411 REFERENCE · Wikipedia
कुली-बेगार आन्दोलन
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
कुली-बेगार आन्दोलन 1921 में उत्तर भारत के बागेश्वर नगर में आम जनता द्वारा अहिंसक आन्दोलन था। इस आन्दोलन का नेतृत्व बद्री दत्त पाण्डे ने किया, तथा आंदोलन के सफल होने के बाद उन्हें 'कुमाऊं केसरी' की उपाधि दी गयी। इस आन्दोलन का उद्देश्य कुली बेगार प्रथा बन्द कराने के लिये अंग्रेजों पर दबाव बनाना था। आंदोलन से प्रभावित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसे 'रक्तहीन क्रांति' का नाम दिया....
परिचय तथा कारण
आम आदमी से कुली का काम बिना पारिश्रमिक दिये कराने को कुली बेगार कहा जाता था। विभिन्न ग्रामों के प्रधानों का यह दायित्व होता था, कि वह एक निश्चित अवधि के लिये, निश्चित संख्या में कुली शासक वर्ग को उपलब्ध करायेगा। इस कार्य हेतु प्रधान के पास बाकायदा एक रजिस्टर भी होता था, जिसमें सभी ग्राम वासियों के नाम लिखे होते थे और सभी को बारी-बारी यह काम करने के लिये बाध्य किया जाता था।
प्रधानो, जमीदारो और पटवारियों के मिलीभगत से व आपसी भेद-भाव के कारण जनता के बीच असन्तोष बढता गया क्योंकि गांव के प्रधान व पटवारी अपने व्यक्तिगत हितों को साधने या बैर भाव निकालने के लिये इस कुरीति को बढावा देने लगे। इस कुप्रथा के खिलाफ लोग एकत्रित होने लगे। कभी-कभी तो लोगों को अत्यन्त घृणित काम करने के लिये भी मजबूर किया जाता था। जैसे कि अंग्रेजों की कमोङ या गन्दे कपङे आदि ढोना। अंग्रेजो द्वारा कुलियों का शारीरिक व मानसिक रूप से दोहन किया जा रहा था, इसके विरोध में भी लोग परस्पर एकजुट होने लगे।
इतिहास
सबसे पहले चन्द शासकों ने राज्य में घोडों से सम्बन्धित एक कर ’घोडालों‘ निरूपति किया था, सम्भवतः कुली बेगार प्रथा का यह एक प्रारंभिक रूप था। आगे चल गोरखाओं के शासन में इस प्रथा ने व्यापक रूप ले लिया लेकिन व अंग्रेजों ने अपने प्रारम्भिक काल में ही इसे समाप्त कर दिया। पर धीरे-धीरे अंग्रेजों ने न केवल इस व्यवस्था को पुनः लागू किया परंतु इसे इसके दमकारी रूप तक पहुंचाया। पहले यह कर तब आम जनता पर नहीं वरन् उन मालगुजारों पर आरोपित किया गया था जो भू-स्वामियों या जमीदारों से कर वसूला करते थे। अतः देखा जाये तो यह प्रथा उन काश्तकारों को ही प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करती थी जो जमीन का मालिकाना हक रखते थे। पर वास्तविकता के धरातल पर सच यह था इन सम्पन्न भू-स्वामी व जमीदारों ने अपने हिस्सों का कुली बेगार, भूमि विहीन कृषकों, मजदूरों व समाज के कमजोर तबकों पर लाद दिया जिन्होंने इसे सशर्त पारिश्रमिक के रूप में स्वीकार लिया। इस प्रकार यह प्रथा यदा कदा विरोध के बावजूद चलती रही।
पृष्ठभूमि
1857 में विद्रोह की चिंगारी कुमाऊं में भी फैली। हल्द्वानी कुमांऊ क्षेत्र का प्रवेश द्वार था। वहां से उठे विद्रोह के स्वर को उसकी प्रारंभिक अवस्था में ही अंग्रेज कुचलने में समर्थ हुए। लेकिन उस समय के दमन का क्षोभ छिटपुट रूप से समय समय पर विभिन्न प्रतिरोध के रूपों में फूटता रहा। इसमें अंग्रेजों द्वारा कुमांऊ के जंगलों की कटान और उनके दोहन से उपजा हुआ असंतोष भी था। यह असंतोष घनीभूत होते होते एक बार फिर बीसवी सदी के पूर्वार्द्व में ’कुली विद्रोह‘ के रूप में फूट पडा।
1913 में कुली बेगार यहां के निवासियों के लिये अनिवार्य कर दिया गया। इसका हर जगह पर विरोध किया गया, बद्री दत्त पाण्डे जी ने इस आंदोलन की अगुवाई की। अल्मोड़ा अखबार के माध्यम से उन्होंने इस कुरीति के खिलाफ जनजागरण के साथ-साथ विरोध भी प्रारम्भ कर दिया। 1920 में नागपुर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ, जिसमें पं० गोविन्द बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पाण्डे, हर गोबिन्द पन्त, विक्टर मोहन जोशी, श्याम लाल शाह आदि लोग सम्मिलित हुये और बद्री दत्त पाण्डे जी ने कुली बेगार आन्दोलन के लिये महात्मा गांधी से आशीर्वाद लिया और वापस आकर इस कुरीति के खिलाफ जनजागरण करने लगे।
