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भोजशाला
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भोजशाला भोजशाला hi Bhoj Shala 7 September 2021.jpg दक्षिण की ओर देखने पर मन्दिर के स्तम्भ एवं गलियारा। 1.4 India Madhya Pradesh 250 1 मध्य प्रदेश में भोजशाला की स्थिति धार, मध्य प्रदेश भारत 22.5905 75.2950 region:IN-MP dms inline,title हिन्दू, जैन विद्यालय संरक्षित संस्कृत एवं प्राकृत का विद्यालय भोज uncertain rebuilt late 1300s yes MANI भोजशाला N-MP-117 http://asi.nic.in Bhojaśālā Archaeological Survey of India https://web.archive.org/web/20110629155409/http://asi.nic.in/ 2011-06-29
right|thumb|300px|धार से ब्रिटिश संग्रहालय ले जायी गयी वाग्देवी की मूर्ति
अंगूठाकार|कमाल मौला पर बना चित्र (के के लेले द्वारा खोजी गयी)
भोजशाला (या "भोज का भवन") मध्य प्रदेश के धार शहर में स्थित एक ऐतिहासिक भवन है।भोजशाला राजा भोज मध्यकालीन मालवा के परमार वंशीय राजा थे। वे शिक्षा और कला के संरक्षक थे, और उनको काव्य, योग और वास्तुकला पर प्रमुख संस्कृत ग्रन्थों की रचना का श्रेय दिया जाता है।विलिस माइकल 2012 धार, भोज एन्ड सरस्वती: फ्रौम इन्डौलजी टू पोलिटिकल मिथौलजी एन्ड बैक https://doi.org/10.1017/S1356186312000041 जर्नल औफ द रौयल एशियैटिक सोसाइटी 22 (1) 136–138 20वीं शताब्दी के आरम्भिक दिनो से भोजशाला शब्द उस इमारत से जोड़ा गया है। इमारत की संरचना 14वीं शताब्दी में की गई है, लेकिन इसमें उपयुक्त स्थापत्य खण्ड मुख्य रूप से 11वीं–12वीं शताब्दी के हैं, और इसके आसपास इस्लामी कब्रें 14वीं-15वीं शताब्दी के बीच की हैं।
मई २०२६ में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह भवन एक हिन्दू मन्दिर है और इसमें केवल हिन्दुओं को पूजा करने का अधिकार है।भोजशाला हिंदू मंदिर है न्यायालय ने इसे वाग्देवी का मन्दिर माना।https://hindi.news18.com/news/madhya-pradesh/indore-bhojshala-mandir-dhar-case-verdict-live-news-indore-high-court-kamal-maula-masjid-madhya-pradesh-livenews-local18-ws-l-10479017.html धार भोजशाला को उच्च न्यायालय ने वाग्देवी मंदिर माना 16 मई 2026 16 मई 2026 https://web.archive.org/web/20260516142135/https://hindi.news18.com/news/madhya-pradesh/indore-bhojshala-mandir-dhar-case-verdict-live-news-indore-high-court-kamal-maula-masjid-madhya-pradesh-livenews-local18-ws-l-10479017.html dead
वर्तमान में यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में एक पुरातात्विक क्षेत्र है लेकिन पिछली शताब्दी में यह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवादित जगह बन गई है। 19वीं शताब्दी के बाद से इस स्थान के अन्वेशण में मध्यकालीन धर्मों के बारे में बहुत जानकारी प्राप्त हुई है। भोजशाला की सीमा में सूफ़ी सन्तों से जुडे चार गुम्बज़दार मकबरे भी हैं,इस्लामिक आर्किटेक्चर इन साउथ एशिया: पाकिस्तान, इन्डिया, बांग्लादेश https://archive.org/details/islamicarchitect0000khan खान अहमद नबी औक्सफौर्ड उनिवर्सिटी प्रेस 2004 978-0-19-579065-8 औक्सफौर्ड/ कराची 175–176 जिन में मूल मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती धारवी (1238–1330) की दरगाह सबसे पुरानी है।https://doi.org/10.5281/zenodo.3732440 हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रह. और उनका युग गर्ग रामसेवक आदिवासी लोक कला अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् 2005 भोपाल मुसलमान शुक्रवार की नमाज़ और इस्लामी त्योहारों के लिए इमारत का उपयोग करते हैं, जबकि हिंदू मंगलवार को प्रार्थना करते हैं। हिंदू भी वसंत पंचमी पर यहाँ देवी सरस्वती से प्रार्थना करते हैं। यह भवन हिंदू-मुस्लिम तनाव का एक स्रोत रहा है जब वसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ती है।रीजन, कल्चर एन्ड पौलिटिक्स इन इन्डिया https://archive.org/details/regionculturepol0000unse वोरा राजेन्द्र मनोहर 2006 978-81-7304-664-3 नई दिल्ली 327–329https://timesofindia.indiatimes.com/city/indore/indore-celebrates-basant-panchmi/articleshow/56924412.cms Indore celebrates Basant Panchmi February 2, 2017 The Times of Indiahttp://indiatoday.intoday.in/story/dhar-bhojshala-kamal-maula-mosque-row-madhya-pradesh-vishwa-hindu-parishad/1/594073.html Bhojshala-Kamal Maula mosque row: What is the dispute over the temple-cum-mosque all about? Biswas Shreya February 12, 2016 India Today
राजा भोज
राजा भोज का शासन मध्य भारत में लगभग 1000 और 1055 के बीच चला।Inscriptions of the Paramāras, Chandēllas, Kachchapaghātas and two minor dynasties Trivedi Harihar Vitthal Archaeological Survey of India 1991 Corpus Inscriptionum Indicarum 7.1 New Delhi 20–26 वह भारतीय परंपरा में सबसे महान राजाओं में से एक माना जाता है। वह कला के एक प्रसिद्ध संरक्षक थे, और उनके प्रति श्रद्धा के कारण, हिंदू विद्वानों ने पारंपरिक रूप से उन्हें दर्शन, खगोल, विज्ञान, व्याकरण, चिकित्सा, योग, वास्तुकला और अन्य विषयों पर बड़ी संख्या में संस्कृत कृतियों का श्रेय दिया। इनमें से, काव्य के क्षेत्र में एक अच्छी तरह से अध्ययन और प्रभावशाली कृति शृङ्गारप्रकाश है।Bhoja’s Śṛṅgaraprakāśa Raghavan Venkatarama 1940 Madras कार्य का मूल आधार यह है कि शृङ्गार ब्रह्मांड में मौलिक और प्रेरक आवेग है।
अपने साहित्यिक और कला समर्थन के साथ, भोज ने भोजपुर में एक विशाल शिव मंदिर का निर्माण शुरू किया। यदि यह पूरा हो गया होता जिस हद तक उसने योजना बनाई थी, तो मंदिर खजुराहो समूह के स्मारकों में हिंदू मंदिरों के आकार से दोगुना होता। मंदिर काफी हद तक पूरा हो गया था, और अभिलेखीय साक्ष्य पुष्टि करते हैं कि भोज ने हिंदू मंदिरों की स्थापना और निर्माण किया था।परमार अभिलेख मित्तल डा• अमरचन्द लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामंदिर 1979 अहमदाबाद 10
भोज के उत्तराधिकारियों में से एक राजा अर्जुनवर्मन (लगभग 1210–15) थे। वह और कई अन्य हिंदू और जैन परंपराओं के शासक राजा भोज को इतने उच्च सम्मान में रखते थे कि उन्होंने "भोज के पुनर्जन्म" या "भोज जैसे शासक" होने का दावा कर खुद को सम्मानित किया।https://doi.org/10.5281/zenodo.375588 पारिजातमंजरीतिपराख्या विजयश्रीर्नाम नाटिका दीक्षित स.क. स.क. दीक्षित 1965 Bhopal x–xi मृत्यु के सदियों बाद भी भोज एक श्रद्धेय व्यक्ति बने रहे, जैसा कि 14वीं शताब्दी में गुजरात के जैनाचार्य मेरुतुंग की प्रबंधचिंतामणी,The Prabandhacintāmaṇi or Wishing-stone of Narratives https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.228845 Tawney C. H. 1901 Calcutta 57 और 17वीं शताब्दी वाराणसी में रचित बल्लाल के भोजप्रबंध में दर्शाया गया है।The Narrative of Bhoja (Bhojaprabandha) Gray Louis H. American Oriental Series 1950 New Haven यह परंपरा जारी रही, और 20वीं शताब्दी में, हिंदू विद्वानों ने भोज को अपनी ऐतिहासिक संस्कृति के गौरवशाली अतीत और हिंदू पहचान के एक हिस्से के रूप में वर्णित किया।शृङ्गारमंजरीकथा मुन्शी क.म. सिंघी जैन ग्रंथमाला 1959 Bombay 90 भारतीय राज्य मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का नाम उनके नाम पर रखा गया है, यानी भोज-पाल, लेकिन कुछ लोग इसका नाम भूपाल से जोड़ते हैं, जो एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है राजा, शाब्दिक रूप से, 'पृथ्वी का रक्षक'।https://books.google.com/books?id=1B4rvdpvS7YC&pg=PA71#v=onepage&q&f=false Pachmarhi Mitra Swati Goodearth Publications 2009 978-81-87780-95-3 71
धार और भोजशाला में शिलालेख
धार के पुरातात्विक स्थलों, और विशेष रूप से शिलालेखों, की तरफ ध्यान ब्रिटिश राज से जुडे विद्वानों द्वारा आकर्षित किया गया। 1822 में जॉन मैल्कम ने धार का उल्लेख किया, जिसमें राजा भोज से जुडी बांध जैसी परियोजनाओं के निर्माण का ज़िक्र मिलता है।https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.63351/page/n1/mode/2up?view=theater A Memoir of Central India including Malwa, and Adjoining Provinces Malcolm John Kingsbury, Parbury & Allen 1824 London 19वीं सदी के अंत में भोजशाला के शिलालेखों पर विद्वतापूर्ण अध्ययन जारी रहा जब 1871 में बंबई से भाऊ दाजी ने अपने सहायकों को यहां भेजा। 1903 में एक नया अध्याय चालू हुआ, जब धार रियासत में शिक्षा अधीक्षक के.के. लेले ने कमाल मौला मस्जिद में दीवारों और फर्श पर कई संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों की सूचना दी। शिलालेखों का अध्ययन विभिन्न विद्वानों ने वर्तमान तक जारी रखा है। जगह पर उत्कीर्ण शिलाओं की विविधता और आकार, और उनमें से दो सर्पबन्ध लेख जिन में संस्कृत भाषा के व्याकरणिक नियम दर्शाए हैं, यह बात स्पष्ट करते हैं कि सामग्री एक जगह से नहीं बल्कि विस्तृत क्षेत्र में कई विभिन्न इमारतों से इकट्ठी की गई थी।
रोड़ का राउल वेल
जॉन मैल्कम ने उल्लेख किया कि उन्होंने कमाल मौलाना मस्जिद से एक बना हुआ पैनल हटाया था। यह कवि रोड़ का राउल वेल प्रतीत होता है, जो हिंदी के प्रारंभिक रूपों में एक अद्वितीय काव्य कृति है। यह शिलालेख पहले मुंबई की एशियाटिक सोसाइटी में रखा गया था और बाद में इसे मुंबई में छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया है।
कूर्मशतक
के.के. लेले द्वारा पाए गए शिलालेखों में से एक पैनल था जिसमें प्राकृत में छंदों की एक श्रृंखला थी। इसमें भगवान विष्णु के कूर्म या कछुआ अवतार की प्रशंसा की गई थी। कूर्मशतक का श्रेय स्वयं राजा भोज को दिया जाता है, लेकिन अभिलेख के पुरालेख से पता चलता है कि यह प्रति बारहवीं या तेरहवीं शताब्दी में उकेरी गई थी। यह पाठ रिचर्ड पिशल द्वारा 1905-06 में प्रकाशित किया गया था, जिसका एक नया संस्करण और अनुवाद 2003 में वी.एम. कुल्कर्णी द्वारा निकाला जा चुका है।R. Pischel, Epigraphia Indica 8 (1905-06); V. M. Kulkarni, Kūrmaśatakadvayam: two Prakrit poems on tortoise who supports the earth (Ahmedabad: L.D. Institute of Indology, 2003). यह शिलालेख वर्तमान में मस्जिद की रीवाक में प्रदर्शित है।
वियजश्रीनाटिका
के.के. लेले द्वारा पाया गया एक अन्य शिलालेख था जिसमें राजगुरु मदन द्वारा रचित विजयश्रीनाटिका नामक कृति का हिस्सा है। राजा अर्जुनवर्मन के उपदेशक मदन ने "बालसरस्वती" की उपाधि धारण की थी। शिलालेख से पता चलता है कि शिलालेख पर उत्कीर्ण नाटिका का प्रदर्शन राजा अर्जुनवर्मन के सामने एक सरस्वती मंदिर में किया गया था। इससे पता चलता है कि यह शिलालेख किसी सरस्वती मंदिर के स्थल से लाया गया होगा। शिलालेख वर्तमान में मस्जिद की रीवाक में प्रदर्शित है।
वर्णनागकृपाणिका
इमारत में दो सर्पबन्ध शिलालेख भी हैं जो सर्प के रूप में व्याकरणिक नियम दर्शाते हैं। श्री के.के. लेले, जो खुद धार रियासत के शिक्षा अधीक्षक थे, इन अभिलेखों से प्रेरित हो कर मस्जिद को भोजशाला के रूप में वर्णित करने लगे। क्योंकि राजा भोज कविताओं और व्याकरण पर कई कार्यों के लेखक थे, जैसे की सरस्वतीकण्ठाभरण (या "सरस्वती का हार")।Birwe R. 1964 Nārāyaṇa Daṇḍanātha's Commentary on Rules III.2, 106-121 of Bhoja's Sarasvatīkaṇṭhābharaṇa Journal of the American Oriental Society 84 150-162Sarasvatīkaṇṭhābharaṇam of King Bhoja Siddhartha Sundari 2009 978-81-208-3284-8 Delhi भोजशाला शब्द को कप्तान लुआर्ड ने लिया और 1908 के अपने गजेटियर में प्रकाशित किया, हालांकि लुआर्ड ने यह स्पष्ट रूप से कहा था कि यह एक मिथ्या है।Western States (Mālwā). Gazetteer, 2 parts. The Central India State Gazetteer Series Luard C.E. 1908 5A Bombay 494–500 यह कि भोजशाला शब्द श्री लेले की वजह से प्रचलित है, विलियम किनकैड के लेखन द्वारा स्पष्ट होता है, जो कि 1888 में इन्डियन एन्टिक्वैरी में प्रकाशित किया गया था। 1888 के इस लेख में भोजशाला शब्द का कोई उल्लेख नहीं कीया गया है, केवल कमाल मौला की दर्गाह में स्थित "अकल का कुआं" का ज़िक्र है। किनकैड के पाठ में भोजशाला शब्द की अनुपस्थिति यह इंगित करती है कि "19वीं शताब्दी के मध्य दशकों में भोजशाला के बारे में कोई जीवित परंपरा नहीं थी" जिन लोगों के साथ किनकैड ने बातचीत की थी।
