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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

उराँव

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परिचय 300px|thumb|right|एक कुड़ुख वृद्धा (छोटानागपुर) ओराँव या उराव 'कुड़ुख' भारत की एक प्रमुख जनजाति हैं। ये भारत के केन्द्रीय एवं पूर्वी राज्यों में तथा बंगलादेश के निवासी हैं। इनकी भाषा का नाम भी 'उराँव' या 'कुड़ुख' है जो द्रविण भाषा परिवार से संबन् या उराँव छोटा नागपुर क्षेत्र का एक आदिवासी समूह है। ओराँव अथवा उराँव नाम इस समूह को दूसरे लोगों ने दिया है। अपनी लोकभाषा में यह समूह अपने आपको 'कुरुख' नाम से वर्णित करता है। अँगरेजी में 'ओ' अक्षर से लिखे जाने के कारण इस समूह के नाम का उच्चारण 'ओराँव' किया जाता है; झारखंड/छत्तीसगढ़ में 'उराँव' नाम का प्रचलन अधिक है। उराँव भाषा द्रविड़ परिवार की है जो समीपवर्ती आदिवासी समूहों की मुंडा भाषाओं से सर्वथा भिन्न है। उराँव भाषा और कन्नड में अनेक समताएँ हैं। संभवत: इन्हें ही ध्यान में रखते हुए, गेट ने १९०१ की अपनी जनगणना की रिपोर्ट में यह संभावना व्यक्त की थी कि उराँव मूलत: कर्नाटक क्षेत्र के निवासी थे। उनका अनुमान था कि इस समूह के पूर्वज पहले कर्नाटक से नर्मदा उपत्यका में आए और वहाँ से बाद में बिहार राज्य के सोन तट के भागों में आकर बस गए। पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में इस अनुमान को वैज्ञानिक मानना उचित नहीं होगा। आप गलत बाता रहे है | rksrtar.com अधिकांश उराँव इस समय राँची जिले के मध्य और पश्चिमी भाग में रहते हैं। उराँव समूह के प्रथम वैज्ञानिक अध्येता स्वर्गीय शरच्चन्द्र राय का मत है कि बिहार में ये पहले शाहाबाद जिले के सोन और कर्मनाशा नदियों के बीच के भाग में रहते थे। यह क्षेत्र 'कुरुख देश' के नाम से जाना जाता था। कुरुख शब्द संभवत: किसी मूल द्रविड़ शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है। राय का अनुमान है कि इस मूल शब्द का अर्थ 'मनुष्य' रहा होगा। इस समूह की अर्थव्यवस्था मूलत: कृषि पर अवलंबित है। आखेट द्वारा भी वे अंशत: अपनी जीविका अर्जित करते हैं। जाल और फंदों द्वारा वे जंगली जानवर और मछलियाँ पकड़ते हैं। उराँव अनेक गोत्रों में विभाजित हैं। गोत्र के भीतर वैवाहिक संबंध निषिद्ध होते हैं। प्रत्येक गोत्र का अपना विशिष्ट गोत्रचिह्न होता है। राय के अनुसन्धानों द्वारा ६८ गोत्रों की सूची प्रात हुई है। इनमें से १६ के गोत्रचिह्न जंगली जानवरों पर, १२ के पक्षियों पर, १४ के मछलियों तथा अन्य जलचरों पर, १९ के वनस्पतियों पर, २ के खनिजों पर, २ के स्थानीय नामों पर तथा१ का सर्पो पर आधारित है। शेष दो विभाजित गोत्र हैं। प्रत्येक गोत्र अपने आपको एक विशिष्ट पूर्वज की संतान मानता है, यद्यपि गोत्रचिह्न को ही पूर्वज मानने का विश्वास उनमें नहीं पाया जाता। गोत्रचिह्न के संबंध में उनका विश्वास है कि उनके पूर्वजों को उससे प्राचीन काल में कोई न कोई अविस्मरणीय सहायता मिली थी जिसके कारण समूह के एक खंड का नाम उससे अविभाज्य रूप से संबद्ध हो गया। प्रत्येक गोत्र अपने गोत्रचिह्नवाले प्राणी, वृक्ष अथवा पदार्थ का किसी भी तरह उपयोग नहीं करता। उसे किसी भी प्रकार हानि पहुँचाना