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सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन सिद्धांत
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सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन सिद्धान्त (Harmonious construction principle) भारतीय कानूनी प्रणाली में उपयोग की जाने वाली वैधानिक व्याख्या का एक सिद्धांत है। यह मानता है कि जब एक कानूनी पाठ के दो प्रावधानों में टकराव प्रतीत होता है, तो उनकी व्याख्या की जानी चाहिए ताकि प्रत्येक का एक अलग प्रभाव हो और न तो अनावश्यक या रद्द हो।https://www.worldcat.org/oclc/800640012 The Indian Constitution Khosla Madhav Oxford University Press 2012 9780198075387 New Delhi 57–59 800640012https://books.google.com/books?id=6paAbw4DKbYC&pg=PA5 Interpretation Of Statutes Kafaltiya A. B. 2008 Universal Law Publishing 9788175346697 5 en
जब कोई निश्चित विधायी अधिनियम पारित किया जाता है तो यह सुनिश्चित किया जाता है कि कानून का पाठ स्पष्ट हो, न कि अस्पष्ट। दो या दो से अधिक कानूनों या किसी विशेष कानून के अनुभागों के बीच विसंगतियों के मामले में, सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन के सिद्धांत का पालन किया जाता है।
उत्पत्ति
इस सिद्धांत के उपयोग का पता शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951) मामले में, पहले संवैधानिक संशोधन से लगाया जा सकता है, जहाँ मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत के बीच मतभेद था। न्यायालय ने भारतीय संविधान में हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन के नियम को लागू किया तथा कहा कि मौलिक अधिकार एवं राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत एक ही सिक्के के दो अलग-अलग पहलू हैं और इसलिये यह कहते हुए उनमें सामंजस्य स्थापित किया कि वे जनता की भलाई के लिये हैं।
आयकर आयुक्त बनाम हिंदुस्तान बल्क कैरियर (2003) मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित सिद्धांत निर्धारित किये हैं, जो सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन के सिद्धांत को नियंत्रित करते हैं:
(१) प्रावधानों की व्याख्या करते समय, न्यायालयों को प्रावधानों में होने वाले टकराव की समस्त परिस्थितियों से बचने की आवश्यकता है। उन्हें सामंजस्यपूर्ण तरीके से समझा जाना चाहिये।
(२) न्यायालयों द्वारा व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिये कि एक प्रावधान दूसरे प्रावधान पर हावी न हो जब तक कि कोई संभावित अर्थ न निकले।
(३) यदि स्थिति ऐसी है कि विरोधाभासी प्रावधानों में सामंजस्य बिठाना असंभव हो जाता है, तो न्यायालयों को इस तरह से निर्णय लेना चाहिये कि दोनों प्रावधान प्रभावी हो जाएँ।
(४) कोई भी अर्थान्वयन जो विधि के एक प्रावधान (या दो अलग-अलग कानूनों के मामले में किसी अन्य कानून) को बेकार या मृत पत्र (dead letter) प्रदान करता है, उसे प्रभावी नहीं बनाया जाना चाहिये। ऐसा अर्थान्वयन सामंजस्यपूर्ण नहीं है।
(५) सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन वह है, जो अन्य प्रावधानों पर हावी नहीं होता है।
सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन के सिद्धांत की प्रयोज्यता
न्यायालयों ने उक्त सिद्धान्त की प्रयोज्यता के लिये निम्नलिखित उपाय किये हैं:
दोनों खंडों को अधिकतम बल के साथ उनकी विसंगति को कम किया जा सकता है।
दोनों खंड जो स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के विरोधाभासी या प्रतिकूल हैं, उन्हें समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिये और संपूर्ण अधिनियम पर विचार किया जाना चाहिये।
दो विपरीत खंडों में से व्यापक पहुँच वाले को चुनें।
व्यापक और संकीर्ण प्रावधानों की तुलना करें और यह देखने के लिये व्यापक कानून का विश्लेषण करने का प्रयास करें कि क्या इसके कोई अन्य परिणाम होंगे। यदि परिणाम दोनों खंडों में सामंजस्य स्थापित करने और उन्हें अलग-अलग पूर्ण बल देने जितना निष्पक्ष है तो किसी अन्य जाँच की आवश्यकता नहीं है। ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रावधान लागू करते समय विधायिका उस स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ थी, जिसे वह संबोधित करने का प्रयास कर रही थी और इस प्रकार अपनाए गए सभी प्रावधानों को दायरे में पूर्ण प्रभाव दिया जाना चाहिये।
जब किसी अधिनियम का एक प्रावधान दूसरे अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों को अधिग्रहीत कर लेता है तो एक गैर-अस्थायी खंड का उपयोग किया जाना चाहिये।
ऐतिहासिक मामले
केरल शिक्षा विधेयक (1951) के संबंध में
इस मामले में, उच्चतम न्यायालय ने माना कि मौलिक अधिकारों का निर्णय करते समय न्यायालय को निदेशक सिद्धांतों पर विचार करना चाहिये और सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन के सिद्धांत को अपनाना चाहिये। इसलिये संतुलन बनाकर दो संभावनाओं को यथासंभव प्रभावी बनाया जाता है।
ईस्ट इंडिया होटल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ (2001)
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उक्त अधिनियम को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिये, विभिन्न प्रावधानों को सुसंगत बनाना होगा और उन सभी पर प्रभाव डालना होगा।
सन्दर्भ
श्रेणी:भारत में कानून