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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

राज सिंह प्रथम

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मेवाड़ के महाराणा Raja Ravi Varma, Maharana Raj Singh - I.jpg महाराणा राज सिंहजी प्रथम मेवाड़ के महाराणा 1652–1680 जगत सिंह प्रथम महाराणा जय सिंहजी 1629 09 24 y 1680 10 22 1629 09 24 y महाराणा राज सिंहजी प्रथम (24 सितम्बर 1629 – 22 अक्टूबर 1680) मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के शासक (राज्यकाल 1652 – 1680) थे। वे जगत सिंह प्रथम के पुत्र थे। उन्होने मुगल सम्राट औरंगजेब का अनेकों बार विरोध किया। राजनगर (कांकरोली / राजसमंद) में राजा महाराणा राज सिंह जी का जन्म 24 सितंबर 1629 को हुआ। उनके पिता महाराणा जगत सिंह जी और माता रानी मेड़तणीजी कर्म कँवरजी थीं। मात्र 23 वर्ष की छोटी उम्र में उनका राज्याभिषेक हुआ था। वे न केवल एक कलाप्रेमी, जन जन के चहेते, वीर और दानी पुरुष थे बल्कि वे धर्मनिष्ठ, प्रजापालक और बहुत कुशल शासन संचालन भी थे। उनके राज्यकाल के समय लोगों को उनकी दानवीरता के बारे में जानने का मौका मिला। उन्होने कई बार सोने चांदी, अनमोल धातुएं, रत्नादि के तुलादान करवाये और योग्य लोगों को सम्मानित किया। राजसमंद झील के किनारे नौचोकी पर बड़े-बड़े पचास प्रस्तर पट्टों पर उत्कीर्ण राज प्रशस्ति शिलालेख बनवाये जो आज भी नौचोकी पर देखे जा सकते हैं। इनके अलावा उन्होनें अनेक बाग बगीचे, फव्वारे, मंदिर, बावडियां, राजप्रासाद, द्धार और सरोवर आदि भी बनवाये जिनमें से कुछ कालान्तर में नष्ट हो गये। उनका सबसे बड़ा कार्य राजसमंद झील पर पाल बांधना और कलापूर्ण नौचोकी का निर्माण कहा जा सकता है। किशनगढ़ के राजा रूप सिंह की पुत्री चारुमती पर औरंगजेब की नजर पड़ गई औरंगजेब उसे विवाह करना चाहता था चारुमती ये जान गई और उसने महाराणा राजसिंह को पत्र लिखा और महाराणा राजसिंह को पत्र प्राप्त हुआ और उन्होने चारुमती से विवाह कर लिया वे एक महान ईश्वर भक्त भी थे। द्वारिकाधीश जी और श्रीनाथ जी के मेवाड़ में आगमन के समय स्वयं पालकी को उन्होने कांधा दिया और स्वागत किया था। उन्होने बहुत से लोगों को अपने शासन काल में आश्रय दिया, उन्हे दूसरे आक्रमणकारियों से बचाया व सम्मानपूर्वक जीने का अवसर दिया। उन्होने एक राजपूत राजकुमारी चारूमति के सतीत्व की भी रक्षा की। उन्होने ओरंगजेब को भी जजिया कर हटाने और निरपराध भोली जनता को परेशान ना करने के बारे में पत्र भेज डाला। कहा जाता है कि उस समय ओरंगजेब की शक्ति अपने चरम पर थी, पर प्रजापालक राजा राजसिहजी ने इस बात की कोई परवाह नहीं की। राणा राज सिंह स्थापत्य कला के बहुत प्रेमी थे। कुशल शिल्पकार, कवि, साहित्यकार और दस्तकार उनके शासन के दौरान हमेशा उचित सम्मान पाते रहे। वीर योद्धाओं व योग्य सामंतो को वे खुद सम्मानित करते थे। राजसमंद झील राजसमन्द झील उन्होंने 1676 में कांकरोली में प्रसिद्ध राजसमंद झील का भी निर्माण किया, जहाँ भारत की स्वतंत्रता से पहले समुद्री विमान उतरते थे। उन्होंने राज प्रशस्ति काव्य का निर्माण का आदेश दिया, जिसे बाद में झील के स्तंभों पर उकेरा गया।https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/raj-prashasti-indias-longest-stone-etchings-in-rajsamand-cry-for-upkeep/articleshow/62781989.cms Raj Prashasti - India’s longest stone etchings in Rajasthan cry for upkeep Jaipur News - Times of India Geetha Sunil Pillai Feb 5, 2018 The Times of India en 2022-09-03 इस झील को राजसमुद्र के नाम से भी जाना जाता है।Somani 1976 295 झील ने किसानों को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जिससे उत्पादकता में वृद्धि हुई और अकाल प्रभावित क्षेत्रों को भी राहत मिली। माना जाता है कि राज सिंह को अपने बेटे, पत्नी, एक ब्राह्मण और एक चारण की हत्या से मुक्त होने के लिए एक बड़ा तालाब या झील निर्माण करवाने का सुझाव दिया गया था।https://books.google.co.in/books?id=Si9uAAAAMAAJ&newbks=0&hl=en&redir_esc=y Udayapura Rājya kā itihāsa Ojhā Gaurīśaṅkara Hīrācanda 1999 Rājasthānī Granthāgāra 978-81-86103-19-7 hi विशेष महाराणा राज सिंह जी के समय जोधपुर के मंडोर से चार भाई अमेट क्षेत्र के पास आये थे जिसमे दो भाई वहा पर ही बस गए जिसमे से एक का नाम गोविंध् सिंह इन्दा एवं दूसरे का नाम रतन सिंह परिहार था महाराणा राज सिंह जी ने उन दोनो को जागिरि दी एवं उन दोनो के नाम पर एक गाँव विकसित किया गोविंध् सिंह जी के नाम पर गोविंदहगढ ( गुगली) और रतन सिंह के नाम पर रतन गढ़ ( ऐडाणा) | महाराणा राज सिंह जी के मंत्री मंडल मे रतन सिंह जी का विशेष योगदान रहा है जिससे उन्हे एवं गोविंध् सिंह जी को महाराव की उपाधि मिली आज भी इन गाँव के लोग अपने नाम के आगे राव लागाते है एवं पीछे परिहार लागाते है महाराणा राज सिंह जी जब औरंगजेब के साथ लड़े तब उनके साथ महाराव रतन सिंह जी भी थे | सन्दर्भ श्रेणी:मेवाड़ के शासक