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411 समाचार
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मार्टिन शिफ्लो

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ALL website noमार्टिन शिफ्लो (Martine Chifflot) एक फ्रांसीसी दार्शनिक और संस्कृतविद् हैं, जो कवयित्री, उपन्यासकार और रंगमंच-निर्देशिका भी हैं। क्लॉड बर्नार्ड विश्वविद्यालय लियों 1 में मानद प्राध्यापिका (professeure agrégée honoraire), दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट और शोध-निर्देशन हेतु अधिकृत (HDR), वे उन विरल पाश्चात्य विदुषियों में से हैं जिन्होंने वेदान्त की आध्यात्मिक-दार्शनिक परंपरा को बाहर से अध्ययन के विषय के रूप में नहीं, अपितु संस्कृत की प्रत्यक्ष शिक्षा और मूल ग्रंथों के गहन परायण के माध्यम से आंतरिक रूप से ग्रहण किया — एक ऐसी पद्धति जिसे वे स्वयं स्पष्ट रूप से शैक्षणिक प्राच्यवाद (orientalisme) से पृथक् करती हैं। एक गैर-प्राच्यवादी भारतविद् भारतविद्या और प्राच्यवाद के बीच जो भेद मार्टिन शिफ्लो करती हैं, वह उनकी समग्र दार्शनिक दृष्टि के केंद्र में है। उनके अनुसार प्राच्यवाद भारतीय दर्शन को बाहर से, पाश्चात्य श्रेणियों के माध्यम से देखता है — ऐसी श्रेणियाँ जिन्हें वह बिना किसी आत्म-परीक्षण के आरोपित कर देता है। उनकी अपनी पद्धति इसके विपरीत है : ग्रंथों को उनकी मूल भाषा में पढ़ने के लिए संस्कृत सीखना, दर्शनों (darśana) को उनकी आंतरिक संरचना में समझना, और उन समकालीन समन्वयवादी प्रवृत्तियों को अस्वीकार करना जो दोनों परंपराओं को निर्बल बना देती हैं। उन्होंने लियों में मैरी-क्लॉड पोर्शे के निर्देशन में संस्कृत सीखी, तत्पश्चात् 1991 में पेरिस चतुर्थ विश्वविद्यालय - सोर्बोन में मिशेल युलेन के निर्देशन में जार्ज बर्कली के भाववाद और प्रकाशानन्द के सिद्धान्त के तुलनात्मक अध्ययन पर शोध-प्रबंध प्रस्तुत कियाMartine Chifflot, Le thème de l'esse est percipi dans la pensée de Berkeley et de Prakāśānanda, thèse de doctorat, Université Paris IV-Sorbonne, juin 1991, ANRT réf. 12611.। यह शोध-प्रबंध पहला अकादमिक अध्ययन है जो यह स्थापित करता है कि वेदान्त की दृष्टि-सृष्टि-वाद की परम्परा — जो है, वह प्रत्यक्षित है — बर्कले के प्रसिद्ध esse est percipi (1710) से डेढ़ शताब्दी से भी पूर्व, अद्वैत वेदान्त की आंतरिक तर्क-परम्परा से स्वतन्त्र रूप से विकसित हुई थी, बिना किसी पाश्चात्य प्रभाव के। 2005 में उन्होंने प्रकाशानन्द की वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली का प्रथम फ्रांसीसी अनुवाद प्रकाशित किया, जो सीधे संस्कृत पाठ पर आधारित हैMartine Chifflot (traduction, présentation et notes), Le collier de perles des doctrines du Vedānta, L'Harmattan, Paris, 2005.। फ्रांसीसी दार्शनिक शिक्षक-संघ की पत्रिका L'Enseignement philosophiqueफ्रांस के सार्वजनिक शिक्षण में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापकों के संघ की पत्रिका, 1951 में स्थापित। में प्रकाशित अपने लेखों में वे बारंबार इस बात पर बल देती हैं कि योग और वेदान्त के ग्रंथों के लिए कठोर अध्ययन आवश्यक है — विशेषतः संस्कृत का ज्ञान — ताकि उन भ्रान्तियों से बचा जा सके जो सरलीकृत या पक्षपातपूर्ण पठन से अनिवार्यतः उत्पन्न होती हैं। उनके अनुसार पाश्चात्य जगत् में आध्यात्मिक क्षेत्र «धूर्तों और आक्रामक जालसाजों» से भरा हुआ हैMartine Chifflot, « La libération selon le Yoga et le Védānta », L'Enseignement philosophique, vol. 72, n° 4, 2022, p. 37 (DOI : 10.3917/eph.725.0035).। आनंदमयी माँ का उपदेश मार्टिन शिफ्लो अपने दो शैक्षणिक लेखों में स्पष्ट रूप से आनंदमयी माँ के उस उपदेश का उल्लेख करती हैं जो वे पाश्चात्य साधकों को देती थीं : भारतीय परंपरा से नवजीवन प्राप्त करके अपनी मूल आध्यात्मिक परंपरा में लौट जाओ। यह शिक्षा उनकी अपनी दार्शनिक यात्रा का मार्गदर्शन करती रही है : वेदान्त और संस्कृत उनके लिए वह स्रोत रहे हैं जिनसे उन्होंने उन परंपराओं को पुनर्जीवित किया जिन्हें पश्चिमी आधुनिकता ने क्षीण कर दिया थाMartine Chifflot, « La libération selon le Yoga et le Védānta », L'Enseignement philosophique, vol. 72, n° 4, 2022, p. 37 et p. 45.। इसी अंतराल में — भारतविद् की कठोरता और अपनी परंपरा के प्रति निष्ठा के बीच — उनका दार्शनिक कार्य आकार लेता है। थॉमिस्ट-वेदान्तिक संश्लेषण मार्टिन शिफ्लो की दार्शनिक स्थिति की विशिष्टता इस बात में है कि वे थॉमस एक्विनास और वेदान्त के बीच के संबंध को बाहरी तुलना के रूप में नहीं, अपितु आत्मा-विषयक दो आध्यात्मिक-दार्शनिक परंपराओं के बीच वास्तविक अभिसरणों की अन्वेषणा के रूप में देखती हैं। उनका ग्रंथ Saint Thomas, l'âme et les sens (M+ Éditions, 2021) इस साम्य को थॉमिस्ट दिशा से विकसित करता है, जबकि पत्रिका Aditiहिन्दू परंपरा के अध्ययन को समर्पित Centre Aditi की पत्रिका, जो 2018 से 2022 के बीच चार अंकों में प्रकाशित हुई। प्रथम दो अंक द्विभाषी (फ्रांसीसी-अंग्रेजी) थे (ऑनलाइन पढ़ें : [https://centre-aditi.com/magazine/cahiers_aditi_en/ Aditi I & II — English version]). में उनके लेख इसे वेदान्तिक दिशा से विकसित करते हैं, विशेषतः दर्शनों (darśana) और उनकी पदानुक्रमिक व्यवस्था के तुलनात्मक परीक्षण के माध्यम सेMartine Chifflot, « Le moi, le monde et Dieu. Perspectives dualistes et non-dualistes du Védānta », Aditi, n° IV, 2022 (ऑनलाइन पढ़ें : centre-aditi.com).। यह संश्लेषण कोई निश्चित सैद्धान्तिक मत नहीं है, अपितु एक चल रहे दार्शनिक कार्य का परिणाम है, जिसका उद्देश्य यह दर्शाना है कि भारत की आध्यात्मिक अध्यात्म-परंपरा और ईसाई आध्यात्मिक-दर्शन परंपरा — भिन्न-भिन्न मार्गों से — आत्मा की प्रकृति, जगत् की सत्ता और परमसत्ता से संबंध के उन्हीं मूलभूत प्रश्नों को स्पर्श करती हैं। सन्दर्भ यह भी देखें प्रकाशानन्द अद्वैत वेदान्त आनंदमयी माँ जार्ज बर्कली श्रेणी:फ्रांसीसी