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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

अस्तित्ववाद

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right|thumb|300px|किर्कगार्द, दोस्तोयेव्स्की, नीत्शे तथा सार्त्र (बाएँ से दाएँ, ऊपर से नीचे) अस्तित्ववाद (en existentialism no) मानव केंद्रित दृष्टिकोण हैं अर्थात् वह सम्पूर्ण जगत में मानव को सबसे अधिक प्रदान करता हैं उसकी दृष्टि में मानव एकमात्र साध्य है। प्रकृति के शेष उपादान "वस्तु" है मानव का महत्त्व उसकी "आत्‍मनिष्‍ठता" में हैं न कि उसकी "वस्‍तुनिष्‍ठता" में। विज्ञान, तकनीक के विकास और बुद्‍धिवादी दार्शनिकों ने मानव को एक "वस्तु" बना दिया है जबकि मानव की पहचान उसके अनूठे व्यक्तित्व के आधार पर होनी चाहिए। सार्त्र के अनुसार मनुष्य स्वतंत्र प्राणी हैं। यदि ईश्वर का अस्तित्व होता तो वह संभवतः मनुष्य को अपनी योजना के अनुसार बनाता। किंतु सार्त्र का दावा है कि ईश्वर नहीं है अतः मनुष्य स्वतंत्र है स्वतंत्रता का अर्थ है- चयन की स्वतंत्रता। मनुष्य के सामने विभिन्न स्थितियों में कई विकल्प उपस्थित होते हैं। स्वतंत्र व्यक्ति वह है जो उपयुक्त विकल्प का चयन अपनी अंतरात्मा के अनुसार करता है, न कि किसी बाहरी दबाव में। कीर्केगार्द ने कहा भी है कि 'महान से महान व्यक्ति की महानता भी संदिग्ध रह जाती है, यदि वह अपने निर्णय को अपनी अंतरात्मा के सामने स्पष्ट नहीं कर लेता'। 1940 व 1950 के दशक में अस्तित्ववाद पूरे यूरोप में एक विचारक्रांति के रूप में उभरा। यूरोप भर के दार्शनिक व विचारकों ने इस आंदोलन में अपना योगदान दिया है। इनमें ज्यां-पाल सार्त्र, अल्बर्ट कामू व इंगमार बर्गमन प्रमुख हैं। कालांतर में अस्तित्ववाद की दो धाराएं हो गई। (१) ईश्वरवादी अस्तित्ववाद और (२) अनीश्वरवादी अस्तित्ववाद परिचय अस्तित्ववादी विचार या प्रत्यय की अपेक्षा व्यक्ति के अस्तित्व को अधिक महत्त्व देते हैं। इनके अनुसार सारे विचार या सिद्धांत व्यक्ति की चिंतना के ही परिणाम हैं। पहले चिंतन करने वाला मानव या व्यक्ति अस्तित्व में आया, अतः व्यक्ति अस्तित्व ही प्रमुख है, जबकि विचार या सिद्धांत गौण। उनके विचार से हर व्यक्ति को अपना सिद्धांत स्वयं खोजना या बनाना चाहिए, दूसरों के द्वारा प्रतिपादित या निर्मित सिद्धांतों को स्वीकार करना उसके लिए आवश्यक नहीं। इसी दृष्टिकोण के कारण इनके लिए सभी परंपरागत, सामाजिक, नैतिक, शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक सिद्धांत अमान्य या अव्यावहारिक सिद्ध हो जाते हैं। उनका मानना है कि यदि हम दुःख एवं मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लें तो भय कहाँ रह जाता है। अस्तित्वादी के अनुसार दुःख और अवसाद को जीवन के अनिवार्य एवं काम्य तत्त्वों के रूप में स्वीकार करना चाहिए। परिस्थितियों को स्वीकार करना या न करना व्यक्ति की ही इच्छा पर निर्भर है। इनके अनुसार व्यक्ति को अपनी स्थिति का बोध दु:ख या त्रास की स्थिति में ही होता है, अतः उस स्थिति का स्वागत करने के लिए प्रस्तुत रहना चाहिए। दास्ताएवस्की ने कहा था- ‘‘यदि ईश्वर के अस्तित्व को मिटा दें तो फिर सब कुछ (करना) संभव है।’’ अस्तित्ववाद 'अतित्व' में 'अस्ति' होने का बोध कराता है। यों तो पेड़-पौधे, पशु-पंछी आदि सभी का अस्तित्व होता है। किंतु अस्तित्ववादी अर्थ में मनुष्य का ही अस्तित्व को स्वीकारा गया हैं। व्यक्ति की 'वैयक्तिकता' या 'यूनिकनेस' अस्तित्ववाद का केंद्रीय विवेच्य है। सात्र के अनुसार, गुण के पहले अस्तित्व होता है। वो कहते हैं - "मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है, आत्मसंघर्स करता है, दुनिया से टकराता है और अपने को परिभाषित करता है।" अस्तित्ववादी दर्शन में अनेक विषयों का विवेचन किया गया है, जैसे- स्वतंत्रता, चुनाव, संवेदना, समाज आदि। पर इन सभी की केंद्रीय मुद्दा व्यक्ति ही है। सार्त्र का कहना है कि मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है। अतः स्वतत्रंता 'होने' की बुनियादी शर्त है। स्वतंत्र होकर ही प्रामाणिक जीवन जीया जा सकता है। कामू 'विद्रोह' को स्वतंत्रता का पर्याय कहता है - "मैं विद्रोह करता हूं इसलिए अस्तित्ववान हूँ।" विक्टर इ फ्रान्कल द्वारा अस्तित्ववाद का अनुकरण विक्टर इ फ्रान्कल एक लेखक और मनोचिकित्सक भी हैंI वह विएन्ना चिकित्सा विद्यालय के विश्वविद्यालय में मनोरोग और न्यूरोलॉजी के प्राध्यापक रहे I उनकी मृत्यु सन १९७७ में हुई I उनकी करीब बतीस किताबे चबीस भाषाओँ में अनुवादित की जा चुकी हैंI विश्व युद्ध II के समय उन्होंने अपने तीन साल आउशवित्स, डाख़ाउ और कई अलग यातना शिविर में बिताये। उन्होंने अपनी पुस्तक “मैनस सर्च फॉर मीनिंग”, में लोगोथेरेपी नाम के चिकित्सा के बारें में विस्तार में बताया हैं और यही नहीं इसी पुस्तक में उन्होंने मृत्यु शिविर से अस्तित्ववाद तक के यात्रा के विषय में अपने अनुभव के बहुत सी झलकियाँ दी हैI लोगोथेरेपी को अपना मूल विषय समझकर ही उन्होंने अस्तित्ववाद को परिभाषित करना चाहा और वे कही हद तक इस में सफल भी रहे। लोगोस एक ग्रीक शब्द हैं जिसका शुद्ध रूप हैं ‘अर्थ। लोगोथेरेपी एक मनुष्य के अस्तित्व व मनुष्य के अर्थ की खोज पर धारित हैंI लोगोथेरेपी के आधार पर जीवन में अर्थ के खोज का प्रयास एक मनुष्य का सबसे प्रथम प्रेरक बल हैं। इसी कारण फ्रान्कल ने उच्च महत्त्व जीवन के अर्थ को दिया हैं ना कि आनंद को। अस्तित्व कुंठा मनुष्य के अर्थ के खोज की धारा में हताशा या निराशा का भी बहुत बड़ा भाग होता हैंI लोगोथेरेपी ने इसे अस्तित्व कुंठा का नाम दिया हैंI ‘अस्तित्व’ शब्द को तीन तरीके से उपयोग में डाला जा सकता हैंI (१) अस्तित्व जो अपने आप में अर्थ हैं यानि मनुष्य के जीवन का आधारIFrankl Viktor E Man's Search for Meaning Better Yourself Books Mumbai, India 978-81-7108-638-2 141-142 (२) अस्तित्व का अर्थ, (३) व्यक्तिगत अस्तित्व में ठोस अर्थ के खोज का प्रयासI इस हताशा का परिणाम न्युरोसिस भी हो सकता हैंI विक्टर इ फ्रान्कल अपने मरीजों के तकलीफ द्वारा एक बहुत बड़े प्रश्न को उठाते हैं जो आज के जीवन में सबकी दुर्बलता का कारण बन चुकी हैं, वह हैं ज़िन्दगी में अर्थहीनता का प्रवासI ऐसी तकलीफ अधिकतर उन लोगो में देखी गयी जो मृत्यु शिविर से बच निकलेI इन लोगो में ज़िन्दगी को जीने कि उत्सुकता ही नहीं रहीI उनके ज़ेहन में खोखलापन ही रहा क्यूंकि वे आतंरिक अकेलेपन से गुज़रते हैंI इस खोक्लेपन याह अकेलेपन को जिससे हर इंसान झूझता हैं उसे विक्टर इ फ्रान्कल ने अस्तित्व वाक्युम का नाम दियाI अस्तित्व शून्यता अस्तित्व वाक्यूमFrankl Viktor E Man's Search for Meaning Better Yourself Books Mumbai, India 978-81-7108-638-2 148-149 एक ऐसी घटना हैं जो बीसवी सदी में बहुत ही विख्यात हुई हैंI अस्तित्व वक्युम कि शुरुवात उदासी से होती हैंI इसी अवसर पर फ्रान्कल ‘रविवार न्युरोसिस’Frankl Viktor E Man's Search for Meaning Better Yourself Books Mumbai, India 978-81-7108-638-2 148-149 के बारें में स्पष्ट करते हैंI यह एक तरीके का अवसाद हैं जिसमें व्यक्ति अपने जीवन में संतोष की कमी को महसूस करता हैं और इसका एहसास उसे तब होता हैं जब वह हफ्ते भर के भाग-दोड़ के बाद अपने जीवन के अकेलेपन को महसूस करता हैंI