411 REFERENCE · Wikipedia
भारत में विधिक शिक्षा
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
भारत के सन्दर्भ में विधिक शिक्षा से आशय अपना पेशा शुरू करने से पहले अधिवक्ताओं को दी जाने वाली शिक्षा से है। भारत में विधि की शिक्षा परम्परागत विश्वविद्यालयों के साथ-साथ कानून की शिक्षा के लिये स्थापित कुछ विशिष्ट विश्वविद्यालयों द्वारा दी जाती है।
शैक्षिक डिग्रियाँ
भारत में विधि की शिक्षा तभी ली जा सकती है जब किसी भी क्षेत्र में पूर्वस्नातक की डिग्री प्राप्त कर ली गयी हो। किन्तु राष्ट्रीय विधि विद्यालय के मॉडल के अनुसार १०+२ उतीर्ण होने के बाद पाँच-वर्षीय एकीकृत विधि पाठ्यक्रम में भी प्रवेश लिया जा सकता है।
विधि स्नातक (Bachelor of Laws (LL.B.))
एकीकृत पूर्वस्नातक डिग्रियाँ - B.A. LL.B., B.Sc. LL.B., BBA. LLB., B.Com. LL.B. (इनकी अवधि प्रायः ५ वर्ष की होती है।)
विधि में मास्टर डिग्री ( Master of Laws (LL.M.)) यह एक या दो वर्ष की परास्नातक डिग्री है।
व्यावसायिक विधि में मास्टर डिग्री
पी-एच डी (Ph.D.)
एकीकृत MBL-LLM/ MBA-LLM. - प्रायः तीन वर्षीय दो डिग्री वाला एकीकृत पाठ्यक्रम, व्यावसायिक विधि में विशिष्टता के साथ
पाठ्यक्रम
विधि की शब्दावली
सन १९४७ में भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व विधि के क्षेत्र में हिंदी और भारत की अन्य जनवाणियों का प्रयोग बहुत ही
सीमित प्रदेश में हो रहा था। अंग्रेजों के शासन की स्थापना के पहले उत्तरी भारत के अधिकतर हिंदी भाषी
क्षेत्रों में शासन व्यवस्था में फारसी का प्रयोग किया जाता था। अंग्रेजों की शासन प्रणाली विधि के एक
विशेष प्रकार के निर्वचन (interpretation) पर आधारित थी। इस कारण अंग्रेजी भाषा का विधि के क्षेत्र में उनके द्वारा प्रयोग
किया जाना स्वाभाविक था। प्रारंभ में अंग्रेजों ने फारसी को भारतीय भाषाओं में सर्वोच्च स्थान दिया किंतु
आगे चलकर इसका प्रयोग 1837 में समाप्त कर दिया।
भाषा प्रयोग से बनती है, प्रयोगशाला में नहीं। हिन्दी का शासन में प्रयोग न होने के कारण इसमें
ऐसी विधि शब्दावली की कमी थी जो इंग्लैंड में पनपी विधि की संकल्पनाओं को अभिव्यक्त कर सके।
विधान की भाषा और न्यायालय की भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग नगण्य था। 1787 में ब्रिटिश पार्लमेंट
ने यह उपबंध किया था कि भारत संबंधी विधि के भारतीय भाषा में अनुवाद प्रकाशित किए जाएं। प्रारंभ में
कुछ अनुवाद हिंदी में तैयार किए गए। 1882 में भारत सरकार ने यह निर्णय किया कि पश्चिमोत्तर सीमा
प्रांत से बिहार की पूर्वी सीमा तक और हिमालय से मध्य प्रदेश की दक्षिणी सीमा तक के समस्त क्षेत्र के
लिए केंद्रीय विधेयकों और अधिनियमों के उर्दू अनुवाद ही तैयार किए जाएंगे और भारत सरकार उन्हें ही
प्रकाशित कराएगी। बाद में भारत सरकार ने उन अनुवादों को कुछ क्षेत्रों के लिए देवनागरी लिपि में भी
प्रकाशित करने का निर्णय किया। उन उर्दू अनुवादों का ही प्रयोग उक्त क्षेत्रों के न्यायालयों द्वारा किया
जाने का भी निर्णय किया गया। इस निर्णय से न्यायालय में हिंदी के प्रयोग को आघात पहुंचा। अभी तक
