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411 समाचार
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अल्मोड़ा के पर्यटन स्थल

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अल्मोड़ा भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ मण्डल में स्थित एक नगर एवम् जनपद है। यह कुमाऊँ पर शासन करने वाले चन्दवंशीय राजाओं की राजधानी भी रहा है। इसके पूर्व में पिथौरागढ़ जनपद, पश्चिम में गढ़वाल क्षेत्र, उत्तर में बागेश्वर जनपद और दक्षिण में नैनीताल जनपद है। किले अंगूठाकार|300px|लाल मंडी का किला, (फोर्ट मोइरा) अल्मोड़ा, १८१५ खगमरा किला अल्मोड़ा नगर के पूर्वी छोर पर 'खगमरा' नामक किला है। इस किले का निर्माण चंद शासक राजा भीष्मचन्द ने 16वीं शताब्दी में करवाया। अल्मोड़ा को पहले आलमनगर नाम से भी पुकारा जाता था। मल्लाताल किला दूसरा किला अल्मोड़ा नगर के मध्य में है। इस किले का नाम 'मल्लाताल' है। इसे कल्याणचन्द ने सन् १५६३ ई. में बनवाया था। कहते हैं, उन्होंने इस नगर का नाम आलमनगर रखा था। वहीं चम्पावत से अपनी राजधानी बदलकर यहाँ लाये थे। आजकल इस किले में अल्मोड़ा जिले के मुख्यालय के कार्यलय हैं। लालमण्डी किला तीसरा किला अल्मोड़ा छावनी में है, इस लालमण्डी किला कहा जाता है। अंग्रेजों ने जब गोरखाओं को पराजित किया था तो इसी किले पर सन् १८१६ ई. में अपना झण्डा फहराया था। अपनी खुशी प्रकट करने हेतु उन्होंने इस किले का नाम तत्कालीन गवर्नर जनरल के नाम पर - 'फोर्ट मायरा' रखा था। परन्तु यह किला 'लालमण्डी किला' के नाम से अदिक जाना जाता है। इस किले में अल्मोड़ा के अनेक स्थलों के भव्य दर्शन होते हैं। रायलाकोट नगर के उत्तर-पश्चिम में, एक पर्वत के अंत में, रायलाकोट का किला था, जो कि पूर्वकाल में रायला समुदाय के एक राजा का महल था। कहा जाता है कि इस महल में स्फटिक के खंभे फिट थे। अाज भी इस किले के खंडहर विद्यमान् हैं। रायलाओं के वंशज अल्मोड़ा में चन्दों के आने तक उपस्थित थे। अल्मोड़ा नगर के पर्यटन स्थल मोहनजोशी पार्क : इस जगह पर एक ताल का निर्माण किया गया है। मानव निर्मित 'v' आकार के इस ताल की सुन्दरता इतनी आकर्षक है कि सैलानी घंटों इसी के पास बैठकर प्रकृति की अद्भुत छवि का आनन्द लेते रहते हैं। यहाँ का मोहक और शान्त वातावरण पर्यटकों के लिए काफी सुखद अनुभव रहता है। मटेला: मटेला का सुखद वातावरण सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र है। यहाँ के बाग अत्यन्त सुन्दर हैं। 