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411 समाचार
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कुमाऊँ राज्य

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प्राचीन कुमाऊँ राज्य अन्य प्रयोगों कुमाऊँ कुमाऊँ राज्य कुमाऊँ एशिया राजशाही पूर्ण राजशाही, एकात्मक राज्य ७०० १७९० कत्यूरी राजवंश नेपाल अधिराज्य Flag of Kumaon.png Kumaon (Rudra Chand).png अपने चरम विस्तार पर कुमाऊँ की सीमाएं चम्पावत(७५७-१५६३)अल्मोड़ा(१५६३-१७९१) संस्कृत रुपया सोम चन्द महेन्द्र चन्द ७००-७२१ १७८८-१७९० राजा ... कुमाऊँ राज्य, जिसे कूर्मांचल भी कहा जाता था, चन्द राजवंश द्वारा शासित एक पर्वतीय राज्य था, जिसका विस्तार वर्तमान भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में था। राज्य की स्थापना ७०० में सोम चन्द ने की थी। प्रारम्भ में यह केवल वर्तमान चम्पावत जनपद तक ही सीमित था। उसके बाद सोम चन्द ने सुई पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिला लिया। सर्वप्रथम राजा त्रिलोक चन्द ने छखाता पर आक्रमण कर पश्चिम की ओर राज्य का विस्तार किया। उसके बाद गरुड़ ज्ञान चन्द ने तराई-भाभर, उद्यान चन्द ने चौगरखा, रत्न चन्द ने सोर और कीर्ति चन्द ने बारहमण्डल, पाली तथा फल्दाकोट क्षेत्रों को राज्य में मिला लिया। १५६३ में बालो कल्याण चन्द ने राजधानी चम्पावत से आलमनगर स्थानांतरित कर नगर का नाम अल्मोड़ा रखा, और गंगोली तथा दानपुर पर अधिकार स्थापित किया। उनके बाद उनके पुत्र रुद्र चन्द ने अस्कोट और सिरा को पराजित कर राज्य को उसके चरम पर पहुंचा दिया। सत्रहवीं शताब्दी में कुमाऊँ में चन्द शासन का स्वर्ण काल चला, परन्तु अट्ठारवीं शताब्दी आते आते उनकी शक्ति क्षीण होने लगी। १७४४ में रोहिल्लों के तथा १७७९ में गढ़वाल के हाथों पराजित होने के बाद चन्द राजाओं की शक्ति पूरी तरह बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन्‌ १७९० ई. में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया। इतिहास कुणिंद कौलिन्द कुमाऊँ का पहला शासक वंश था, जिसका राज इस क्षेत्र पर ५०० ईसा पूर्व से ६०० ईस्वी तक रहा। इनके बाद कत्यूरी राजाओं ने इस क्षेत्र पर शासन किया। कत्यूरी काल में ही कुमाऊँ में कटारमल, द्वाराहाट तथा बैजनाथ में मंदिरों का निर्माण हुआ। कार्तिकेयपुरा, जहाँ कत्यूरियों की राजधानी थी, और समीप स्थित गोमती घाटी को इस शासक वंश के नाम पर बाद में कत्यूर घाटी कहा जाने लगा। स्थापना चन्द वंश की स्थापना में जो घटना प्रमुख रूप से स्वीकार की जाती है वह इस प्रकार है कि-इलाहाबाद के झूसी नामक स्थान में चन्द्रवंशी राजपूत रहते थे। उन्ही में से एक कुंवर सोम चन्द अपने २७ सलाहकारों के साथ बद्रीनाथ की यात्रा पर आये, उस समय काली कुमाऊं में ब्रह्मदेव कत्यूरी का शासन था।वॉल्टन १९११ १६५ कुंवर सोमचन्द ने ब्रह्मदेव की एकमात्र कन्या 'चम्पा' से विवाह कर लिया, तथा दहेज में उपहार स्वरूप मिली पन्द्रह बीघा जमीन पर एक एक छोटा सा राज्य स्थापित किया।