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आषाढ़ का एक दिन

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आषाढ़ का एक दिन आषाढ़ का एक दिन.jpg 150px मुखपृष्ठ मोहन राकेश १९५८ भाषा: हिन्दी भारत साहित्य सहज नाटक 8170284007 2 thumb|150px|नाटककार मोहन राकेश ने आषाढ़ का एक दिन १९५८ में प्रकाशित किया आषाढ़ का एक दिन सन 1958 में प्रकाशित नाटककार मोहन राकेश द्वारा रचित एक हिंदी नाटक है।The Encyclopaedia Of Indian Literature, Volume 1 Amaresh Datta Sahitya Akademi, 2006 9788126018031 http://books.google.co.in/books?id=ObFCT5_taSgC ... Ashadh ka ek din (Hindi), a well-known Hindi play by Mohan Rakesh. was first published in 1958. The title of the play comes from the opening lines of the Sanskrit poet Kalidasa's long narrative poem ... 27 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20121103092219/http://books.google.co.in/books?id=ObFCT5_taSgC 3 नवंबर 2012 live इसे कभी-कभी हिंदी नाटक के आधुनिक युग का प्रथम नाटक कहा जाता है।The Columbia encyclopedia of modern drama, Volume 2 Gabrielle H. Cody Evert Sprinchorn Columbia University Press 2007 0231144245 1116 http://books.google.com/books?id=aQqOKWmjdQUC&pg=PA1117&dq=%22Shyamanand+Jalan%22&hl=en&ei=PtN0TfiZL8XjrAejtYDSCg&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=8&ved=0CEkQ6AEwBw#v=onepage&q=%22Shyamanand%20Jalan%22&f=false 27 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20170217103915/https://books.google.com/books?id=aQqOKWmjdQUC&pg=PA1117&dq=%22Shyamanand+Jalan%22&hl=en&ei=PtN0TfiZL8XjrAejtYDSCg&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=8&ved=0CEkQ6AEwBw#v=onepage&q=%22Shyamanand%20Jalan%22&f=false 17 फ़रवरी 2017 live 1959 में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक होने के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और कईं प्रसिद्ध निर्देशक इसे मंच पर ला चुकें हैं। १९७१ में निर्देशक मणि कौल ने इस पर आधारित एक फ़िल्म बनाई जिसने आगे जाकर साल की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीत लिया।World Film Directors: 1945-1985 John Wakeman H.W. Wilson, 1988 http://books.google.co.in/books?id=8aEYAAAAIAAJ ... His second film, Ashad ka ek din (A Monsoon Day, 1971), was based on a play by Mohan Rakesh, a well-known contemporary Hindi ... 27 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20121103092229/http://books.google.co.in/books?id=8aEYAAAAIAAJ 3 नवंबर 2012 live 0066787 आषाढ़ का एक दिन महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर केन्द्रित है, जो १०० ई॰पू॰ से ५०० ईसवी के अनुमानित काल में व्यतीत हुआ। शीर्षक की प्रेरणा इस नाटक का शीर्षक कालिदास की कृति मेघदूतम् की शुरुआती पंक्तियों से लिया गया है। क्योंकि आषाढ़ का महीना उत्तर भारत में वर्षा ऋतु का आरंभिक महीना होता है, इसलिए शीर्षक का अर्थ "वर्षा ऋतु का एक दिन" भी लिया जा सकता है। कथानक आषाढ़ का एक दिन एक त्रिखंडीय नाटक है। प्रथम खंड में युवक कालिदास अपने हिमालय में स्थित गाँव में शांतिपूर्वक जीवन गुज़़ार रहा है और अपनी कला विकसित कर रहा है। वहाँ उसका एक युवती, मल्लिका, के साथ प्रेम-सम्बन्ध भी है। नाटक का पहला रुख़ बदलता है जब दूर उज्जयिनी के कुछ दरबारी कालिदास से मिलते हैं और उसे सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में चलने को कहते हैं। कालिदास असमंजस में पड़ जाता है: एक तरफ़ उसका सुन्दर, शान्ति और प्रेम से भरा गाँव का जीवन है और दूसरी तरफ़ उज्जयिनी के राजदरबार से प्रश्रय पाकर महानता छू लेने का अवसर। मल्लिका तो यही चाहती है के जिस पुरुष को वह प्यार करती है उसे जीवन में सफलता मिले और वह कालिदास को उज्जयिनी जाने की राय देती है। भारी मन से कालिदास उज्जयिनी चला जाता है। नाटक के द्वितीय खंड में पता लगता है के कालिदास की उज्जयिनी में धाक जम चुकी है और हर ओर उसकी ख्याति फैली हुई है। उसका विवाह उज्जयिनी में ही एक आकर्षक और कुलीन स्त्री, प्रियंगुमंजरी, से हो चुका है। वहाँ गाँव में मल्लिका दुखी और अकेली रह गई है। कालिदास और प्रियंगुमंजरी, अपने एक सेवकों के दल के साथ, कालिदास के पुराने गाँव आते हैं। कालिदास तो मल्लिका से मिलने