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411 समाचार
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पश्चिम गंग वंश

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ಪಶ್ಚಿಮ ಗಂಗ ಸಂಸ್ಥಾನ पश्चिम गंग वंश पश्चिम गंग moved from Category:Asia to South Asia दक्षिण एशिया भारत Empire साम्राज्य(३५० ई तक पल्लव वंश के अधीन) Monarchy ३५० १००० सबसे पहले गंग लेख ४०० पल्लव चोल वंश Western-ganga-empire-map.svg मुख्य पश्चिमी गंग क्षेत्र कोलार, तलकाड कन्नड़, संस्कृत जैन, हिन्दू कोंगणिवर्मन माधव राचमल्ल पंचम ३५०-३७० ९८६-९९९ राजा पश्चिम गंग वंश (३५०-१००० ई.) (ಪಶ್ಚಿಮ ಗಂಗ ಸಂಸ್ಥಾನ) प्राचीन कर्नाटक का एक राजवंश था। ये पूर्वी गंग वंश से अलग थे। पूर्वी गंग जिन्होंने बाद के वर्षों में ओडिशा पर राज्य किया। आम धारण के अनुसार पश्चिम गंग वंश ने शसन तब संभाला जब पल्लव वंश के पतन उपरांत बहुत से स्वतंत्र शासक उठ खड़े हुए थे। इसका एक कारण समुद्रगुप्त से युद्ध भी रहे थे। इस वंश ने ३५० ई से ५५० ई तक सार्वभौम राज किया था। इनकी राजधानी पहले कोलार रही जो समय के साथ बदल कर आधुनिक युग के मैसूर जिला में कावेरी नदी के तट पर तालकाड स्थानांतरित हो गयी थी। परिचय right|thumb|200px|पश्चिमी गंगवंश का राजचिह्न (ताम्र प्लेट पर, १०वीं शदी) गंगवंश (पश्चिमी) दक्षिण भारत (वर्तमान कर्नाटक) का एक विख्यात राजवंश था। इसका राज्य ३५० ई से १००० ई तक अस्तित्वमान था। कदाचित यह वंश नागार्जुनी कोंड के इछवाकु वंश की शाखा थी जिसने गुप्त सम्राट् समुद्रगुप्त के दक्षिण अभियान काल में राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित कर लिया था। किंतु इस वंश ने गंग नाम क्यों और किस प्रकार धारण किया, यह अज्ञात है। किंतु कुछ लोग गंगा नदी के नाम के साथ इस नाम के संबंध की कल्पना करते हैं। ये लोग काण्वायन गोत्र के थे और इनकी भूमि गंगवाडी कही गई है। इस वंश का संस्थापक कोंगुनिवर्मन अथवा माधव प्रथम था। उसका शासन कदाचित ३५० और ४०० ई. के बीच रहा। उसी राजधानी कोलार थी। उसके पश्चात माधव द्वितीय (४००-४३५ ई.) शासक हुआ। वह न केवल नीतिशास्त्र का ज्ञाता था वरन उपनिषद का भी विद्वान था। उसने कामसूत्रकार वात्स्यायन के पूर्ववर्ती दत्तक के वेश्या सूत्र पर एक वृत्ति भी तैयार की थी। तदनंतर हरिवर्मन (४५०-४६० ई.) के समय गंगावाड़ी की राजधानी शिवसमुद्रम के निकट कावेरी तट पर तलवनपुर (तलकाड़) बनी। उसे पल्लव नरेश सिंह वर्मन प्रथम ने बाणों को निर्मूल करने की दृष्टि से अभिषिक्त किया था। उसका उत्तराधिकारी माधव तृतीय (४६०-५०० ई.) दबंग शासक था। उसने एक कदंब राजकुमारी से विवाह किया था। उसके बाद अविनीत (५००-५४० ई.) शासक हुआ। जब वह अवयस्क था तभी उसने राज्य प्राप्त किया। तदनंतर दुर्विनीत (५४०-६००) शासक हुआ। उसने पुन्नाड़ (दक्षिण मैसूर) और कोगु देश विजित किए, चालुक्यों से मैत्री की और पल्लवों से शत्रुता निभाई। उसने काँची के काडुवट्टि को पराजित किया। वह कन्नड और संस्कृत का प्रख्यात विद्वान हुआ। स्वयं वह जैन वैयाकरण पूज्यपाद का शिष्य था और उसने शब्दावतार नामक ग्रंथ की रचना की तथा प्राकृत बृहत्कथा का संस्कृत में अनुवाद किया था। संस्कृत के प्रख्यात कवि भारवि का वह संरक्षक था। भारवि के किरातार्जुनीय के १५वें सर्ग के टीकाकार के रूप में भी उसकी ख्याति है। इस प्रकार वह गंग वंश का एक महान शासक था। सातवीं शती में इस वंश में मुष्कर, श्रीविक्रम, भूविक्रम और शिवमार (प्रथम) शासक हुए। वे लोग निरंतर पल्लवों से लड़ते रहे। शिवमार प्रथम (६७०-७१३ इ.) कदाचित दुर्विनीत का प्रपौत्र था। उसके पश्चात् उसका पौत्र श्रीपुरुष राज्य का अधिकारी हुआ। कुछ दिनों तक उसने उपराज का भार संभाला था। अपने उपराज काल में उसने बाण नरेश जगदेकमल को परास्त किया