वर्मा २०१४ १८ अपनी रानी के नाम पर ही उन्होंने चम्पावती नदी के तट पर चम्पावत नगर की स्थापना की, और उसके मध्य में अपना किला बनवाया, जिसका नाम उन्होंने 'राजबुंगा' रखा।वर्मा २०१४ १८ लोकमतानुसार यह घटना सन् ७०० ई॰ की है। किले के चारों ओर की पहाड़ियों पर चार प्रमुख 'बुड़ों' (बूढ़ा, सेना एवं पुलिस के कार्यों की देखभाल करने वाले प्रमुख सामन्त) में क्रमशः बोरा, कार्की, तड़ागी और चौधरियों की लघु गढ़ीनुमा ग्रामीण बस्तियाँ बसी हुई थीं, जो प्रत्येक दिशा से राजा तक पहुँचने वाले किसी भी बाहरी आक्रमणकारी को आगे बढ़ने से रोका करते थे। इन चार प्रमुख सामन्तों को अपने गुज़ारे के लिए आसपास का क्षेत्र आवंटित था। इनको चन्द राजाओं के राज्यकाल में जागीरें तथा अन्य सम्मान देकर सन्तुष्ट किया जाता था। चन्द राजाओं के प्रत्येक दानपत्र में इन चार प्रमुख बूड़ों का साक्षियों के रूप में अनिवार्यतः उल्लेख रहता था, इसीलिए इनको 'बुड़ा' (बूढ़ा, सबसे वरिष्ठ) कहा जाता था। अंग्रेज़ी काल में ब्रिटिश ताज के प्रति राजभक्ति प्रदर्शित करने के बाद भी ये संबोधन प्रचलन में बने रहे। इनके राजा द्वारा मान्यता प्राप्त प्रमुख गाँव अथवा ठिकाने में क्रमशः फुंगर के बोरा, कक्यूड़ा के कार्की, मेलकोट के तड़ागी और चक्कू के चौधरी प्रसिद्ध हैं।वर्मा २०१४ १८ बाद में ये काली कुमाऊं की चार आल के रूप में प्रसिद्ध हुए।वर्मा २०१४ १८ राजा सोमचन्द ने अपने फौजदार कालू तड़ागी की सहायता से सर्वप्रथम स्थानीय रौत राजा को परास्त कर सुई क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया।वॉल्टन १९११ १६६वर्मा २०१४ १८ राजा सोमचन्द के बाद उनके पुत्र आत्मचन्द, चन्द वंश के उत्तराधिकारी बने।वर्मा २०१४ १८ पश्चात क्रमशः संसार चन्द, हमीर चन्द, वीणा चन्द आदि ने चम्पावत की राजगद्दी संभाली।वॉल्टन १९११ १६६ इस समय चम्पावत और कूर्मांचल (काली कुमाऊं) में लगभग दो-तीन सौ घर थे। विस्तार त्रिलोक चन्द (१२९६-१३०३) ने छखाता पर कब्ज़ा किया, और भीमताल में किले का निर्माण किया।वॉल्टन १९११ १६५ गरुड़ ज्ञान चन्द (१३७४-१४१९) ने भाभर तथा तराई पर अधिकार स्थापित किया।वॉल्टन १९११ १६७ उद्यान चन्द (१४२०-१४२१) ने राजधानी चम्पावत में बालेश्वर मन्दिर की नींव रखी, और चौगरखा पर कब्ज़ा किया।वॉल्टन १९११ १६८ भारती चन्द (१४३७-१४५०) ने डोटी के राजाओं को पराजित किया। रत्न चन्द (१४५०-१४८८) ने बाम राजाओं को हराकर सोर पर कब्ज़ा किया और डोटी के राजाओं को पुनः पराजित किया।वॉल्टन १९११ १६८ कीर्ति चन्द (१४८८-१५०३) ने बारहमण्डल, पाली तथा फल्दाकोट पर कब्ज़ा किया।वॉल्टन १९११ १६९ भीष्म चन्द (१५५५-१५६०) ने चम्पावत से राजधानी खगमरा किले में स्थानांतरित की, आलमनगर की नींव रखी और बारहमण्डल खस सरदार गजुआथिँगा को हारे।वॉल्टन १९११ १७० बालो कल्याण चन्द (१५६०-१५६८) ने बारहमण्डल पर पुनः कब्ज़ा किया, राजधानी खगमरा किले से आलमनगर स्थानांतरित कर नगर का नाम अल्मोड़ा रखा, और गंगोली तथा दानपुर पर कब्ज़ा किया।