फ्रान्कल के हिसाब से शराबीपन और बाल अपराध के कारणों को तब तक समझा नहीं जा सकता जब तक उससे दबे हुए अस्तित्व वक्युम को मान्यता नहीं मिलतीI यही कारण वृद्ध लोगो और पेंशनर के स्तिथियों में भी लागू होती हैंI यह अस्तित्व वक्युम अलग अलग भेष धारण करते हैं और जीवन के भिन्न भिन्न पहलूओं में मनुष्य के समक्ष प्रस्तुत होती हैंI इनमें से कुछ शक्ति की इच्छा या धन की इच्छा हो सकती हैं जो अर्थ के खोज में मनुष्य के राह को धुंधला कर देती हैंI यह अस्तित्व कुंठा का ही परिणाम हैं जिससे यौन लिबिडो (Sexual libido'')Frankl Viktor E Man's Search for Meaning Better Yourself Books Mumbai, India 978-81-7108-638-2 150 भी अनियंत्रत हो जाती हैंI अस्तित्ववाद का सार लोगोथेरेपी की कोशिश हमेशा यही रहती हैं कि मरीजों को पूरी तरह से अपने कर्तव्य के तरफ मोड़ा जाएI ताकि वह यह समझ सके कि वे किसके लिए, किस लिए और क्यों कर्तव्य से बंधे हुए हैंI फ्रान्कल का यह कहना हैं कि जीवन का वास्तविक अर्थ स्वयं के मानस में नहीं बल्कि संसार में हैंI उसी तरह मानव के अस्तित्त्व का असली उद्देश्य आत्म परिचय से नहीं होताI उसका सार आत्म श्रेष्टता से प्राप्त होती हैंI फ्रान्कल इस बात को न्याय सिद्ध करने के लिए तर्क यह लाते हैं कि आत्म परिचय कभी भी जीवन का आधार नहीं बन सकता क्यूंकि मानव जितना उसे पाने का प्रयत्न करेगा वह उतना उसको खोएगाI संसार को स्वयं कि अभिव्यक्ति कभी नहीं समझना चाहिए, ना ही संसार को एक मात्र साधन याह आत्म परिचय को प्राप्त करने का उपायI इससे यही आशय स्पष्ट होता हैं कि जीवन का अर्थ स्थिर नहीं है, पर इसका कोई छोर भी नहीं हैंI लोगोथेरेपी के अंतर्गत हम जीवन के अर्थ तीन तरीके से ढूंढ सकते हैं: (१) कर्म के माध्यम सेFrankl Viktor E Man's Search for Meaning Better Yourself Books Mumbai, India 978-81-7108-638-2 154; (२) किसी के याह किसी वास्तु के मूल्य को अनुभव करके; (३) पीड़ा सेI पहले तरीके को पूर्ण करना अत्यंत लाभदायक हैI दुसरे और तीसरे तरीकों में पुनः विस्तार कि आवश्यकता हैंI दूसरा तरीका जिससे जीवन में अर्थ का प्रवेश होता हैं वो अनुभवों से ही प्राप्त होता हैं, यह शिक्षा हमें प्रकृति से हो सकती हैं या फिर संस्कृति से या फिर किसी को अनुभव करके भी यानि प्रेम के द्वाराI प्रेम ही वह एक ढाल हैं जिससे मनुष्य के अंतरात्मिक व्यक्तित्व को सींचा जा सकता हैंI कोई भी किसी मनुष्य को तब तक नहीं जान सकता या समझ सकता जब तक प्रेम भाव कि उत्पत्ति नहीं होतीI प्रेम को अध्यात्मिक रूप के अनुसार अगर डाला जाए तो उससे वह दुसरे मनुष्य के महत्वपूर्ण लक्षण को देख सकता हैं, वही मनुष्य जिससे वह प्रेम करता होI इससे भी अधिक वह अपने सामर्थ्य कि पुष्टि हो जाती है जो आत्म परिचय के राह पर बहुत बड़ा कदम हैI इससे दोनों व्यक्ति अपने सामर्थ्य को पहचान जाते हैंI तीसरा तरीका जो मनुष्य को अपने जीवन के अर्थ को खोजने में सहायता करता हैं वह है पीढ़ाI मनुष्य जब भी असहाय या ऐसी परिस्थिति से गुज़रता है जिसका परिणाम उनके हाथ में न हो जैसे: कोई लाइलाज बीमारीFrankl Viktor E Man's Search for Meaning Better Yourself Books Mumbai, India 978-81-7108-638-2 158-159, उसी वक्त एक इंसान को अपनी पहचान को बोध करना का भरपूर मौका मिलता है, अर्थात् कष्ट को झेलकर जीवन का सबसे बड़ा अर्थ पाने का अवसर मिलता हैंI इसमें कष्ट कि तरफ व्यक्ति का नज़रिया भी पीढ़ा को झेलने कि ताकत देता हैI सन्दर्भ फ्रान्कल, विक्टर इ. मैनस सर्च फॉर मीनिंग. मुंबई, भारत: बेटर योरसेल्फ बुक्स. पृष्ट. 135–141, 148–156. ISBN 978-81-7108-638-2. बाहरी कड़ियाँ अस्तित्ववाद *