'पिकनिक' के लिए कई पर्यटक यहाँ अपने-अपने दलों के साथ आते हैं। नगर से १० कि॰मी॰ की दूरी पर एक प्रयोगात्मक फार्म भी है। राजकीय संग्रहालय : अल्मोड़ा में राजकीय संग्रहालय और कला-भवन भी है। कला प्रेमियों तथा इतिहास एवं पुरातत्व के जिज्ञासुओं के लिए यहाँ पर्याप्त सामाग्री है। ब्राइट एण्ड कार्नर : यह अल्मोड़ा के बस स्टेशन से केवल २ कि॰मी॰ कब हूरी पर एक अद्भुत स्थल है। इस स्थान से उगते हुए और डूबते हुए सूर्य का दृश्य देखने हजारों मील से प्रकृति प्रेमी आते रहते हैं। इंगलैण्ड में 'ब्राइट बीच' है। उस 'बीच' से भी डूबते और उगते सूरज का दृश्य चमत्कारी प्रभाव डालने वाला होता है। उसी 'बीच' के नाम पर अल्मोड़ा के इस 'कोने' का नाम रखा गया है। अन्य पर्यटन स्थल उपत : रानीखेत-अल्मोड़ा मोटर-मार्ग के पाँचवें किलोमीटर पर उपत नामक रमणीय स्थल है। कुमाऊँ की रमणीयता इस स्थल पर और भी आकर्षक हो जाती है। उपत में नौ कोनों वाला विशाल गोल्फ का मैदान है। गोल्फ के शौकीन यहाँ गर्मियों में डेरा डाले रहते हैं। रानीखेत समीप होने की वजह से सैकड़ों प्रकृति-प्रेमी और पर्वतारोही भी इस क्षेत्र में भ्रमणार्थ आते रहते हैं। प्रकृति का स्वच्छन्द रूप उपत में छलाक हुआ दृष्टिगोचर होता है। रानीखेत से प्रतिदिन सैलानी यहाँ आते रहते हैं। कालिका : उपत में लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर कालिक नामक स्थल भी अपनी प्राकृतिक छटा के लिए विख्यात है। कालिका में 'कालीदेवी' का मंदिर है। यहाँ काली के भक्त निरन्तर आते रहते हैं। 'कालिका' में वन विभाग की फूलों की एक नर्सरी है। इस नर्सरी के कारण अनेक वनस्पति शास्र के शोधार्थी और प्रकृति-प्रेमी यहाँ जमघट लगाए रहते हैं। मजखाली : कालिक से केवल ७ कि॰मी॰ दूर पर रानीखेत-अल्मोड़ा-मार्ग पर मजखाली का अत्यन्त सौन्दर्यशाली स्थल स्थित है। मजखाली की धरती रमणीय है। यहाँ से हिमालय का मनोहारी हिम दृश्य देखने सैकड़ों प्रकृति-प्रेमी आते रहते हैं। मजखाली से कौसानी का मार्ग सोमेश्वर होकर जाता है। रानीखेत से कौसानी जाने वाले पर्यटक मजखाली होकर ही जाना पसन्द करते हैं। सिमतोला : यह अल्मोड़ा नगर से ३ कि॰मी॰ की दूरी पर 'सिमतोला' का 'पिकनिक स्थल' सैलानियों का स्वर्ग है। प्रकृति के अनोखे दृश्यों को देखने के लिए हजारों पर्यटक इस स्थल पर आते-जाते रहते हैं। धार्मिक पर्यटन स्थल अंगूठाकार|300px|जागेश्वर का मंदिर। ९ वीं से १३ वीं शताब्दी के मध्य निर्मित यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है। अल्मोड़ा में नन्दा देवी के अलावा त्रिपुर सुन्दरी मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर, महावीर मन्दिर, मुरली मनोहर मन्दिर, भैरवनाथ मन्दिर, बद्रीनाथ मन्दिर, रत्नेश्वर मन्दिर और उलका देवी मन्दिर प्रसिद्ध हैं। जामा मस्जिद, मैथोडिस्ट चर्च और अंगलीकन चचें प्रसिद्ध है। जागेश्वर अल्मोड़ा नगर से ३५ किलोमीटर दूर स्थित जागेश्वर धाम के प्राचीन मंदिर इस क्षेत्र को सदियों से आध्यात्मिक जीवंतता प्रदान कर रहे हैं। यहां के मुख्य मंदिर का निर्माण ८वीं और ९वीं शताब्दी में हुआ था।