सरस्वती
श्री के.के. लेले और कप्तान लुआर्ड द्वारा भोजशाला की कमाल मौला मस्जिद के साथ पहचान बनाने के बाद, इतिहासकार ओ.सी. गांगुली और के.एन. दीक्षित ने ब्रिटिश संग्रहालय में रखी एक मूर्ति के बारे में लेख प्रकाशित किया जिसमें घोषणा की गई कि यह धार से राजा भोज की सरस्वती है।O.C. Gangoly and K. N. Dikshit January 1924 "An Image of Saraswati in the British Museum" Rūpam 17 17 1-2 इस विश्लेषण को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया और इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इसके बाद के वर्षों में ब्रिटिश संग्रहालय में प्रतिमा की पहचान अक्सर भोज की सरस्वती के रूप में की गई।
मूर्ति पर एक शिलालेख है जिसमें राजा भोज के साथ वाग्देवी का उल्लेख है, जो सरस्वती का दूसरा नाम है।[1] वाग्देवी शब्द का शाब्दिक अर्थ है वाणी, उच्चारण और विद्या की देवी। हालांकि, बाद में संस्कृत और प्राकृत भाषाओं के भारतीय विद्वानों द्वारा शिलालेख के अध्ययन, विशेष रूप से हरिवल्लभ भयानी,Mankodi Kirit L. 1980-81 A Paramāra Sculpture in the British Museum: Vāgdevī or Yakshī Ambikā Sambodhi 9 96-103 ने यह स्पष्ट किया कि शिलालेख तीन जैन तीर्थंकरों और वाग्देवी के निर्माण के बाद अंबिका की एक मूर्ति के निर्माण को रिकॉर्ड है। यानि भले ही वाग्देवी का उल्लेख किया गया है, शिलालेख का मुख्य उद्देश्य अंबिका की छवि के निर्माण को रिकॉर्ड करना है, यानी वह मूर्ति जिस पर रिकॉर्ड उत्कीर्ण कीया गया है।Willis Michael 2011 New Discoveries from Old Finds: A Jain Sculpture in the British Museum http://doi.org/10.5281/zenodo.2544721. CoJS Newsletter 6 34-36
मूल पाठ और अनुवाद
ॐ श्रीमद्भोजनरेंद्र-चंद्रनगरी-विद्याधरी-धर्म्मधीः यो — [क्षतिग्रस्त भाग] खलु सुखप्रस्थापना
याप्सराः वाग्देवीं प्रथमं विधाय जननीं पस्चाज्जिनानां त्रयीं अम्बां नित्यफलादिकां वररुचिः मूर्त्तिं सुभां नि
र्म्ममे इति शुभं। सूत्रधार सहिर-सुत-मणथलेण घटितं॥ विज्ञानिक शिवदेवेन लिखितमिति॥
संवत् 1091
ओम्। राजा भोज की चंद्रनगरी और विद्याधारी [जो जैन धर्म की दो शाखाएँ हैं] के धार्मिक अधीक्षक (धर्म्माधि) वररुचि है। अप्सराओं की तरह आसानी से [अज्ञानता को दूर करने के लिए? द्वारा...?] हटाने के लिए... उस वररुचि ने पहले वाग्देवी को माता रूप में [और] फिर तीन तीर्थंकरों को बनवाने के बाद अम्बा की यह सुंदर छवि बनवाई, जो हमेशा प्रचुर मात्रा में फल देती है। आशीर्वाद! इसे सूत्रधार सहिरा के पुत्र मथल ने अंजाम दिया था। यह लेख प्रवीण शिवदेव द्वारा लिखा गया था। वर्ष 1091.