उर्दू का प्रयोग फारसी लिपि में हो रहा था अब वही उर्दू, देवनागरी लिपि में प्रस्तुत कर दी गई। इस कारण
से हिंदी का विधि के क्षेत्र में अलग से अस्तित्व ही समाप्त हो गया। जिस प्रदेश में हिंदी विधि शब्दावली का
प्रादुर्भाव और प्रयोग होना था उस प्रदेश में अरबी-फारसी प्रधान उर्दू शब्दावली का प्रचलन विधि के क्षेत्र
में करा दिया गया।
सन् 1895 में काशी नागरी प्रचारणी सभा ने सर एंटनी को एक अभ्यावेदन दिया था जिसमें
देवनागरी लिपि के प्रयोग को संयुक्त प्रांत में अनुमत करने की मांग की गई थी। 1897 में एक शिष्टमडल
भी मिला। 1901 में न्यायालयों में देवनागरी लिपि के प्रयोग की अनुमति दी गई।
1935 के भारत शासन अधिनियम की धारा 85 में विधान परिषदों की भाषा अंग्रेजी रखी गई।
इसी प्रकार विधान सभा की भाषा अंग्रेजी घोषित की गई। 8.10.1947 को उत्तर प्रदेश में हिंदी भाषा तथा
देवनागरी लिपि को परिषद् की भाषा के रूप में स्वीकार किया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उत्तर प्रदेश
की विधान सभा ने अपनी पहली बैठक में हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि को विधान सभा की भाषा और
लिपि के रूप में अपनाया। इसी प्रकार अन्य हिंदी भाषी राज्यों में भी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् ही विधान
सभाओं में हिंदी का प्रवेश हुआ।
कुछ देशी राज्यों में (अलवर, इंदौर, ओड़छा, कोटा आदि) हिंदी में कार्य करने की पहल की गई
थी। किंतु सही दिशा निर्देश के अभाव में वस्तुस्थिति यह रही कि देवनागरी लिपि में अरबी-फारसी के
बोझिल शब्दों का प्रयोग करके एक विचित्र सी भाषा का प्रयोग होने लगा। हिंदी को विधि और न्यायालय
के क्षेत्र से बाहर रखने का एक परिणाम यह हुआ कि हिंदी में विधि संबंधी संकल्पनाओं को अभिव्यक्त
करने के लिए पर्याप्त शब्दावली नहीं बन पाई। दूसरा परिणाम यह हुआ कि विधि में निष्णात् ऐसे व्यक्तियों
का भी अभाव हो गया जो हिंदी में प्रारूपण (Drafting) करने या विधि के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग करने में पर्याप्त रूप से
सक्षम हों। शब्दावली के अभाव को दूर करने के लिए तत्कालीन बड़ौदा (वडोदरा) राज्य में एक वैज्ञानिक
प्रयास हुआ। इसके फलस्वरूप 1931 में सयाजी शासन शब्द कल्पतरु नामक शब्दकोष प्रकाशित
हुआ। दस स्तंभों का यह कोष ग्रंथ एक अपूर्व प्रयोग था। इसके प्रथम स्तंभ में अंग्रेजी शब्द रखा गया और
उसके पश्चात् क्रमशः गुजराती, मराठी, संस्कृत, उर्दू, फारसी, हिंदी, बंगला, वडोदरा में प्रचलित शब्द
तथा वडोदरा के लिए प्रस्तावित मानक शब्द रख गए थे। ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी में विधि की
शब्दावली को संकलिप करने का प्रथम व्यक्तिगत प्रयास ग्वालियर में हुआ। ग्वालियर के
श्री परमेश्वरदयाल श्रीवास्तव ने 1939 में "श्रीवास्तव ला डिक्शनरी" प्रकाशित की। इसमें अंग्रेजी में
प्रयुक्त विधि के पारिभाषिक शब्दों के हिंदी पर्याय दिए गए। इसी कार्य को आगे बढ़ाते हुए ग्वालियर के
श्री हरिहरनिवास द्विवेदी ने "शासन शब्द संग्रह" प्रकाशित किया। श्री द्विवेदी ने ही ग्वालियर राज्य के
अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए ग्वालियर राज्य के तत्कालीन सभी अधिनियमों का हिंदी में प्राधिकृत
पाठ प्रकाशित किया। अधिनियमों का हिंदी में अनुवाद करने का यह पहला राजकीय प्रयास था। ये
अनुवाद विधि और भाषा दोनों दृष्टिकोणों से उच्च कोटि के है। 1948 में राहुल सांकृत्यायन के
संपादकत्व में हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से "प्रशासन शब्दकोश" प्रकाशित हुआ।
भारत के लिए संविधान सभा के निर्माण के पश्चात् यह अनुभव किया गया कि हिंदी में पारिभाषिक
विधि शब्दावली की कमी को दूर किया जाना चाहिए। संविधान सभा ने 17 सितंबर, 1949 को एक
प्रस्ताव पारित करके सभा के अध्यक्ष को यह प्राधिकार दिया था कि वे संविधान का हिंदी अनुवाद
प्रकाशित कराएं। यह उत्तरदायित्व निभाते हुए संविधान सभा के अध्यक्ष डा० राजेन्द्र प्रसाद ने बड़ी
दूरदर्शिता का परिचय दिया। इस विषय में डा. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान के हिंदी अनुवाद के प्राक्कथन में
जो कहा वह उल्लेखनीय है :
"भारतीय संविधान-सभा ने एक प्रस्ताव द्वारा मुझे यह अधिकार दिया था कि मैं अध्यक्ष की हैसियत से, संविधान का हिंदी अनुवाद, 26 जनवरी, 1950 तक तथा उसके बाद यथाशीघ्र अन्य भाषाओं में भी इसके अनुवाद प्रकाशित करा दूं। मुझे यह वांछनीय प्रतीत हुआ कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में संविधान के जो अनुवाद तैयार किए जाएं उन सब में, अगर संभव हो तो, संविधान में प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों के लिए जिनका कि विशेष सांविधानिक या कानूनी अर्थ है, एक ही पर्याय प्रयोग में लाए जाएं। इसलिए मैंने भाषा-विशेषज्ञों का एक सम्मेलन बुलाया कि वह, जहां तक संभव हो, ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रस्तुत करे जो प्रायः सर्वत्र प्रयुक्त होते हों और जिनको हम विभिन्न भाषाओं में निकलने वाले संविधान के अनुवादों में प्रयुक्त कर सकें और अंततोगत्वा जिनको हम अन्य सरकारी, कानूनी, अदालती और शासन संबंधी कामों में भी प्रयुक्त कर सकें। यह सम्मेलन मध्य प्रांतीय विधान सभा के अध्यक्ष श्री घनश्यामसिंह गुप्त के सभापतित्व में समवेत हुआ। इसमें अनुसूची 8 में दी हुई सभी भाषाओं के प्रख्यात विद्वान प्रतिनिधि स्वरूप सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन ने संविधान में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों का एक कोष तैयार किया और अनुवाद-समिति ने, जिसे कि संविधान के हिंदी रूपान्तर का काम सौंपा गया था हिंदी अनुवाद तैयार करने में केवल इन्हीं शब्दों का प्रयोग किया है।
संभव है कि संविधान के इस अनुवाद में प्रयुक्त कई शब्द कुछ लोगों को फिलहाल बिल्कुल नए से प्रतीत हों। पर इस संबंध में यह याद रखना चाहिए कि ये शब्द भारत की अधिकांश भाषाओं के प्रतिनिधियों को स्वीकार्य हैं और इसलिए देश के अधिकांश लोगों को या तो अभी या निकट भविष्य में अवश्य बोधगम्य हो जाएंगे।"