नहीं जाता, लेकिन प्रियंगुमंजरी जाती है। वह मल्लिका से सहानुभूति जताती है और कहती है कि वह उसे अपनी सखी बना लेगी और उसका विवाह किसी राजसेवक से करवा देगी। मल्लिका ऐसी सहायता से साफ़ इनकार कर देती है। नाटक के तृतीय और अंतिम खंड में कालिदास गाँव में अकेले ही आ धमकता है। मल्लिका तक ख़बर पहुँचती है के कालिदास को कश्मीर का राज्यपाल बना दिया गया था लेकिन वह सब कुछ त्याग के आ गया है। निस्सहाय मल्लिका को वेश्या बनने पर मजबूर होना पड़ता है | और उसकी एक छोटी से बेटी है कालिदास मल्लिका से मिलने आता है लेकिन, मल्लिका के जीवन की इन सच्चाइयों को देख, पूरी तरह निराश होकर चला जाता है। नाटक इसी जगह समाप्ति पर पहुँचता है।The challenges of tribal development Kishore C. Padhy, N. Patnaik Sarup & Sons, 2000 9788176251082 http://books.google.co.in/books?id=ENvXnBOdQvcC ... goes to Ujjain and is elevated to the status of governor of Kashmir ... elaborate efforts of Priyangumanjari to reproduce for him the native environment ... she is no substitute for Mallika ... he can tell Mallika that the man she had before her was not the Kalidasa she had known ... 27 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20121103092309/http://books.google.co.in/books?id=ENvXnBOdQvcC 3 नवंबर 2012 live नाटक के एक समीक्षक (क्रिटिक) ने कहा है के नाटक के हर खंड का अंत में "कालिदास मल्लिका को अकेला छोड़ जाता है: पहले जब वह अकेला उज्जयिनी चला जाता है; दूसरा जब वह गाँव आकर भी मल्लिका से जानबूझ कर नहीं मिलता; और तीसरा जब वह मल्लिका के घर से अचानक मुड़़ के निकल जाता है।"Theatres of independence: drama, theory, and urban performance in India since 1947 Aparna Bhargava Dharwadker University of Iowa Press, 2005 9780877459613 http://books.google.co.in/books?id=mLQaz-12Eo8C ... each of the three acts in the play ends with an act of abandonment on the part of Kalidasa: when he leaves for Ujjayini alone; when he deliberately avoids meeting with Mallika during his subsequent visit to the village; when he leaves her home abruptly at the end ... 27 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20121103092411/http://books.google.co.in/books?id=mLQaz-12Eo8C 3 नवंबर 2012 live यह नाटक दर्शाता है कि कालिदास के महानता पाने के प्रयास की मल्लिका और कालिदास को कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। जब कालिदास मल्लिका को छोड़कर उज्जयिनी में बस जाता है तो उसकी ख्याति और उसका रुतबा तो बढ़ता है लेकिन उसकी सृजनशक्ति चली जाती है। उसकी पत्नी, प्रियंगुमंजरी, इस प्रयास में जुटी रहती है के उज्जयिनी में भी कालिदास के इर्द-गिर्द उसके गाँव जैसा वातावरण बना रहे "लेकिन वह स्वयं मल्लिका कभी नहीं बन पाती।" नाटक के अंत में जब कालिदास की मल्लिका से अंतिम बार बात होती है तो वह क़ुबूल करता है के "तुम्हारे सामने जो आदमी खड़ा है यह वह कालिदास नहीं जिसे तुम जानती थी।" नाटककार की टिप्पणी अपने दूसरे नाटक ("लहरों के राजहंस") की भूमिका में मोहन राकेश ने लिखा कि "मेघदूत पढ़ते हुए मुझे लगा करता था कि वह कहानी निर्वासित यक्ष की उतनी नहीं है, जितनी स्वयं अपनी आत्मा से निर्वासित उस कवि की जिसने अपनी ही एक अपराध-अनुभूति को इस परिकल्पना में ढाल दिया है।" मोहन राकेश ने कालिदास की इसी निहित अपराध-अनुभूति को "आषाढ़ का एक दिन" का आधार बनाया।Lehron ke rajhans (King-swans of the waves) Mohan Rakesh Rajkamal Prakashan Pvt Ltd, 2009 9788126708512 http://books.google.co.in/books?id=0Fysjw9mCmQC ... मेघदूत पढ़ते हुए मुझे लगा करता था कि वह कहानी निर्वासित यक्ष की उतनी नहीं है, जितनी स्वयं अपनी आत्मा से निर्वासित उस कवि की जिसने अपनी ही एक अपराध-अनुभूति को इस परिकल्पना में ढाल दिया है (when I read Meghdoot, I would feel that the story was less about a dispossesed yaksh than about a poet so alienated from his own soul that he has poured his guilt-realization into this opus) ... 27 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20121103092422/http://books.google.co.in/books?id=0Fysjw9mCmQC 3 नवंबर 2012 live इन्हें भी देखें कालिदास मोहन राकेश मेघदूतम् सन्दर्भ श्रेणी:पुस्तकें श्रेणी:हिंदी नाटक श्रेणी:मोहन राकेश