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चौधरी मुख्तार सिंह
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चौधरी मुख्तार सिंह भारत के एक देशभक्त हिन्दीसेवी एवं शिक्षाविद थे।
1946 में वायसराय कौंसल के सदस्य चौधरी मुख्तार सिंह ने जापान और जर्मनी की यात्रा के बाद यह अनुभव किया था कि यदि भारत को कम समय में आर्थिक दृष्टि से उन्नत होना है तो जन भाषा में जन वैज्ञानिक बनाने होगे। उन्होने मेरठ के पास एक छोटे से कस्बे में "विज्ञान कला भवन" नामक संस्था की स्थापना की। हिन्दी मिडिल पास छात्रों को उसमें प्रवेश दिया। और हिन्दी के माध्यम से मात्र पांच वर्षों में उन्हें एमएससी के कोर्स पूरे कराकर "विज्ञान विशारद" की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार के प्रयोग से वे देश की सरकार को दिशा देना चाहते थे कि जापान की भांति भारत का हर घर लघु उद्योग केन्द्र हो सकता है। दुर्भग्यवश दो स्नातकटोलियों के निकलने के बाद ही चोधरी साहब की मृत्यु हो गई और प्रदेश सरकार ने "विज्ञान कलाभवन" को इंटर कॉलेज बना दिया। वहां तैयार किए गए ग्रन्थों के प्रति भी कोई मोह सरकार का नहीं था। पर इस प्रयोग ने यह भी सिद्ध तो किया ही (अगर यह सिद्ध करने की जरूरत थी तो) कि जनभाषा ही आर्थिक उन्नति का रहस्य है। जनविज्ञान, विकास की आत्मा है।
जनभाषा ही जनतंत्र की मूल आत्मा को प्रतिबिनि्बत कर सकती है, यह बात गांधी जी ही नहीं और नेता भी जानते थे। तभी तो राजाजी कहते थे, 'हिन्दी का प्रश्न आजादी के प्रश्न के जुड़ा है'। और तभी तो आजाद हिन्द फौज की भाषा हिन्दी थी। तभी तो युवको को अंग्रेजी स्कूलों से हटा कर उनके अभिभावको ने हिन्दी एवं राष्ट्रीय विद्यालयों में भेजा था। लाल बहादुर शास्त्री आदि देशरत्न ऐसे ही विद्यालयों की उपज थे। हिन्दी परिवर्तन की भाषा थी, क्रान्ति का उद्बोधन थी उन दिनों।
बाहरी कड़ियाँ
भाषा विषयक ऐतिहासिक भूलें (डॉ मधुसूदन)
चौधरी मुख्तार सिंह राजकीय महिला पॉलीटेकनिक
श्रेणी:हिन्दीसेवी