आन्दोलन
14 जनवरी, 1921 को उत्तरायणी पर्व के अवसर पर कुली बेगार आन्दोलन की शुरुआत हुई, इस आन्दोलन में आम आदमी की सहभागिता रही, अलग-अलग गांवों से आये लोगों के हुजूम ने इसे एक विशाल प्रदर्शन में बदल दिया। सरयू और गोमती के संगम (बगड़) के मैदान से इस आन्दोलन का उदघोष हुआ। इस आन्दोलन के शुरू होने से पहले ही जिलाधिकारी द्वारा पं० हरगोबिन्द पंत, लाला चिरंजीलाल और बद्री दत्त पाण्डे को नोटिस थमा दिया लेकिन इसका कोई असर उनपर नहीं हुआ, उपस्थित जनसमूह ने सबसे पहले बागनाथ जी के मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की और फिर 40 हजार लोगों का जुलूस सरयू बगड़ की ओर चल पड़ा, जुलूस में सबसे आगे एक झंडा था, जिसमें लिखा था “कुली बेगार बन्द करो”, इसके बाद सरयू मैदान में एक सभा हुई, इस सभा को सम्बोधित करते हुये बद्रीदत्त पाण्डे जी ने कहा “पवित्र सरयू का जल लेकर बागनाथ मंदिर को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा करो कि आज से कुली उतार, कुली बेगार, बरदायिस नहीं देंगे।” सभी लोगों ने यह शपथ ली और गांवों के प्रधान अपने साथ कुली रजिस्टर लेकर आये थे, शंख ध्वनि और भारत माता की जय के नारों के बीच इन कुली रजिस्टरों को फाड़कर संगम में प्रवाहित कर दिया।
अल्मोडा का तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डायबल भीड़ में मौजूद था, उसने भीड़ पर गोली चलानी चाही, लेकिन पुलिस बल कम होने के कारण वह इसे मूर्त रूप नहीं दे पाया।
इस सफल आंदोलन के बाद जनता ने बद्री दत्त पाण्डे जी को कुमाऊं केसरी की उपाधि दी, इस आन्दोलन का लोगों ने समर्थन ही नहीं किया बल्कि कड़ाई से पालन भी किया और इस प्रथा के विरोध में लोगों का प्रदर्शन जारी रहा। इसकी परिणिति यह हुई कि सरकार ने सदन में एक विधेयक लाकर इस प्रथा को समाप्त कर दिया। इस आंदोलन से महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुये और स्वयं बागेश्वर आये और चनौंदा में गांधी आश्रम की स्थापना की। इसके बाद गांधी जी ने यंग इंडिया में इस आन्दोलन के बारे में लिखा कि “इसका प्रभाव संपूर्ण था, यह एक रक्तहीन क्रान्ति थी।”
सन्दर्भ
http://www.jagran.com/uttarakhand/bageshwar-13438992.html रक्तहीन क्रांति का मूक गवाह है सरयू बगड़ 3 जुलाई 2017 13 जनवरी 2016 दैनिक जागरण बागेश्वर
कुली बेगार उन्मूलन का माध्यम बना उत्तरायणी मेला http://www.amarujala.com/uttarakhand/bageshwar/Bageshwar-70475-114 3 जुलाई 2017 12 जनवरी 2014 अमर उजाला बागेश्वर https://web.archive.org/web/20170906074828/http://www.amarujala.com/uttarakhand/bageshwar/Bageshwar-70475-114 6 सितंबर 2017 live
कुली उतार आंदोलन ने से मिली थी नई ऊर्जा http://www.amarujala.com/uttarakhand/bageshwar/porter-was-removed-from-the-new-energy-movement 3 जुलाई 2017 15 अगस्त 2016 अमर उजाला बागेश्वर https://web.archive.org/web/20160822145811/http://www.amarujala.com/uttarakhand/bageshwar/porter-was-removed-from-the-new-energy-movement 22 अगस्त 2016 live
http://www.jagran.com/uttarakhand/almora-10401645.html 1857 के गदर से आई कुमाऊं में क्रांति की लहर 3 जुलाई 2017 17 मई 2016 दैनिक जागरण अल्मोड़ा
Uttarayani fest to bring Kumaon, Garhwal together कुमाऊं, गढ़वाल को एक साथ लाएगा उत्तरायणी मेला http://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/Uttarayani-fest-to-bring-Kumaon-Garhwal-together/articleshow/45744879.cms 3 जुलाई 2017 3 जनवरी 2015 टाइम्स ऑफ इंडिया अल्मोड़ा en https://web.archive.org/web/20160727200713/http://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/Uttarayani-fest-to-bring-Kumaon-Garhwal-together/articleshow/45744879.cms 27 जुलाई 2016 live
श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम