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411 समाचार
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विंध्यवासिनी धाम

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विन्ध्याचल मन्दिर विंध्याचल धाम, माँ विंध्यावासिनी शक्तिपीठ संस्कृत Vindhyavasini_mata.jpg महाशक्तिपीठ माँ विन्ध्यवासिनी मन्दिर, विन्ध्याचल हिन्दू धर्म विन्ध्यवासिनी सक्रिय नवरात्रि विन्ध्याचल मिर्ज़ापुर जिला उत्तर प्रदेश भारत Vindhyachal Temple Website विन्ध्यवासिनी धाम, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के विन्ध्याचल नगर में गंगा के किनारे स्थित एक प्रसिद्ध मन्दिर है जिसमें विंध्यवासिनी देवी विराजित हैं। भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं। यह तीर्थ भारत के प्रमुख जाग्रत शक्तिपीठों में से प्रमुख शक्तिपीठ है। शरदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि दोनों ही अवसरों पर यहा एक भव्य मेला लगता है जिसमें दूर-दूर से लाखों दर्शनार्थी पहुँचते हैं। महात्म्य महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- "विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्" (हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचलपर आप सदैव विराजमान रहती हैं।)। पद्मपुराण में विंध्याचल-निवासिनी इन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है । श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्री कृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया था तथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल चली गई। जहा अष्टभुजा मंदिर में विराजमान हैं। श्रीमद्देवीभागवत के दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपा को उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुव मनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ। यह ब्रह्मांड का प्रथम दिव्य स्वयंभू तीर्थ है जो प्रलय के पश्चात भी काशी खंड की तरह नष्ट नहीं होता। यहां, दिन में एक बार सबके लिए निर्धारित समय अंदर से दर्शनं हो सकते हैं। माँ को पुष्प शृंगार प्रिय है। महाभारत के पूर्व भगवान श्रीकृष्ण पांडवों को युद्ध में विजय का आशीर्वाद मांगने लेकर आए थे जहा युधिष्ठिर और अर्जुन ने स्व रचित स्तोत्र से उनकी स्तुति की थी जो अभी भी प्रचलित है। शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है। शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी (नंद बाबा की पुत्री) कहा गया है। मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं । इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है। शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।विंध्यवासिनी धाम https://mirzapur.nic.in/hi/tourist-place/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%ae/ जिला मिर्ज़ापुर,उत्तर प्रदेश सरकार मां के पताका (ध्वज) का महत्व मान्यता है कि शारदीय व वासंतिक नवरात्र में मां भगवती नौ दिनों तक मंदिर की छत के ऊपर पताका में ही विराजमान रहती हैं। सोने के इस ध्वज की विशेषता यह है कि यह सूर्य चंद्र पताकिनी के रूप में जाना जाता है। यह निशान सिर्फ मां विंध्यवासिनी देवी के पताका में ही होता है। अष्टभुजा देवी यंत्र के पश्चिम कोण पर उत्तर दिशा की ओर मुख किए हुए अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। अपनी अष्टभुजाओं से सब कामनाओं को साधती हुई वह संपूर्ण दिशाओं में स्थित भक्तों की आठ भुजाओं से रक्षा करती हैं। ऐसी मान्यता है कि वहां अष्टदल कमल आच्छादित है, जिसके ऊपर सोलह दल हैं। उसके बाद चौबीस दल हैं। बीच में एक बिंदु है जिसमें ब्रह्मरूप से महादेवी अष्टभुजी निवास करती हैं। इन्हें भी देखें विन्ध्यवासिनी देवी विन्ध्याचल शक्तिपीठ सन्दर्भ श्रेणी:उत्तर प्रदेश के हिन्दू तीर्थ श्रेणी:देवी तीर्थ श्रेणी:शक्ति पीठ श्रेणी:विंध्याचल श्रेणी:मिर्जापुर