दार्शनिक श्रेणी:भारतविद् श्रेणी:संस्कृतविद् श्रेणी:फ्रांसीसी उपन्यासकार श्रेणी:फ्रांसीसी कवि मार्टिन शिफ्लो (Martine Chifflot) एक फ्रांसीसी दार्शनिक और संस्कृतविद् हैं, जो कवयित्री, उपन्यासकार और रंगमंच-निर्देशिका भी हैं। क्लॉड बर्नार्ड विश्वविद्यालय लियों 1 में मानद प्राध्यापिका (professeure agrégée honoraire), दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट और शोध-निर्देशन हेतु अधिकृत (HDR), वे उन विरल पाश्चात्य विदुषियों में से हैं जिन्होंने वेदान्त की आध्यात्मिक-दार्शनिक परंपरा को बाहर से अध्ययन के विषय के रूप में नहीं, अपितु संस्कृत की प्रत्यक्ष शिक्षा और मूल ग्रंथों के गहन परायण के माध्यम से आंतरिक रूप से ग्रहण किया — एक ऐसी पद्धति जिसे वे स्वयं स्पष्ट रूप से शैक्षणिक प्राच्यवाद (orientalisme) से पृथक् करती हैं। एक गैर-प्राच्यवादी भारतविद् भारतविद्या और प्राच्यवाद के बीच जो भेद मार्टिन शिफ्लो करती हैं, वह उनकी समग्र दार्शनिक दृष्टि के केंद्र में है। उनके अनुसार प्राच्यवाद भारतीय दर्शन को बाहर से, पाश्चात्य श्रेणियों के माध्यम से देखता है — ऐसी श्रेणियाँ जिन्हें वह बिना किसी आत्म-परीक्षण के आरोपित कर देता है। उनकी अपनी पद्धति इसके विपरीत है : ग्रंथों को उनकी मूल भाषा में पढ़ने के लिए संस्कृत सीखना, दर्शनों (darśana) को उनकी आंतरिक संरचना में समझना, और उन समकालीन समन्वयवादी प्रवृत्तियों को अस्वीकार करना जो दोनों परंपराओं को निर्बल बना देती हैं। उन्होंने लियों में मैरी-क्लॉड पोर्शे के निर्देशन में संस्कृत सीखी, तत्पश्चात् 1991 में पेरिस चतुर्थ विश्वविद्यालय - सोर्बोन में मिशेल युलेन के निर्देशन में जार्ज बर्कली के भाववाद और प्रकाशानन्द के सिद्धान्त के तुलनात्मक अध्ययन पर शोध-प्रबंध प्रस्तुत कियाMartine Chifflot, Le thème de l'esse est percipi dans la pensée de Berkeley et de Prakāśānanda, thèse de doctorat, Université Paris IV-Sorbonne, juin 1991, ANRT réf. 12611.। यह शोध-प्रबंध पहला अकादमिक अध्ययन है जो यह स्थापित करता है कि वेदान्त की दृष्टि-सृष्टि-वाद की परम्परा — जो है, वह प्रत्यक्षित है — बर्कले के प्रसिद्ध esse est percipi (1710) से डेढ़ शताब्दी से भी पूर्व, अद्वैत वेदान्त की आंतरिक तर्क-परम्परा से स्वतन्त्र रूप से विकसित हुई थी, बिना किसी पाश्चात्य प्रभाव के। 2005 में उन्होंने प्रकाशानन्द की वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली का प्रथम फ्रांसीसी अनुवाद प्रकाशित किया, जो सीधे संस्कृत पाठ पर आधारित हैMartine Chifflot (traduction, présentation et notes), Le collier de perles des doctrines du Vedānta, L'Harmattan, Paris, 2005.। फ्रांसीसी दार्शनिक शिक्षक-संघ की पत्रिका L'Enseignement philosophiqueफ्रांस के सार्वजनिक शिक्षण में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापकों के संघ की पत्रिका, 1951 में स्थापित। में प्रकाशित अपने लेखों में वे बारंबार इस बात पर बल देती