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हिन्द-आर्य भाषाओं में श्वा विलोपन
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श्वा विलोपन वह प्रतिक्रिया है जिसमें हिन्दी, कश्मीरी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली, मैथिली और बहुत-सी अन्य आधुनिक हिन्द-आर्य भाषाओँ में सही उच्चारण के लिए उनकी लिपियों के व्यंजनों में निहित श्वा की ध्वनि (जो कि हिन्दी में 'अ' है) को त्यागना अनिवार्य है। यह विलोपन करना उन भाषाओँ के मातृभाषियों के द्वारा समझे जाने के लिए और बोलने वाले का लहजा सही प्रतीत होने के लिए बहुत ज़रूरी है। इस श्वा विलोपन के बिना वाचक या तो स्पष्ट ग़ैर-मातृभाषी लगता है या फिर उसे समझने में ही कठिनाई हो सकती है। श्वा विलोपन कम्पयूटर द्वारा लिखित सामाग्री को पढ़ने में (मसलन नेत्रहीन लोगों की सुविधा के लिए) और भाषाओँ को सीखने वालों के लिए चुनौती होती है क्योंकि इन भाषाओँ की लिपियाँ अक्सर यह स्पष्ट नहीं करती कि श्वा कहाँ रखना चाहिए और कहाँ त्यागना चाहिए।
== हिन्दी में श्वा विलोपन ==
आधुनिक हिन्दी को लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है, जिसमें औपचारिक रूप से हर व्यंजन के अंत में अगर हलंत न लगा हो तो 'अ' कि ध्वनि जोड़ी जाती है। लेकिन हिन्दी के सही उच्चारण के लिए हिन्दी का 'श्वा विलोपन नियम' कहता है कि शब्दों के अंत में और कुछ और परिस्थितियों में अक्सर यह श्वा हटा दिया जाता है। इसे कभी-कभी इस प्रकार से लिखा जाता है: 'अ -> ø | स्वर व्यंजन _व्यंजन स्वर'। इसका अर्थ है कि अगर लिपि के अनुसार किसी स्वर के उपरान्त आने वाले व्यंजन के बाद श्वा ('अ' ध्वनि) आता है और उसके बाद एक व्यंजन आता है जिसके पीछे भी एक स्वर लगा हो, तो उस बीच के श्वा को त्याग दिया जाता है। मसलन 'अजगर' शब्द को देखा जाए तो यह 'अ+ज्+अ+ग्+अ+र्+अ' है लेकिन शब्द के अंत वाला 'अ' और 'अ+ज्' और 'ग्+अ' के बीच का 'अ' दोनों हटा दिए जाते हैं, जिस से 'अजगर' शब्द का साधारण बोलचाल में सही हिन्दी उच्चारण 'अज्गर्' है। अक्सर यह बात अंग्रेजी में लिप्यान्तरण करने में स्पष्ट हो जाती है। 'पटना' शहर को देखा जाए तो लिपि के अनुसार यह 'प्+अ+ट्+अ+न्+आ' है, जो अंग्रेजी में 'patanā' लिखा जाएगा ('ā' दीर्घ 'आ' की ध्वनि है)। लेकिन श्वा विलोपन नियम बीच का श्वा हटा देता है, इसलिए वास्तव में सही उच्चारण 'प्+अ+ट्+न्+आ' है, यानी 'pat.nā'। उसी तरह 'उत्तर प्रदेश' को अगर औपचारिक लिपि के अनुसार देखा जाए तो यह 'uttara pradesha' होना चाहिए, लेकिन श्वा विलोपन की वजह से यह 'uttar pradesh' बन जाता है।
ध्यान दीजिये कि श्वा विलोपन के कारण कुछ अक्षरों के गुटों का उच्चारण उनकी शब्द में परीस्थिती के अनुसार बदल जाता है। 'सरल' का उच्चारण 'स्+अ+र्+अ+ल्' (सरल् 'saral') है जिसमें अंत का श्वा विलोपित है। लेकिन 'सरला' में नियमानुसार बीच के 'र' का 'अ' हटा दिया जाता है, यानी 'स्+अ+र्+ल्' (सर्ला 'sar.lā')। उसी तरह 'पालक' (पालक् pālak) और 'पालकी' (पाल्की 'pāl.ki') में बीच के 'ल' का श्वा पहले तो रखा जाता है लेकिन दुसरे शब्द से हटा दिया जाता है। उसी तरह 'दिल की धड़कने' में 'धड़कने' का सही उच्चारण 'धड़्कने' (dhad.kane) है, यानि 'ड़' का श्वा हटाया गया। लेकिन 'दिल धड़कने लगा' में 'धड़कने' का सही उच्चारण 'धड़क्ने' (dhadak.ne) है, यानि इस दफ़ा 'ड़' का श्वा रखा गया लेकिन 'क' का श्वा हटाया गया। हिन्दी के मातृभाषी इन शब्दों को बिना सोचे आराम से सही उच्चारित करते हैं, लेकिन ग़ैर-मातिभाषियों और कम्पयूटरों के लिए यह कठिनाई पैदा करते हैं। अक्सर उनके ग़लत उच्चारण से उनकी बोली 'अजीब' और 'सुनने वाले के लिए समझनें में कठिन' लगती है।
== कुछ उदाहरण ==
== इन्हें भी देखें ==
श्वा
लहजा (भाषाविज्ञान)
देवनागरी
हिन्द-आर्य भाषाएँ
== सन्दर्भ ==