411 REFERENCE · Wikipedia
आसन
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
thumb|upright=1.25|विभिन्न सन्दर्भों में योग : (बाएँ से दाएँ , ऊपर से नीचे) एक् पाद चक्रासन; अर्ध मत्स्येन्द्रासन; पद्मासन; नवासन; पिन्छ मयूरासन; धनुरासन; नटराजासन; वृक्षासन
आसन शब्द की निष्पत्ति आस् (धातु) +ल्युट (प्रत्यय) से हुई है, जिसके विभिन्न अर्थ हैं जैसे - 1. बैठना, 2. बैठने का आधार, 3. बैठने की विशेष प्रक्रिया, 4. बैठ जाना इत्यादि।
योग के आठ अंगों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) में आसन तृतीय स्थान पर है, जबकि गोरक्षनाथ आदि द्वारा प्रवर्तित षडंग-योग (छः अंगों वाला योग) में आसन का स्थान प्रथम है। चित्त की स्थिरता, शरीर एवं उसके अंगों की दृढ़ता और कायिक सुख के लिए इस क्रिया का विधान मिलता है। विभिन्न ग्रन्थों में आसन के लक्षण ये दिए गए हैं- उच्च स्वास्थ्य की प्राप्ति, शरीर के अंगों की दृढ़ता, प्राणायामादि उत्तरवर्ती साधनक्रमों में सहायता, चित्तस्थिरता, शारीरिक एवं मानसिक सुख दायी आदि। पतञ्जलि ने मन की स्थिरता और सुख को लक्षणों के रूप में माना है। प्रयत्न-शैथिल्य और परमात्मा में मन लगाने से इसकी सिद्धि बतलाई गई है। इसके सिद्ध होने पर द्वंद्वों का प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता। किन्तु पतंजलि ने आसन के भेदों का उल्लेख नहीं किया। उनके ग्रन्थ योगसूत्र के भाष्यकारों ने आसन के भेदों का उल्लेख (जैसे- पद्मासन, भद्रासन आदि) किया है। इन आसनों का वर्णन लगभग सभी भारतीय साधनात्मक साहित्य में मिलता है।
पतञ्जलि के योगसूत्र के अनुसार,
" स्थिरसुखमासनम् "
(अर्थ :- सुखपूर्वक स्थिरता से बैठने का नाम आसन है। या, जो स्थिर भी हो और सुखदायक अर्थात् आरामदायक भी हो, वह आसन है। )
इस प्रकार हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि आसन वह जो आसानी से किए जा सकें तथा हमारे जीवन शैली में विशेष लाभदायक प्रभाव डाले।
योग का इतिहास
right|thumb|300px|महाबलिपुरम स्थित गंगावतरण नामक शिलालेख जिसमें ऊपर बायीं ओर वृक्षासन की मुद्रा में एक चित्र है। यह शिलालेख ७वीं शताब्दी का है।
योग का इतिहास
योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है। विश्व की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद में कई स्थानों पर यौगिक क्रियाओं के विषय में उल्लेख मिलता है।
माना जाता है कि योग का जन्म भारत में ही हुआ किन्तु दुखद यह रहा की आधुनिक कहे वाले समय में अपनी दौड़ती-भागती जिंदगी से लोगों ने योग को अपनी दिनचर्या से अलग कर लिया है, जिसका प्रभाव लोगों के स्वाथ्य पर हुआ। मगर आज भारत में ही नहीं विश्व भर में योग का बोलबाला है और निसंदेह उसका श्रेय भारत के ही योग गुरूओं को जाता है जिन्होंने योग को पुनः पुनर्जीवित किया। स्वामी विवेकानंद ऐसे पहले आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं, जो योग को पश्चिम में लेकर गए थे। अमेरिका में सन् 1896 ई० में पतंजलि के अष्टांग योग पर दिए गए उनके व्याख्यानों का संकलन राजयोग नामक पुस्तक के नाम से प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक को योग के मुख्य आधुनिक ग्रंथों में से एक माना जाता है। श्री तिरुमलाई कृष्णामचार्य, बीकेएस अयंगर, परमहंस योगानन्द, और रामदेव कुछ ऐसे ही नाम हैं जिन्होंने योग को फिर से ऊचाइयों पर पहुँचाया है। http://www.nayaindia.com/sundayspecial/yoga-se-daulat-hi-sohrat-bhi-45699.htmlजून 2020 InternetArchiveBot http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/06/110603_ramdev_profile_da.shtml संग्रहीत प्रति 20 जून 2019 https://web.archive.org/web/20110902013405/http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/06/110603_ramdev_profile_da.shtml 2 सितंबर 2011 live http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=90798 संग्रहीत प्रति 20 जून 2019 https://web.archive.org/web/20190410154435/https://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=90798 10 अप्रैल 2019 dead http://livehindustan.com/news/1/1/article1-story-1-1-53020.html संग्रहीत प्रति 20 जून 2019 https://web.archive.org/web/20181228174655/https://www.livehindustan.com/news/1/1/article1-story-1-1-53020.html 28 दिसंबर 2018 dead
आसनों की संख्या
+ आसनों की संख्या का उल्लेख आसनों की संख्या ग्रन्थ ग्रन्थकर्ता रचनाकाल सन्दर्भ 2 गोरक्ष शतक गुरु गोरख नाथ १०-११वीं शताब्दी इसमें सिद्धासन, पद्मासन का वर्णन है;Singh, T. D. Science and Religion: Global Perspectives, 4 – 8 June 2005, Philadelphia Hinduism and Science Metanexus Institute 2005 http://www.metanexus.net/archive/conference2005/pdf/td_singh.pdf 20 जून 2019 https://web.archive.org/web/20181125162808/http://www.metanexus.net/archive/conference2005/pdf/td_singh.pdf 25 नवंबर 2018 dead Swami Kuvalayananda Shukla S. A. Goraksha Satakam December 2006 Kaivalyadhama S. M. Y. M. Samiti Lonavla, India 81-89485-44-X 37–38 https://archive.org/details/GorakshaSatakamSwamiKuvalayanandaShuklaS.A.KaivalyaDham/page/n25 84 claimedsymbolism 4 शिव संहिता - १५वीं शताब्दी 4 बैठकर किए जाने वाले आसन वर्णित हैं ; आसनों की कुल संख्या 84 बतायी गयी है।; 11 मुद्राएँSingleton 2010 29 15 हठ योग प्रदीपिका स्वामी स्वात्माराम १५वीं शताब्दी 15 आसनों का वर्णन है,Singleton 2010 29 4 (सिद्धासन, पद्मासन, भद्रासन और सिंहासन) को महत्वपूर्ण कहा गया है। 32 घेरण्ड संहिता घेरण्ड 1१७वीं शताब्दी 32 आसनों का वर्णन है जिसमें बैठकर करने वाले आसन, पीछे झुक कर करने वाले, ऐठने (twist) वले, संतुलन बनाने वाले और उल्टा होने वाले आसन हैं। 25 मुद्राओं का वर्णनSingleton 2010 29 52 हठ रत्नावली श्रीनिवास १७वीं शताब्दी 84 आसनों का नाम दिया गया है जिसमें से 52 आसनों का वर्णन किया गया है।84 names of asanas are listed; not all can now be identified. 84 जोग प्रदीपिका रामानन्दी जयतराम 1830 84 आसन और 24 मुद्राएँ इस 18वीं शताब्दी में रचित ग्रन्थ में चित्र सहित वर्णित हैं।Singleton 2010 170 37 योग सोपान योगी घामंडे 1905 37 आसन, 6 मुद्राएँ, 5 बन्ध चित्र सहित वर्णित हैं। Singleton 2010 170 c. 200 योग दीपिका बी के एस अयंगार 1966 प्रत्येक आसन का वर्णन और फोटोग्राफIyengar B. K. S. B. K. S. Iyengar Light on Yoga Thorsons London 1991 1966 978-0-00-714516-4 51315708 908 मास्टर योग चार्ट धर्म मित्र 1984 प्रत्येक आसन का फोटोग्राफDharma Mittra Mittra, Dharma 1984 Master Chart of Yoga Poses
योगासनों के गुण और लाभ
(1) योगासनों का सबसे बड़ा गुण यह हैं कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं। योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है।
(2) योगासन अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबल-निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते हैं।
(3) आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियायें करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियायें भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्त्व है।
(4) योगासनों से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती है।
(5) योगासनों द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं। पाचन-संस्थान में गड़बड़ियां उत्पन्न नहीं होतीं।
(6) योगासन मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं।
(7) योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं। इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तंदरुस्त होता है।
(8) योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं। वे उनमें सुन्दरता, सम्यक-विकास, सुघड़ता और गति, सौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं।
(9) योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है। ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियां जागृत होती हैं और आत्मा-सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं।
(10) योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार-विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैं, अत: मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य, मिलता है।
(11) योगासन श्वास- क्रिया का नियमन करते हैं, हृदय और फेफड़ों को बल देते हैं, रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं।
(12) योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं।
(13) आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं, रोगों से रक्षा करते हैं, शरीर को नीरोग, स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाए रखते हैं।
(14) आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
