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रूपकुण्ड
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रूपकुण्ड झील 30.262 79.732 उत्तराखंड चमोली वाँण 5029 sq. km Nil sq. km २४६४२७
रूपकुंड (कंकाल झील) भारत उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित एक हिम झील है जो अपने किनारे पर पाए गये पांच सौ से अधिक मानव कंकालों के कारण प्रसिद्ध है। यह स्थान निर्जन है और हिमालय पर लगभग 5029 मीटर (16499 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है। इन कंकालों को 1942 में नंदा देवी शिकार आरक्षण रेंजर एच. के. माधवल, ने पुनः खोज निकाला, यद्यपि इन हड्डियों के बारे में आख्या के अनुसार वे 19वीं सदी के उतरार्ध के हैं।http://www.wondermondo.com/Countries/As/India/Uttarakhand/Roopkund.htm Roopkund - Skeleton lake Wondermondo 21 अक्तूबर 2010 https://web.archive.org/web/20170920093151/http://www.wondermondo.com/Countries/As/India/Uttarakhand/Roopkund.htm 20 सितंबर 2017 dead इससे पहले विशेषज्ञों द्वारा यह माना जाता था कि उन लोगों की मौत महामारी भूस्खलन या बर्फानी तूफान से हुई थी। 1960 के दशक में एकत्र नमूनों से लिए गये कार्बन डेटिंग ने अस्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि वे लोग 12वीं सदी से 15वीं सदी तक के बीच के थे।
thumb|Human Skeletons in Roopkund Lake
2004 में, भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के एक दल ने उस स्थान का दौरा किया ताकि उन कंकालों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके। उस टीम ने अहम सुराग ढूंढ़ निकाले जिनमें गहने, खोपड़ी, हड्डियां और शरीर के संरक्षित ऊतक शामिल थे।http://www.रूपकुंड.कॉम/2008/12/23/रूपकुंड-लेक/जून 2020 InternetArchiveBot लाशों के डीएनए परीक्षण से यह पता चला कि वहां लोगों के कई समूह थे जिनमें शामिल था छोटे कद के लोगों का एक समूह (सम्भवतः स्थानीय कुलियों) और लंबे लोगों का एक समूह जो महाराष्ट्र में कोकणस्थ ब्रामिंस के डीएनए उत्परिवर्तन विशेषता से निकट संबंधित थे। हालांकि संख्या सुनिश्चित नहीं की गयी, 500 से अधिक लोगों से संबंधित अवशेष पाए गए हैं और यह भी माना जाता है कि छह सौ से अधिक लोग मारे गए थे। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय रेडियोकार्बन प्रवर्धक यूनिट में हड्डियों की रेडियोकार्बन डेटिंग के अनुसार इनकी अवधि 850 ई. में निर्धारित की गयी है जिसमें 30 वर्षों तक की गलती संभव है।
thumb|Roopkund Lake
खोपड़ियों के फ्रैक्चर के अध्ययन के बाद, हैदराबाद, पुणे और लंदन में वैज्ञानिकों ने यह निर्धारित किया कि लोग बीमारी से नहीं बल्कि अचानक से आये ओला आंधी से मरे थे। ये ओले, क्रिकेट के गेंदों जितने बड़े थे और खुले हिमालय में कोई आश्रय न मिलने के कारण सभी मर गये। इसके अलावा, कम घनत्व वाली हवा और बर्फीले वातावरण के कारण, कई लाशें भली भाँति संरक्षित थी। उस क्षेत्र में भूस्खलन के साथ, कुछ लाशें बह कर झील में चली गयी। जो बात निर्धारित नहीं हो सकी वह है कि, यह समूह आखिर जा कहाँ रहा था। इस क्षेत्र में तिब्बत के लिए व्यापार मार्ग होने का कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं है लेकिन रूपकुंड, नंदा देवी पंथ की महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा के मार्ग पर स्थित है जहां नंदा देवी राजजातउत्सव लगभग प्रति 12 वर्षों में एक बार मनाया जाता था।Sturman Sax William Mountain goddess: gender and politics in a Himalayan pilgrimage https://archive.org/details/mountaingoddessg0000saxw 1991 Oxford University Press en 019506979X 256