डा राजेन्द्र प्रसाद के मार्गदर्शन में हुए संविधान शब्दावली के कार्य से यह स्पष्ट हो गया कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए एक बड़ी सीमा तक समान और प्रामाणिक शब्दावली तैयार की जा सकती है। मानक और सर्वसम्मत शब्दावली निर्माण का यह पहला प्रयत्न था।
राजभाषा आयोग, 19562 ने अपने प्रतिवेदन में पृष्ठ 513 पर इस संबंध में यह कहा है :
"भारतीय भाषाओं में नई पारिभाषिक शब्दावली का विकास करने के सिलसिले में एक पहलू की ओर हम विशेष ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे। जांच के दौरान लगभग सब लोगों ने यह विचार प्रकट किया कि संघ की भाषा और प्रादेशिक भाषाओं में पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण करते समय यह आदर्श रखना चाहिए कि उनमें, अधिक से अधिक एकसूत्रता हो। हम ऊपर देख चुके हैं कि अतीत में भी 'शास्त्रों' के विवेचन या उनकी टीका के लिए भारतीय भाषाओं में जिस विशिष्ट शब्दावली का व्यवहार हुआ है उसमें पर्याप्त सादृश्य था। भारत में भाषा की समस्या के निदान के लिए हमारी राय में यह आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं में सहायक शब्द भंडार विकसित करते समय एकसूत्रता के इस सिद्धांत को ध्यान में रखा जाए।
इसी तरह कई बार संस्कृत से निकले युग्म-शब्दों में से किसी एक को किसी भाषा में सरल एवं प्रचलित माना जाता है जबकि अन्य भाषाओं में कठिन और कृत्रिम माना जाता है। कुछ भी हो यह समस्या ब्यौरेवार विचार करते समय उठती है और सो भी कभी-कभी ही, और यद्यपि इसका ध्यान रखना आवश्यक है, तथापि उपरोक्त सिद्धांत पर अमल करने में विशेष कठिनाई नहीं होगी।"
विधि की भाषा की विशेषता पर विचार करते हुए राजभाषा आयोग ने यह कहा था :
"कानून की भाषा सुनिश्चित, संक्षिप्त और सुस्पष्ट होनी चाहिए। देश भर के अनेक न्यायालयों में इस भाषा की व्याख्या की जाएगी जो मुख्यतः कानूनों में प्रयोग में लाई हुई भाषा के व्याकरण-सम्मत सामान्य अर्थ के आधार पर ही विचार करेंगे, उन शब्दों में छिपे हुए उद्देश्यों या अभिप्रायों के आधार पर नहीं। जहां तक विचार-विमर्श की भाषा का संबंध है, अपने विचार प्रकट करने में संबद्ध वक्ताओं की सुविधा और सुगमता को ध्यान में रखना अधिक महत्वपूर्ण है, और जहां तक कानूनों की भाषा का प्रश्न है, मुख्यतः निश्चितता, संक्षिप्तता और अधिक से अधिक स्पष्टता का ध्यान रखना आवश्यक होता है।"
इस आदेश के अनुपालन में 1961 में राजभाषा (विधायी) आयोग की स्थापना की गई। इस आयोग को निम्नलिखित कार्य सौंपे गए :
(1) यथासंभव सभी राजभाषाओं में प्रयोग के लिए प्रामाणिक विधि शब्दावली तैयार करना और उसे प्रकाशित करना,
(2) सभी केंद्रीय अधिनियमों और राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों और विनियमों के हिंदी में प्राधिकृत पाठ तैयार करना,
(3) किसी केंद्रीय अधिनियम या राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित किसी अध्यादेश या विनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों, विनियमों और आदेशों के प्राधिकृत हिंदी पाठ तैयार करना,