उत्तराखंडः इन 5 जगहों पर मना सकते हैं गर्मियों की छुट्टियां https://www.livehindustan.com/news/mustread/article1-photo-uttrakhand-summer-it-can-convince-these-5-places-528140.html २८ दिसम्बर २०१७ २२ अप्रैल २०१६ हिंदुस्तान https://web.archive.org/web/20171228172000/https://www.livehindustan.com/news/mustread/article1-photo-uttrakhand-summer-it-can-convince-these-5-places-528140.html 28 दिसंबर 2017 dead यहां लगभग २५० मंदिर हैं जिनमें से एक ही स्थान पर छोटे-बडे २२४ मंदिर स्थित हैं। नन्दा देवी मन्दिर : गढ़वाल कुमाऊँ की एक मात्र ईष्ट देवी भगवती नन्दा पार्वती है। नन्दा अष्टमी के दिन सम्पूर्मम पर्वतीय अंचल में नन्दा की विशेष पूजा होती है। नन्दा देवी की मूर्ती केले के पत्तों और केले के तनों से बनाई जाती है। नन्दा की सवारी भी निकाली जाती है। नन्दा अष्टमी भाद्रपद अर्थात् सितम्बर के महीने में आती है। यहाँ पर इस दिन बहुत बड़ा मेला लगता है। इस दिन दर्शनार्थी आकर पूजा करते हैं। मेले में झोड़ा, चाँचरी और छपेली आदि नृत्यों का भी सुन्दर आयोजन होता है। कुमाऊँ के कई अंचलों की लोकनृत्य की पार्टियाँ यहाँ आकर अपना-अपना कौशल दिखाती हैं, पर्यटक, पदारोही, सैलानी और साहित्य एवं कला प्रेमी इन्ही दिनों अधिकतर कुमाऊँ की संस्कृति तता वहाँ के जन-जीवन की वास्तविक जानकारी करने हेतु अल्मोड़ा पहुँचते हैं। अल्मोड़ा की नन्दा देवी के दर्शन करना अत्यन्त लाभकारी माना जाता है। कसार देवीमंदिर : यह मुख्य नगर से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर से हिमालय की ऊँची-ऊँची पर्वत श्रेणियों के दर्शन होते हैं। कसार देवी का मंदिर भी दुर्गा का ही मंदिर है। कहते हैं कि इस मंदिर की स्थापना ईसा के दो वर्ष पहले हो चुकी थी। इस मंदिर का धार्मिक महत्त्व बहुत अधिक आंका जाता है। चितई मंदिर : कुमाऊँ के प्रसिद्ध लोक - देवता 'गोल्ल' का यह मंदिर नन्दा देवी की तरह प्रसिद्ध है। इस मंदिर का महत्त्व सबसे अधिक बताया जाता है। अल्मोड़ा से यह मंदिर लगभग 13किलोमीटर (टेकसी स्टैड से) की दूरी पर स्थित है। हिमालय की कई दर्शनीय चोटियों के दर्शन यहाँ से होते हैं। कालीमठ : यह अल्मोड़ा से ५ कि॰मी॰ की दूरी पर स्थित है। एक ओर हिमालय का रमणीय दृश्य दिखाई देता है और दूसरी ओर से अल्मोड़ा शहर की आकर्षक छवि मन को मोह लेती है। प्रकृतिप्रेमी, कला प्रेमी और पर्यटक इस स्थल पर घण्टों बैठकर प्रकृति का आनन्द लेते रहते हैं। गोरखों के समय राजपंडित ने मंत्र बल से लोहे की शलाकाओं को भ कर दिया था। लोहभ के पहाड़ी के रूप में इसे देखा जा सकता है। दूनागिरी दूनागिरी अल्मोड़ा जिले में एक पौराणिक पर्वत शिखर का नाम है। द्रोण, द्रोणगिरी, द्रोणपर्वत, द्रोणागिरी, द्रोणांचल, तथा द्रोणांचल पर्वत इसी पर्वत के पर्यायवाची शब्द हैं। कालान्तर के उपरांत द्रोण का अपभ्रंश होते-होते वर्तमान में इस पर्वत को कुमांऊँनी बोली के समरूप अथवा अनुसार दूनागिरी नाम से पुकारा जाने लगा है। इसी पर्वत पर, माँ वैष्णवी का प्राचीनतम शक्तिपीठ मन्दिर है। इसको अब स्थानीय कुमांऊँनी भाषा में माँ दूनागिरी के नाम से जाना जाता है। अत्यन्त प्राचीन काल से