ऊपर कई सूत्र दिये जा चुके हैं, उसी तरह एक सूत्र वेदांतदर्शन में भी है– ब्राह्मणे जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः॥ ( वेदान्त ४/४/५) (जैमिनि आचार्य का मत है कि मुक्ति में जीव ब्रह्म के आनंद आदि गुणों को धारण करता है।) इससे सिद्ध है कि जैमिनि जी आत्मा,परमात्मा,मुक्ति आदि मानते थे भले मीमांसदर्शन में यज्ञादि कर्म मूल विषय होने से इनका अधिक उल्लेख न हुआ हो। भेद इतना ही है कि सांख्य प्रत्येक कल्प में वेद का नवीन प्रकाशन मानता है, और मीमांसक उसे नित्य अर्थात् कल्पान्त में भी नष्ट न होनेवाला कहते हैं। परन्तु ये भी कोई परस्परविरोध नहीं है। मीमांसा के अनुसार शब्द नित्य है क्योंकि ईश्वर का ज्ञान नित्य है, और सांख्य के अनुसार हर कल्प के आरंभ में परमात्मा ऋषियों को वेदों का उपदेश करता है, जिसे वेदोत्पत्ति कहा जाता है। == संरचना == मीमांसा दर्शन १६ अध्यायों का है, जिसमें १२ अध्याय क्रमबद्ध हैं। शास्त्रसंगति, अध्यायसंगति, पादसंगति और अधिकारसंगतियों से सुसंबद्ध है। इन बारह अध्यायों में जो छूट गया है, उसका निरूपण शेष चार अध्यायों में किया गया है जो 'संकर्षकाण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है। उसमें देवता के अधिकार का विवेचन किया गया है, अत: उसे 'देवता काण्ड' भी कहते हैं अथवा द्वादश अध्यायों का परिशिष्ट भी कह सकते हैं। भास्कर राय दीक्षित ने संकर्षण काण्ड की व्याख्या के अंत में लिखा है कि षोडषाध्यायी मीमांसा के रहते हुए भी मध्य काल में द्वादशाध्याय का ही पठनपाठन होता था। (१) इस दर्शन के प्रथमाध्याय में धर्मप्रमाणों का निरूपण किया गया है और विधि, अर्थवाद मंत्र, स्मृति, शिष्टाचार, नामधेय, संदिग्धार्थ निर्णायक वाक्यशेष और सामर्थ्य का निरूपण किया गया है। (२) द्वितीयाध्याय में शब्दांतर, अभ्यास, संख्या, संज्ञा, गुण और प्रकरणांतर, ये छह कर्म भेद के प्रमाण हैं। (३) तृतीयाध्याय में श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या ये छ: विनियोजक (अंगता बोधक) प्रमाण हैं। (४) चतुर्थाध्याय में, श्रुति अर्थ, पाठ, स्थान, मुख्य और प्रवृत्ति में छह बोधक प्रमाण हैं। (५) पंचमाध्याय में अतिदेश, प्रत्यक्षवचनातिदेश, नामातिदेश, कल्पित वचनातिदेश, आश्रयातिदेश और स्थानापत्ति अतिदेश ये सात प्रकार के अतिदेश हैं। अंत के दो भेद सप्तमअध्याय में वर्णित नहीं हैं। ये इंद्रिय कामाधिकरण तथा स्थानापत्ति अतिदेश में निरूपित हैं। (६) छठे अध्याय में यज्ञों के करने और करानेवालों के अधिकार का निर्णय है। (७) सातवें और आठवें में एक यज्ञ की विधि को दूसरे यज्ञ में करने का वर्णन है। (८) आठवें अध्याय में एक यज्ञ की विधि को दूसरे यज्ञ में करने का वर्णन है। (९) नवम अध्याय में तीन प्रकार के "ऊह" का निरूपण है (मंत्रोह, सामोह, संस्कारोह)। (१०) दशमाध्याय में तीन प्रकार के 'बाध' (अर्थलोप, प्रत्याम्नाय, प्रतिषेध ) का निरूपण है। (११) एकादशाध्याय में तंत्र और आवाय का निरूपण है। (१२) द्वादशाध्याय में "प्रसंग" का निरूपण है। इस प्रकार एक-एक विषय का प्रतिपादन द्वादशाध्यायात्मक मीमांसा दर्शन में किया गया है जिसे "द्वादशलक्षणी" भी कहा गया है। यहाँ 'लक्षण' शब्द अध्यायवाचक है। इसको दो प्रकार से विभक्त किया गया है जिसे उपदेश और अतिदेश कहते हैं। प्रथम (पूर्वषट्क) अध्यायों में उपदेश का विवेचन है। द्वितीय (उत्तरषट्क) के छह अध्यायों में अतिदेश का विवेचन है। उक्त उपदेश अतिदेश द्वय विचारात्मक शास्त्र है। शास्त्र दीपिकाकार पार्थसारथि मिश्र के अनुसार उपदेश विचार के अनंतर अतिदेश विचार का आरंभ होता है। वर्तमान काल में उपलब्ध मीमांसा दर्शन में द्वादश अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में