भी उनके सामाजिक नियमों द्वारा वर्जित है। यदि उनका गोत्रचिह्न कोई प्राणी या पक्षी है तो वे न तो उसका शिकार करेंगे और न उसका मांस खाएँगे। इसी तरह यदि उनका गोत्रचिह्न कोई वृक्ष है तो वे उसकी छाया में भी नहीं जायेंगे। उराँव समाज में संबंध व्यवस्था वर्गीकृत संज्ञाव्यवस्था पर आधारित होती है। विवाह सदा गोत्र के बाहर होते हैं। तीन पीढ़ियों तक के कतिपय रक्तसंबंधियों और वैवाहिक संबंधियों में भी विवाह का निषेध होता है। प्रत्येक उराँव ग्राम की अपनी स्वतंत्र नियन्त्रण व्यवस्था होती है। सामाजिक नियमों के उल्लंघन पर विचार गाँव के पंच करते हैं। गाँव के 'महतो' और 'पाहन' इस कार्य में उनका निर्देश करते हैं। पंचों की बैठक बहुधा गाँव के अखाड़े में होती है। राज्य-शासन-व्यवस्था का विस्तार अब आदिवासी क्षेत्रों में हो चुका है, इसलिए पंचों की परंपरागत शक्ति बहुत अंशों में क्षीण हो गई है। वे अब जातीय परंपराओं के उल्लंघन पर ही विचार कर सकते हैं। उराँव लोगों का अन्तर-ग्राम-संगठन भी उल्लेखनीय है। कई समवर्ती ग्राम 'परहा' के रूप में संगठित होते हैं। उनके केन्द्रीय संगठन का नाम 'परहा पंच' होता है। परहा का सबसे महत्वपूर्ण गाँव राजा-गाँव माना जाता है। तीन अन्य महत्वपूर्ण गाँव अपने महत्त्व के अनुसार क्रमश: दीवान गाँव, पानरे गाँव (लिपिक ग्राम) और कोटवार ग्राम माने जाते हैं। शेष सब प्रजागाँव माने जाते हैं। परहा संगठन अपने सब सदस्य ग्रामों की सुरक्षा का प्रबंध करता है। मानवीय तथा अमानवीय प्राकृतिक तथा दैवी–प्रत्येक प्रकार की शक्तियों से ग्रामसमूह को बचाना इस संगठन का मुख्य कार्य होता है। परहा संगठन की ओर से सामूहिक शिकार, नृत्य, भोज इत्यादि का भी आयोजन किया जाता है। वे मेले और जात्राओं का भी प्रबंध करते हैं। जातीय लड़ाइयों में परहा के सदस्य एक दूसरे की सहायता करते हैं। 'धूमकुड़िया' उराँव की एक विशिष्ट संस्था थी। यह एक प्रकार का युवागृह होता है जिसका प्रचलन भारत तथा संसार के कतिपय अन्य आदिवासी समूहों में वास और संगठन के महत्वपूर्ण भेदों के साथ पाया जाता है। उराँव समाज में लड़कों और लड़कियों की अलग-अलग धूमकुड़िया होती है यद्यपि वे एक दूसरे के पास आ जा सकने के लिए स्वतंत्र रहते हैं। कहा जाता है, पहले तरुण तरुणियों को इन गृहों में यौन संबंधों की स्वतंत्रता रहती थी। इस दिशा में उनका केवल गोत्रनियमों भर का पालन करना आवश्यक माना जाता था। समवर्ती जातियों की आलोचना के कारण इस संस्था का ह्रास होता जा रहा है। उसकी संख्या कम हो गई है। जहाँ वह आज भी पाई जाती है वहाँ उसके आंतरिक संगठन में अनेक मूलभूत परिवर्तन हो गए हैं। तरुण-तरुणियों की स्वतंत्रता कई अंशों में सीमित हो गई है। उराँव समाज में बड़ी तीव्र गति से परिवर्तन हो रहे हैं। ईसाई धर्म के प्रचार से उनकी संस्कृति में परिवर्तन हुआ है। आजीविका के लिए अनेक उराँव खनिज उद्योग तथा इस्पात उद्योग की ओर भी अग्रसर हुए हैं। नई राजनीतिक चेतना ने भी उन्हें संगठन की एक नई दिशा दी है। सन्दर्भ ग्रन्थ शरच्चंद्र राय: दि ओराँव; धीरेंद्रनाथ मजूमदार : रेसेज़ ऐंड कल्चर्स ऑव इडिया। इन्हें भी देखें उराँव भाषा बाहरी कड़ियाँ अंग्रेज भी उरांवों को दास नहीं बना सके (भारतीय पक्ष) श्रेणी:भारत की जनजातियाँ