वॉल्टन १९११ १७१ रुद्र चन्द (१५६८-१५९७) ने काठ एवं गोला के नवाब से तराई का बचाव किया, रुद्रपुर नगर की स्थापना की, अस्कोट को पराजित किया, और सिरा पर कब्ज़ा किया।वॉल्टन १९११ १७४ centre horizontal कुमाऊँ का विस्तार Kumaon (Som Chand).png 200 सोम चन्द (७००-७२१) Kumaon (Gyan Chand).png 200 गरुड़ ज्ञान चन्द (१३७४-१४१९) Kumaon (Kirti Chand).png 200 कीर्ति चन्द (१४८८-१५०३) Kumaon (Kayan Chand).png 200 बालो कल्याण चन्द (१५६०-१५६८) Kumaon (Rudra Chand).png 200 रुद्र चन्द (१५६८-१५९७) पतन १७४४ में, रोहिल्ला नेता अली मोहम्मद खान ने इस इलाके में एक सेना को भेजा और भीमताल के रास्ते से अल्मोड़ा में प्रवेश किया।एटकिंसन १९७४ ५८६ चन्द सेना उनका विरोध नहीं कर पाई, क्योंकि तत्कालीन शासक कल्याण चंद पंचम, कमजोर और अप्रभावी थे।एटकिंसन १९७४ ५८८ रोहिल्लाओं ने अल्मोड़ा पर कब्जा कर लिया, और सात महीनों तक वहां ही रहे। इस समय में उन्होंने लखनपुर, कटारमल, कत्यूर, भीमताल तथा अल्मोड़ा के बहुत से मंदिरों को नुकसान भी पहुंचाया।एटकिंसन १९७४ ५८७ हालांकि अंततः क्षेत्र के कठोर मौसम से तंग आकर, और तीन लाख रुपए के हर्जाने के भुगतान पर, रोहिल्ला बाराखेड़ी में एक छोटी सी सैन्य टुकड़ी छोड़कर वापस अपनी राजधानी बरेली लौट गये।एटकिंसन १९७४ ५८८ अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में गढ़वाल के राजा ललित शाह ने अल्मोड़ा पर आक्रमण कर तत्कालीन राजा मोहन चन्द को पराजित कर दिया। कुमाऊँ पर विजय के बाद उनके पुत्र प्रद्युम्न शाह कुमाऊँ की गद्दी पर बैठे। ललित शाह की मृत्यु के बाद प्रद्युम्न शाह ने कुमाऊँ को गढ़वाल में मिलाकर राजधानी श्रीनगर ले जाने का प्रयास किया, परन्तु मौका पाकर मोहन चन्द ने पुनः अल्मोड़ा पर अपना शासन स्थापित कर लिया। दक्षिण में काशीपुर के अधिकारी नन्द राम ने काशीपुर राज्य की स्थापना कर स्वयं को तराई क्षेत्रों का राजा घोषित कर दिया। इन सभी आपसी दुर्भावनाओं व राग-द्वेष के कारण चंद राजाओं की शक्ति बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन्‌ १७९० ई. में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया। प्रशासन बद्री दत्त पाण्डेय के अनुसार चन्द शासनकाल में कुमाऊँ तीन प्रशासनिक अंचलों में विभाजित था: कूर्मांचल, अल्मोड़ा और तराई-भाभर।पाण्डेय १९३७ ३ कूर्मांचल अंचल में काली-कुमाऊँ, सिरा, सोर तथा अस्कोट क्षेत्र; अल्मोड़ा अंचल में सालम, बारामण्डल, पाली तथा छखाता; और तराई भाभर में माल, भाभर तथा तराई क्षेत्र सम्मिलित थे। इनके अतिरिक्त कुमाऊँ परगनाओं में विभक्त था। प्रत्येक परगना में एक अधिकारी तैनात रहता था, जिसे लाट कहा जाता था। परगना आगे पट्टियों में, और पट्टी ग्रामों में विभाजित होती थी। परगना स्थिति पट्टियां काली कुमाऊँपाण्डेय १९३७ १४ उत्तर: सोर, गंगोली, सरयू नदीदक्षिण: लढ़िया नदीपूर्व: काली नदीपश्चिम: ध्यानीरौ रेगुडू, गुमदेश, सुई, विसंग, चार अाल, तल्ला देश, पाल बिलौन, सिप्ती, गंगोल, अस्सी, फडका और चाल्सी