हैं कि योग और वेदान्त के ग्रंथों के लिए कठोर अध्ययन आवश्यक है — विशेषतः संस्कृत का ज्ञान — ताकि उन भ्रान्तियों से बचा जा सके जो सरलीकृत या पक्षपातपूर्ण पठन से अनिवार्यतः उत्पन्न होती हैं। उनके अनुसार पाश्चात्य जगत् में आध्यात्मिक क्षेत्र «धूर्तों और आक्रामक जालसाजों» से भरा हुआ हैMartine Chifflot, « La libération selon le Yoga et le Védānta », L'Enseignement philosophique, vol. 72, n° 4, 2022, p. 37 (DOI : 10.3917/eph.725.0035).। आनंदमयी माँ का उपदेश मार्टिन शिफ्लो अपने दो शैक्षणिक लेखों में स्पष्ट रूप से आनंदमयी माँ के उस उपदेश का उल्लेख करती हैं जो वे पाश्चात्य साधकों को देती थीं : भारतीय परंपरा से नवजीवन प्राप्त करके अपनी मूल आध्यात्मिक परंपरा में लौट जाओ। यह शिक्षा उनकी अपनी दार्शनिक यात्रा का मार्गदर्शन करती रही है : वेदान्त और संस्कृत उनके लिए वह स्रोत रहे हैं जिनसे उन्होंने उन परंपराओं को पुनर्जीवित किया जिन्हें पश्चिमी आधुनिकता ने क्षीण कर दिया थाMartine Chifflot, « La libération selon le Yoga et le Védānta », L'Enseignement philosophique, vol. 72, n° 4, 2022, p. 37 et p. 45.। इसी अंतराल में — भारतविद् की कठोरता और अपनी परंपरा के प्रति निष्ठा के बीच — उनका दार्शनिक कार्य आकार लेता है। थॉमिस्ट-वेदान्तिक संश्लेषण मार्टिन शिफ्लो की दार्शनिक स्थिति की विशिष्टता इस बात में है कि वे थॉमस एक्विनास और वेदान्त के बीच के संबंध को बाहरी तुलना के रूप में नहीं, अपितु आत्मा-विषयक दो आध्यात्मिक-दार्शनिक परंपराओं के बीच वास्तविक अभिसरणों की अन्वेषणा के रूप में देखती हैं। उनका ग्रंथ Saint Thomas, l'âme et les sens (M+ Éditions, 2021) इस साम्य को थॉमिस्ट दिशा से विकसित करता है, जबकि पत्रिका Aditiहिन्दू परंपरा के अध्ययन को समर्पित Centre Aditi की पत्रिका, जो 2018 से 2022 के बीच चार अंकों में प्रकाशित हुई। प्रथम दो अंक द्विभाषी (फ्रांसीसी-अंग्रेजी) थे (ऑनलाइन पढ़ें : [https://centre-aditi.com/magazine/cahiers_aditi_en/ Aditi I & II — English version]). में उनके लेख इसे वेदान्तिक दिशा से विकसित करते हैं, विशेषतः दर्शनों (darśana) और उनकी पदानुक्रमिक व्यवस्था के तुलनात्मक परीक्षण के माध्यम सेMartine Chifflot, « Le moi, le monde et Dieu. Perspectives dualistes et non-dualistes du Védānta », Aditi, n° IV, 2022 (ऑनलाइन पढ़ें : centre-aditi.com).। यह संश्लेषण कोई निश्चित सैद्धान्तिक मत नहीं है, अपितु एक चल रहे दार्शनिक कार्य का परिणाम है, जिसका उद्देश्य यह दर्शाना है कि भारत की आध्यात्मिक अध्यात्म-परंपरा और ईसाई आध्यात्मिक-दर्शन परंपरा — भिन्न-भिन्न मार्गों से — आत्मा की प्रकृति, जगत् की सत्ता और परमसत्ता से संबंध के उन्हीं मूलभूत प्रश्नों को स्पर्श करती हैं। सन्दर्भ यह भी देखें प्रकाशानन्द अद्वैत वेदान्त आनंदमयी माँ जार्ज बर्कली श्रेणी:फ्रांसीसी दार्शनिक श्रेणी:भारतविद् श्रेणी:संस्कृतविद् श्रेणी:फ्रांसीसी उपन्यासकार श्रेणी:फ्रांसीसी कवि