चार पाद होते हैं, किंतु तृतीय, षष्ठ और दशम अध्यायों में आठ आठ पाद हैं, जिसे "शबरा" अध्याय भी कहते हैं। इस तरह संपूर्ण ग्रंथ में साठ पाद हैं। इस दर्शन की सूत्रसंख्या में विवाद है। किसी के मत में दो सहस्र छह सौ बावन (2652), किसी के मत में दो सहस्र सात सौ बयालीस (2742) सूत्र हैं। उपर्युक्त वर्णन "ऐसेकित" की "कर्ममीमांसा" नामक पुस्तक पृष्ठ चार में प्रतिपादित है। आनंद आश्रम पूना से प्रकाशित "न्यायमाला" में दो सहस्र सात सौ पैंतालीस (2745) सूत्रों का प्रतिपादन है। इसी प्रकार कुछ व्यक्तियों के मत से अधिकरण संख्या नौ सौ सात (907) प्राप्त होती है। कुछ के मत से नौ सौ पंद्रह (915) सूत्र हैं। किंतु "मीमांसासार संग्रह" के कर्ता शंकर भट्ट के अनुसार "पूर्वषट्क" में पाँच सौ तीस, (530) उत्तरषट्क में चार सौ सत्तर (470) सूत्र हैं। इस प्रकार संपूर्ण अधिकरण एक सहस्र संख्या में विभाजित है। नत्वागणेशवाग्रामगुर्वङ्घ्रीन्भट्टशङ्करः। सहस्रं वक्ति सिद्धान्तान् सार्धश्लोकशतद्वयात्॥ उपर्युक्त श्लोक के अनुसार अधिकरणों की संख्या एक सहस्र दो सौ पचास (1250) है। मीमांसा में प्रत्येक अधिकरण के पाँच भाग हैं— विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और सिद्धान्त । अतः सुत्रों को समझने के के लिये यह जानना आवश्यक होता है कि कोई सूत्र इन पाँचों में से किसका प्रतिपादक है। इस शास्त्र में वाक्य, प्रकरण, प्रसंग या ग्रंथ का तात्पर्य निकालने लिये बहुत सूक्ष्म नियम और युक्तियाँ दी गई हैं। मीमांसकों का यह श्लोक सामान्यतः तात्पर्यनिर्णय के लिये प्रसिद्ध हैं— उपक्रमोपसंहारौ अभ्यासोऽपूर्वताफलम् । अर्थवादोपपत्ति च लिङ्ग तात्पर्यनिर्णये ॥ अर्थात् किसी ग्रंथ या प्रकरण के तात्पर्यनिर्णय के लिये सात बातों पर ध्यान देना चाहिए— उपक्रम (आरम्भ), उपसंहार (अन्त), अभ्यास (बार-बार कथन), अपूर्वता (नवीनता), फल (ग्रंथ का परिणाम वा लाभ जो बताया गया हो), अर्थवाद (किसी बात को जी में जमाने के लिये दृष्टांत, उपमा, गुणकथन आदि के रूप में जो कुछ कहा जाय और जो मुख्य बात के रूप में न हो), और उपपत्ति (साधक प्रमाणों द्वारा सिद्धि) । मीमांसक ऐसे ही नियमों के द्वारा वेद के वचनों का तात्पर्य निकालते हैं। शब्दार्थों का निर्णय भी विचारपूर्वक किया गया है । जैसे, यज्ञ के लिये जहाँ 'सहस्र संवत्सर' हो, वहाँ 'संवत्सर' का अर्थ दिवस लेना चाहिए, इत्यादि। मीमांसाशास्त्र कर्मकांड का प्रतिपादक है; अतः मीमांसक पौरुषेय, अपौरुषेय सभी वाक्यों को कार्यपरक मानते हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक वाक्य किसी व्यापार या कर्म का बोधक होता है, जिसका कोई फल होता है। अतः वे किसी बात के सम्बन्ध में यह निर्णय करना बहुत आवश्यक मानते हैं कि वह 'विधि-वाक्य' (प्रधान कर्म सूचक) है अथवा केवल अर्थवाद (गौण कथन, जो केवल किसी दूसरी बात को जी में बैठाने, उसके प्रति उत्तेजना उत्पन्न करने, आदि के लिये हो) । जैसे, "रणक्षेत्र में जाओ, वहाँ स्वर्ग रखा है"। इस वाक्य के दो खंड हैं — 'रणक्षेत्र में जाओ' यह तो विधिवाक्य या मुख्य कथन है, और 'वहाँ स्वर्ग रखा है' यह केवल अर्थवाद या गौण बात है। == भाष्य == इसके सूत्र जैमिनि के हैं और भाष्य शबर स्वामी का है। मीमांसासूत्र पर कुमारिल भट्ट के 'कातंत्रवार्तिक' और 'श्लोकवार्तिक' भी प्रसिद्ध हैं । माधवाचार्य ने भी 'जैमिनीय न्यायमाला विस्तार' नामक एक भाष्य रचा है । == इन्हें भी देखें == मीमांसा दर्शन == बाहरी कड़ियाँ == मीमांसासूत्र (संस्कृत विकिस्रोत) Mimamsa Sutras Of Jaimini, Translated by Mohan Lal Sandal. Full Text of the Mimamsa Sutra, on archive.org == सन्दर्भ ==