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यथार्थवाद (हिंदी साहित्य)
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साहित्यिक यथार्थवाद मार्च 2024
यथार्थवाद बीसवीं शती के तीसरे दशक के आसपास से हिन्दी साहित्य में पाई जाने वाली एक विशेष विचारधारा थी। इसके मूल में कुछ सामाजिक परिवर्तनों का हाथ था। जो परिवर्तन हुआ उसके मूलकारण थे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम, कम्यूनिस्ट आन्दोलन, वैज्ञानिक क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर हुए विस्फोट, विश्व साहित्य में हुए परिवर्तनों का परिचय और आर्य समाज आदि सामाजिक आन्दोलन। यथार्थवादी लेखकों ने समाज के निम्नवर्ग के लोगों के दुखद जीवन का चित्रण किया। उनके उपन्यासों के नायक थे गरीब किसान, भिखमँगे, भंगी, रिक्शा चालक मज़दूर, भारवाही श्रमिक और दलित। इसके पहले कहानी साहित्य में ऐसे उपेक्षित वर्ग को कोई स्थान नहीं था।
श्रेणी: साहित्यिक आंदोलन
श्रेणी:बहुविकल्पी शब्द