दूनागिरी के इस सिद्ध शक्तिपीठ के साथ भारतीय इतिहास और संस्कृति के माहात्म्य जुड़े हुए हैं। कटारमल सूर्य मन्दिर कटारमल सूर्य मन्दिर भारतवर्ष का प्राचीनतम सूर्य मन्दिर है। यह सूर्य मन्दिर अपनी बनावट के लिए विख्यात है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस मन्दिर की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उनका मानना है कि यहाँ पर समस्त हिमालय के देवतागण एकत्र होकर पूजा अर्चना करते रहै हैं। उन्होंने यहाँ की मूर्तियों की कला की प्रशंसा की है। कटारमल के मन्दिर में सूर्य पद्मासन लगाकर बैठे हुए हैं। यह मूर्ति एक मीटर से अधिक लम्बी और पौन मीटर चौड़ी भूरे रंग के पत्थर में बनाई गई है। यह मूर्ती बारहवीं शताब्दी की बतायी जाती है। कोर्णाक के सूर्य मन्दिर के बाद कटारमल का यह सूर्य मन्दिर दर्शनीय है। कोर्णाक के सूर्य मन्दिर के बाहर जो झलक है, वह कटारमल मन्दिर में आंशिक रूप में दिखाई देती है। कटारमल के सूर्य मन्दिर तक पहुँचने के लिए अल्मोड़ा से रानीखेत मोटरमार्ग के रास्ते से जाना होता है। अल्मोड़ा से १४ कि॰मी॰ जाने के बाद ३ कि॰मी॰ पैदल चलना पड़ता है। मन्दिर १५५४ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अल्मोड़ा से कटारमल मंदिर १७ कि॰मी॰ की निकलकर जाता है। रानीखेत से सीतलाखेत २६ कि॰मी॰ दूर है। १८२९ मीटर की ऊँचाई पर बसा हुआ है। कुमाऊँ में खुले मैदान के लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। कुमाऊँ का यह ऐसा खिला हुआ रमणीय स्थान है यहाँ देश के कोने-कोने से हजारों बालचर तथा एन.सी.सी. के कैडेट अपने-अपने शिविर लगाकर प्रशिक्षण लेते हैं। यहाँ ग्रीष्म ॠतु में रौनक रहती है। प्रशिक्षण के लिए यहाँ पर्याप्त व्यवस्था है। दूर-दूर तक कैडेट अपना कार्यक्रम करते हुए, यहाँ आन्नद मनाते हैं। सीतला देवी मन्दिर 'सीतला देवी' का यहाँ प्राचीन मंदिर है। इस देवी की इस सम्पूर्ण क्षेत्र में बहुत मान्यता है। इसीलिए 'सीतलादेवी' के नाम से ही इस स्थान का नाम 'सीतलाखेत' पड़ा है। यहाँ पर्यटकों के लिए पर्याप्त व्यवस्था है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम ने यहाँ पर चार शैय्याओं वाला एक आवासगृह बनाया है। प्रकृति-प्रेमियो के लिए 'सीतलाखेत' का सम्पूर्ण क्षेत्र आकर्षण से बरा हुआ है। 'सीतलाखेत' का मुख्य आकर्षम यह है कि यहाँ से हिमालय के भव्य दर्शन होते हैं। छुट्टियों को शान्तिपूर्वक बिताने के लिए यह अत्युत्तम स्थान है। सन्दर्भ खूबसूरत वादियों में बसा उत्तराखंड का अल्मोड़ा https://www.jagran.com/lifestyle/travel-tourism-if-you-are-peace-lover-then-must-visit-in-almora-18164732.html १२ जुलाई २०१८ ७ जुलाई २०१८ दैनिक जागरण https://web.archive.org/web/20180712182509/https://www.jagran.com/lifestyle/travel-tourism-if-you-are-peace-lover-then-must-visit-in-almora-18164732.html 12 जुलाई 2018 live श्रेणी:अल्मोड़ा