पर्यटन
रूपकुंड, हिमालय की गोद में स्थित एक मनोहारी और खूबसूरत पर्यटन स्थल है, यह हिमालय की दो चोटियों के तल के पास स्थित है: त्रिशूल (7120 मीटर) और नंदघुंगटी (6310 मीटर). बेदनी बुग्याल की अल्पाइन तृणभूमि पर प्रत्येक पतझड़ में एक धार्मिक त्योहार आयोजित किया जाता है जिसमें आसपास के गांवों के लोग शामिल होते हैं। नन्दा देवी राजजात का उत्सव, रूपकुंड में बड़े पैमाने पर प्रत्येक बारह वर्ष में एक बार मनाया जाता है।
कंकाल झील वर्ष के ज्यादातर समय बर्फ से ढकी हुई रहती है। हालांकि, रूपकुंड की यात्रा एक सुखद अनुभव है। पूरे रास्ते भर, व्यक्ति अपने चारों ओर से पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ होता है।
यात्री के लिए रूपकुंड जाने के कई रास्ते हैं। आम तौर पर, ट्रेकर और रोमांच प्रेमी सड़क मार्ग से लोहाजंग या वाँण से रूपकुंड की यात्रा करते हैं। वहां से, वे [वांण] में एक पहाड़ी पर चढ़ते है और रणका धार पहुंचते हैं। वहां कुछ समतल क्षेत्र है जहां ट्रेकर रात को शिविर लगा सकते हैं। अगर आसमान साफ हो, तो व्यक्ति बेदनी बग्याल और त्रिशूल देख सकता हैं। अगला शिविर स्थान है बेदनी बुग्याल, जो वांण से 12-13 कि॰मी॰ दूर है पर है। वहां खच्चरों, घोड़ो और भेड़ो के लिए एक विशाल चरागाह है। वहां दो मंदिर और एक छोटी झील है जो उस जगह की खूबसूरती को बढ़ाता है। व्यक्ति बेदनी बुग्याल पुल से हिमालय की कई चोटियों को देख सकता हैं। इसके बाद ट्रेकर भखुवाबासा तक पहुंचता है, जो बेदनी बुग्याल से 10-11 कि॰मी॰ दूर है। भखुवाबासा का जलवायु वर्ष के अधिकांश समय प्रतिकूल रहता है। व्यक्ति को त्रिशूल और 5000 मीटर से अधिक ऊंची अन्य चोटियों को करीब से देखने का अवसर मिलता है। आसपास के पहाड़ों की गहरी ढलानों पर कई झरने और भूस्खलन देखने को मिलते हैं। भखुवाबासा से, ट्रेकर या तो रूपकुंड जाकर वापस आते हैं या वे जुनारगली कर्नल पास, जो झील के थोड़ी ही ऊपर है, से होते हुए शिला समुद्र (पत्थरों का महासागर) जाते हैं और फिर वे [होमकुंड] तक ट्रेक के द्वारा आगे बढ़ते हैं।
अभिगम
मार्ग १
काठगोदाम→अलमोड़ा→गरूड़→ग्वालदम→देवाल(1220 मी)→लोहाजंग→वाँण (2590 मीटर)→बेदनी बुग्याल (3660 मी)→बगुवाबासा→केलू विनायक→रूपकुंड
मार्ग २
ऋषिकेश→देवप्रयाग→श्रीनगर गढ़वाल→कर्णप्रयाग→थराली→देवालजेड→वाँण→बेदिनी बुग्याल (3660 मी)→बगुवाबासा→केलू विनायक→रूपकुंड
लोकप्रिय संस्कृति में रूपकुंड के कंकाल
रूपकुंड के कंकालों को नेशनल ज्योग्राफिक के वृत्तचित्र "रिडल्स ऑफ़ दी डेड: स्केलिटन लेक" में दर्शाया गया है।
सन्दर्भ
ऐत्केन, बिल. दी नंदा देवी अफेयर, पेंगुइन बुक्स इंडिया, 1994. ISBN 0-14-024045-4.
श्रेणी:उत्तराखण्ड की झीलें
श्रेणी:चमोली जिला
श्रेणी:हिमचट्टाने