था। उसके राज्यकाल में राज्य की समृद्धि चरम सीमा तक पहुँच गई थी। फलस्वरूप उसका राज्य 'श्रीराज्य' कहा जाने लगा था। कदाचित इस श्रीवृद्धि से आकृष्ट होकर राष्ट्रकूटों ने गंगवाड़ी पर आक्रमण करना आरंभ किया। राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम ने ७६८ ई. में उस पर आक्रमण किया और अधिकार करने में सफल रहा। श्रीपुरुष के पश्चात् उसका पुत्र शिवमार द्वितीय (७८८-८१२ ई.) राज्याधिकारी बना। राष्ट्रकूट ध्रुव ने गंगवाड़ी पर आक्रमण कर उसे कैद कर लिया और अपने पुत्र स्तंभ को गंगवाड़ी का उपराज बना दिया। जब राष्ट्रकूट गोविंद (तृतीय) का अपने बड़े भाई स्तंभ के साथ राज्याधिकार के प्रश्न पर झगड़ा उठ खड़ा हुआ तब गोविंद ने उसे रिहा कर दिया किंतु रिहा होने पर शिवमार ने स्तंभ का पक्ष लिया। निदान वह फिर कैद कर लिया गया। बाद में इस आशा से राष्ट्रकूट नरेश ने उसे छोड़ दिया कि कदाचित उससे उन्हें पूर्वी चालुक्यों के विरुद्ध सहायता मिल सके। शिवमार विद्वान था, उसने तर्क, दर्शन, नाटक, व्याकरण, आदि का अध्ययन किया था। कन्नड में उसने गजशतक की रचना की थी। राष्ट्रकूटों के समय गंगवाड़ी राज्य की दयनीय स्थिति का परिणाम यह हुआ कि गंग राज्य शिवमार के बेटे मारसिंह और भाई विजयादित्य में बँट गया। मारसिंह ने अपना एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया जिसमें क्रम से मारसिंह, पृथिवीपति प्रथम, मारसिंह द्वितीय और पृथिवीपति द्वितीय शासक हुए। शिवमार द्वितीय के पश्चात् उसका भतीजा (विजयादित्य का पुत्र) राजमल्ल द्वितीय (८१३-८५३ ई.) मूल वंशक्रम में शासक हुआ। उसके शासन काल में राष्ट्रकूट अमोघवर्ष प्रथम को अपने प्रयासों में सफलता न मिली और शिवमार अपने राज्य को अक्षुण रखने में सफल रहा। राजमल्ल प्रथम के बाद उसका बेटा नीतिमार्ग प्रथम (८५३-८७० ई.) गंगवाड़ी का अधिकारी हुआ और उसने वाणों और राष्ट्रकूटों को पराजित किया। फलस्वरूप अमोघवर्ष प्रथम को अपनी बेटी चंद्रोबेलब्बा का विवाह नीतिमार्ग प्रथम के बेटे बुतुग प्रथम से करना पड़ा। बुतुग प्रथम और उसके छोटे भाई राजमल्ल द्वितीय (८७०-९०७ ई.) ने पूर्वी चालुक्यों के विरुद्ध युद्ध किया। पांड्यों के विरुद्ध पल्लवों की सहायता की। बुतुग प्रथम के असमय मर जाने के कारण उसका पुत्र नीतिमार्ग द्वितीय, राजमल्ल द्वितीय के बाद गद्दी पर बैठा। नीतिमल्ल द्वितीय ने गंगवाड़ी में अपनी स्थिति सुदृढ़ की। किंतु उसका शासनकाल अत्यंत संक्षिप्त था। उसके बाद उसका बेटा राजमल्ल तृतीय राजा हुआ पर उसके भाई बूतुग द्वितीय ने उसे ९३७ ई. में मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। बूतुक द्वितीय से राष्ट्रकूट कृष्ण तृतीय की बहन रेवका ब्याही गई थी। बुतुक ने तक्कोलम के युद्धक्षेत्र में राजादित्य को मार डाला। फलस्वरूप कृष्ण ने पुरस्कारस्वरूप उसे बनवासी का प्रांत प्रदान किया। इस प्रकार बीस बरसों तक बूतुक राष्ट्रकूटों के अधीन सामंत के रूप में सुव्यवस्थित शासन करता रहा। बूतुर्क के बाद उसके बेटे मारसिंह तृतीय ने गंग राष्ट्रकूट मैत्री संबंध को बनाए रखा और गुजरात और मालवा के अभियान में कृष्ण तृतीय की सहायता की तथा नोलंबों की राजधानी उच्चंगी पर अधिकार कर लिया और नोलंब-कुलांतक की उपाधि धारण की। जैन होने के कारण उसने सल्लेखना (उपवास कर मरना) कर अपनी जीवनलीला समाप्त की। बूतुक के बाद राजमल्ल चतुर्थ और उसके भाई रक्कस क्रमश: राजा हुए। रक्कस के समय १००४ ई. में चोलों ने तलकाड पर अधिकार कर लिया और गंगवंश का अंत हो गया। इन्हें भी देखें भारत का इतिहास दक्षिण भारत का इतिहास टिप्पणी 2 सन्दर्भ सन्दर्भ श्रेणी:३५० में स्थापित राज्य श्रेणी:भारत के राजवंश श्रेणी:कर्नाटक का इतिहास गंग श्रेणी:दक्षिण एशिया के राजवंश श्रेणी:जैन शसक श्रेणी:भारत का इतिहास श्रेणी:हिन्दू राजवंश