प्रतिमा की पहचान
अन्यत्र पाई गई अंबिका प्रतिमाओं की प्रतीकात्मक विशेषताओं से ब्रिटिश संग्रहालय की मूर्ति की पहचान की पुष्टि की गई है।Ambikā in Jaina Art and Literature Tiwari M. N. P. Bharatiya Jnanpith 1989 New Delhi एक विशेष रूप से करीबी तुलनात्मक उदाहरण मध्यप्रदेश के सीहोर शहर में पाई गई 11वीं शताब्दी की अंबिका है।http://doi.org/10.5281/zenodo.3633937 Sehore सीहोर (Madhya Pradesh). Ambikā Zenodo धार मूर्ति की तरह, सीहोर की छवि में एक युवा को देवी के पैर में शेर की सवारी करते हुए दिखाया गया है और एक तरफ दाढ़ी के साथ एक आकृति है।
ब्रिटिश संग्रहालय में मूर्ति पर शिलालेख इंगित करता है कि धार में वाग्देवी सरस्वती के जैन रूप को समर्पित थी। हालांकि, जिस वाग्देवी का उल्लेख किया गया है वह अब मौजूद नहीं है या अभी तक खोजी नहीं गई है। आचार्य मेरुतुंग, जिन्होंने 14वीं शताब्दी की शुरुआत में अपना प्रबंध लिखा था, यह इंगित करते हैं कि सरस्वती मंदिर में भोज की स्तुति संबंधी शिलाओं को पहले जैन तीर्थंकर को समर्पित एक कविता के साथ उकेरा गया था, लेकिन इन शिलालेखों का भी पता नहीं चला है।
वर्तमान स्थिति
यह इमारत भारत के कानूनों के तहत राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकृत क्षेत्र में है। हिंदू और मुसलमान दोनों ही इस जगह पर दावा जमाते हैं और इसका इस्तेमाल अपनी प्रार्थनाओं के लिए करते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के दिशानिर्देशों के अनुसार, मुसलमान शुक्रवार और इस्लामी त्योहारों पर प्रार्थना कर सकते हैं, हिंदू मंगलवार को और देवी सरस्वती के त्योहार पर, अर्थात् वसंत पंचमी पर प्रार्थना कर सकते हैं। जगह अन्य दिनों में पर्यटकों के लिए खुली रहती है। [1] [6]
इस इमारत के बारे में विवाद इसमें मौजूद शिलालेख, और उनसे प्राप्त हिंदू और जैन धर्मों के बारे में ऐतिहासिक जानकारी, द्वारा प्रेरित किया गया है। जैन धर्म के बारे में जानकारी एतिहासिक ग्रंथों और देवी अंबिका की प्रतिमा से प्राप्त होती है जिसे अब ब्रिटिश संग्रहालय में रखा गया है। कमाल मौला मस्जिद के बगल में सूफ़ी सन्तों के चार इस्लामी मकबरे हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध है हज़रत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती धारवी (1238-1330) की दरगाह, जिसकी मालवा सल्तनत के दौरान तामीरीयत हुई थी। वास्तुकला की दृष्टि से, मस्जिद दरगाह से पहले की बनी है, और 1300 के प्रारंभिक दशकों में दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में कुव्वत-उल-इस्लाम के समान मंदिर के हिस्सों से बना एक जामा मस्जिद है।
शुक्रवार को वसंत पंचमी पड़ने पर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ऐसे दिनों में हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को घंटे आवंटित करने का प्रयास करता है। हालांकि, यह सांप्रदायिक संघर्ष और कभी-कभी अशांति का एक स्रोत रहा है, जब पहले के समय स्लॉट के लिए निर्धारित धार्मिक समूह ने अगले समय के लिए परिसर खाली करने से इनकार कर दिया।
विवाद एवं उच्च न्यायालय का निर्णय
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
मैहर -- मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थिति एक सरस्वती मन्दिर
शारदा पीठ -- कश्मीर में स्थित सरस्वती मन्दिर
बाहरी कड़ियाँ
श्रेणी:राजा भोज
श्रेणी:परमार राज्य