ध्यानीरौपाण्डेय १९३७ १५ पूर्व:काली कुमाऊँपश्चिम: चौभैंसी तल्लीरौ, मल्लीरौ चौभैंसीपाण्डेय १९३७ १६ पूर्व:ध्यानीरौ चौभैंसी सोरपाण्डेय १९३७ १६ उत्तर: सिरा, अस्कोट, कंडाली चीनादक्षिण: सरयू नदीपूर्व: काली नदीपश्चिम: रामगंगा नदी सेती, खड़ायत, सात सिलंगी, महार, सौन वल्दिया, राउल सिरापाण्डेय १९३७ १८ उत्तर: गोरी गंगा नदी दक्षिण: सोरपूर्व: कंडाली चीनापश्चिम: रामगंगा नदी अथबीसी, बरबीसी, डिंडीहाट, माली, कासन फाल्दाकोटपाण्डेय १९३७ २४ उत्तर: स्याहीदेवी दक्षिण: सल्ट पूर्व: कोशी नदी पश्चिम: ताड़ीखेत कंडारखुवा, धुराफट, चौंगाँव, मल्लीडोटी, कोश्यां धनियाकोटपाण्डेय १९३७ २५ कुटौली, छखाता, कोटा, फाल्दाकोट के मध्य धनियाकोट, ऊंचाकोट, च्युनीचौथाण छखातापाण्डेय १९३७ २६ काली कुमाऊँ, महरुड़ी, धनियाकोट, कोटा, तराई के मध्य पहाड़ छखाता, तल्ला छखाता, भाभर छखाता कुटौलीपाण्डेय १९३७ २६ छखाता के समीप कुटौली महरुड़ीपाण्डेय १९३७ २६ छखाता के समीप महरुड़ी तराई-भाभरपाण्डेय १९३७ २६ उत्तर: छखाता दक्षिण: गांगेय मैदान पूर्व: शारदा नदीपश्चिम: लालढांग तराई, भाभर संस्कृति कुमाऊँ के दो प्रमुख नगर, अल्मोड़ा तथा चम्पावत, की स्थापना का श्रेय चन्द राजवंश को ही जाता है। चन्द काल में कुमाऊँ क्षेत्र के कई प्रसिद्द मंदिरों की स्थापना हुई, जिनमें चम्पावत का बालेश्वर मन्दिर, अल्मोड़ा के रत्नेश्वर, भीमताल का भीमेश्वर महादेव, बागेश्वर का बागनाथ मंदिर इत्यादि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त कुमाऊँनी भाषा का उद्गम भी कुमाऊँ राज्य में ही हुआ। यद्यपि संस्कृत राज्य की आधिकारिक भाषा थी, परन्तु आम बोलचाल में कुमाऊँनी को ही महत्त्व दिया जाता था। इन्हें भी देखें चन्द राजवंश कुमाऊँ मण्डल सन्दर्भ टिप्पणियां 4 पुस्तक सूची harv एच. जी. वॉल्टन Almora: A Gazetteer अल्मोड़ा: एक गैजेटियर १९११ सरकारी प्रेस, संयुक्त प्रान्त इलाहाबाद en harv एडविन टी एटकिंसन Kumaun hills कुमाऊंनी पहाड़ियां १९७४ कॉस्मो प्रकाशन दिल्ली en harv बद्री दत्त पाण्डेय कुमाऊं का इतिहास १९३७ श्याम प्रकाशन अल्मोड़ा harv अरुण के. मित्तल British Administration in Kumaon Himalayas: A Historical Study, 1815-1947 कुमाऊं हिमालय में ब्रिटिश प्रशासन: एक ऐतिहासिक अध्ययन, १८१५-१९४७ १९८६ मित्तल प्रकाशन दिल्ली https://books.google.co.in/books?id=4kAOImX9PfwC en 9 मार्च 2018 https://web.archive.org/web/20180130091238/https://books.google.co.in/books?id=4kAOImX9PfwC 30 जनवरी 2018 live harv ओ.सी. हांडा History of Uttaranchal उत्तरांचल का इतिहास २००२ इंडस प्रकाशन कंपनी नई दिल्ली 81-7387-134-5 https://books.google.co.in/books?id=7_Ct9gzvkDQC en 9 मार्च 2018 https://web.archive.org/web/20180309053926/https://books.google.co.in/books?id=7_Ct9gzvkDQC 9 मार्च 2018 live harv इंद्र लाल वर्मा जनपद चम्पावत के दर्शनीय स्थल २०१४ विनसर पब्लिशिंग कं॰ देहरादून श्रेणी:उत्तराखण्ड का इतिहास श्रेणी:कुमाऊँ