(4) केंद्रीय अधिनियमों और राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों और विनियमों का राज्यों की. अपनी-अपनी राजभाषाओं में अनुवाद और किसी भी राज्य में पारित अधिनियमों और प्रख्यापित अध्यादेशों के उस सूरत में जिसमें कि
ऐसे अधिनियमों या अध्यादेशों के पाठ हिन्दी से भिन्न भाषा में है, हिंदी में अनुवाद कराने का प्रबंध करना, और
(5) अन्य ऐसे कर्तव्यों का पालन करना जो समय-समय पर भारत सरकार द्वारा सौंपे जाएं।
आयोग ने शब्दावली निर्माण की जो प्रक्रिया अपनाई वह उल्लेखनीय है। आयोग ने शब्द-कोश का निर्माण नहीं किया। आयोग ने केंद्रीय अधिनियमों का हिंदी रूपांतरण तैयार किया। उसको तैयार करते समय जो पारिभाषिक शब्द प्रयोग किए गए उनका संकलन करके उसे विधि शब्दावली के रूप में प्रकाशित किया। इससे यह लाभ हुआ कि उस शब्द का विधि साहित्य में वास्तव में प्रयोग हुआ और यह भी निश्चय हो सका कि शब्द उपयुक्त है अथवा नहीं। आयोग में हिंदी के अतिरिक्त अन्य 12 भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधि सदस्य के रूप में थे। इस कारण वे जो भी निर्णय लेते थे वह अखिल भारतीय दृष्टि से लेते थे। अतएव जो ध्येय डा. राजेन्द्र प्रसाद ने समिति के समक्ष रखा था और जिसे राजभाषा आयोग के प्रतिवेदन में और राष्ट्रपति के आदेश में अंगीकार किया गया था उस उद्देश्य का आयोग ने सदैव ध्यान रखा।
1970 तक अनेक महत्वपूर्ण अधिनियमों का हिंदी में प्राधिकृत पाठ प्रकाशित कर दिया गया। भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, सिविल प्रक्रिया संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, संपत्ति अंतरण अधिनियम आदि प्रमुख अधिनियमों के हिंदी पाठ प्रकाशित हो चुके थे। अतएव राजभाषा (विधायी) आयोग ने 1970 में उस विधि शब्दावली का प्रकाशन किया जिसमें उन शब्दों और पदों का समावेश किया गया जिनका उन अधिनियमों के हिंदी पाठ में प्रयोग किया गया था। इस शब्दावली में लगभग 10,000 प्रविष्टियां थीं।
1976 में भारत सरकार ने यह निर्णय लिया कि आयोग को समाप्त करके यह कार्य विधि मंत्रालय के विधायी विभाग में किया जाए। इस निर्णय के पश्चात् आयोग के स्थान पर विधायी विभाग का राजभाषा खंड कार्य कर रहा है। उसे वे सभी कार्य सौंपे गए हैं जो पहले राजभाषा (विधायी) आयोग को दिए गए थे।
1979 में राजभाषा खंड ने विधि शब्दावली का परिवर्धित संस्करण निकाला। केंद्रीय अधिनियमों में जिन शब्दों और अभिव्यक्तियों का प्रयोग हुआ उन सबका इस संस्करण में समावेश कर दिया गया। लेटिन की जो अभिव्यक्तिया और सूक्तियां विधि में प्रचलित हैं उनका अर्थ और उनकी व्याख्या भी सम्मिलित कर दी गईं। अधिनियमों के प्राधिकृत नामों को भी वर्णक्रम से इसमें मुद्रित किया गया जिससे उनके प्रति निर्देश करने में सुविधा हो।
1983 में शब्दावली का तीसरा संस्करण राजभाषा खंड ने प्रकाशित किया जिसमें लगभग 37,000 प्रविष्टियां थीं।
विधि शब्दावली का चौथा संस्करण -- १९८८
विधि शब्दावली का पांचवाँ संस्करण --
विधि शब्दावली का छठा संस्करण -- २००१
विधि शब्दावली का सातवाँ संस्करण -- २०१५
विधि शब्दावली का आठवाँ संस्करण -- २०२६
बाहरी कड़ियाँ
कानून का पाठ
श्रेणी:विधि
श्रेणी:भारत में शिक्षा