(15) योगासन से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है। आसन शरीर के पांच मुख्यांगों, स्नायु तंत्र, रक्ताभिगमन तंत्र, श्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णत: स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक सभी क्षेत्रों के विकास में आसनों का अधिकार है। अन्य व्यायाम पद्धतियां केवल वाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं, जब कि योगसन मानव का चहुँमुखी विकास करते हैं।
आसन आरम्भ करने से पूर्व
आसनों को सीखना प्रारम्भ करने से पूर्व कुछ आवश्यक सावधानियों पर ध्यान देना आवश्यक है। आसन प्रभावकारी तथा लाभदायक तभी हो सकते हैं, जबकि उसको उचित रीति से किया जाए।
1. योगासन शौच क्रिया एवं स्नान से निवृत्त होने के बाद ही किया जाना चाहिए तथा एक घंटे पश्चात स्नान करें।
2. योगासन समतल भूमि पर आसन बिछाकर करना चाहिए एवं मौसमानुसार ढीले वस्त्र पहनना चाहिए।
3. योगासन खुले एवं हवादार कमरे में करना चाहिए, ताकि श्वास के साथ आप स्वतंत्र रूप से शुद्ध वायु ले सकें। अभ्यास आप बाहर भी कर सकते हैं, परन्तु आस-पास वातावरण शुद्ध तथा मौसम सुहावना हो।
4. आसन करते समय अनावश्यक जोर न लगाएँ। यद्धपि प्रारम्भ में आप आपकी माँसपेशियों को कड़ी पाएँगे, लेकिन कुछ ही सप्ताह के नियमित अभ्यास से शरीर लचीला हो जाता है। आसनों को आसानी से करें, कठिनाई से नहीं। उनके साथ ज्यादती न करें।
5. मासिक धर्म, गर्भावस्था, बुखार, गंभीर रोग आदि के दौरान आसन न करें।
6. योगाभ्यासी को सम्यक आहार अर्थात् भोजन प्राकृतिक और उतना ही लेना चाहिए जितना कि पचने में आसानी हो। वज्रासन को छोड़कर सभी आसन खाली पेट करें।
7. आसन के प्रारंभ और अंत में विश्राम करें। आसन विधिपूर्वक ही करें। प्रत्येक आसन दोनों ओर से करें एवं उसका पूरक अभ्यास करें।
8. यदि आसन को करने के दौरान किसी अंग में अत्यधिक पीड़ा होती है तो किसी योग चिकित्सक से सलाह लेकर ही आसन करें।
9. यदि वातों में वायु, अत्यधिक उष्णता या रक्त अत्यधिक अशुद्ध हो तो सिर के बल किए जाने वाले आसन न किए जाएँ। विषैले तत्त्व मस्तिष्क में पहुँचकर उसे क्षति न पहुँचा सकें, इसके लिए सावधानी बहुत महत्वपूर्ण है।
10. योग प्रारम्भ करने के पूर्व अंग-संचालन करना आवश्यक है। इससे अंगों की जकड़न समाप्त होती है तथा आसनों के लिए शरीर तैयार होता है। अंग-संचालन कैसे किया जाए इसके लिए 'अंग संचालन' देखें।
अंतत: आसनों को किसी योग्य योग चिकित्सक की देख-रेख में करें तो ज्यादा अच्छा होगा।
आसन
यद्यपि योग की उत्पत्ति हमारे देश में हुई है, किन्तु आधुनिक समय में इसका प्रचार-प्रसार विदेशियों ने किया है, इसलिए पाश्चात्य सभ्यता की नकल करने वाले 'योग' शब्द को 'योगा' बोलने में गौरवान्वित महसूस करते हैं।
प्राचीन समय में इस विद्या के प्रति भारतीयों ने सौतेला व्यवहार किया है। योगियों का महत्त्व कम नहीं हो जाए। अत: यह विद्या हर किसी को दी जाना वर्जित थी। योग ऐसी विद्या है जिसे रोगी-निरोगी, बच्चे-बूढ़े सभी कर सकते हैं।
महिलाओं के लिए योग बहुत ही लाभप्रद है। चेहरे पर लावण्य बनाए रखने के लिए बहुत से आसन और कर्म हैं। कुंजल, सूत्रनेति, जलनेति, दुग्धनेति, वस्त्र धौति कर्म बहुत लाभप्रद हैं। कपोल शक्ति विकासक, सर्वांग पुष्टि, सर्वांग आसन, शीर्षासन आदि चेहरे पर चमक और कांति प्रदान करते हैं।
इसी तरह से नेत्रों को सुंदर और स्वस्थ रखने, लंबाई बढ़ाने, बाल घने करने, पेट कम करने, हाथ-पैर सुंदर-सुडौल बनाने, बुद्धि तीव्र करने, कमर और जंघाएँ सुंदर बनाने, गुस्सा कम करने, कपोलों को खूबसूरत बनाने, आत्मबल बढ़ाने, गुप्त बीमारियाँ दूर करने, गर्दन लंबी और सुराहीदार बनाने, हाथ-पैरों की थकान दूर करने, पाचन शक्ति सुधारने, अच्छी नींद, त्वचा संबंधी रोगों को दूर करने व अन्य कई प्रकार के कष्टों का निवारण करने के लिए योग में व्यायाम, आसन और कर्म शामिल हैं।
प्राचीन समय में इस विद्या के प्रति भारतीयों ने सौतेला व्यवहार किया है। योगियों का महत्त्व कम नहीं हो जाए। अत: यह विद्या हर किसी को दी जाना वर्जित थी। योग ऐसी विद्या है जिसे रोगी-निरोगी, बच्चे-बूढ़े सभी कर सकते हैं।
किंतु योगाभ्यास करने से पूर्व कुशल योग निर्देशक से अवश्य सलाह लेना चाहिए। निम्नांकित आसन क्रियाएँ प्रस्तुत की जा रही हैं जिन्हें आप सहजता से कर सारे दिन की स्फूर्ति अर्जित कर सकती हैं।
श्वास क्रिया
सीधे खड़े होकर दोनों हाथों की उँगलियाँ आपस में फँसाकर ठोढ़ी के नीचे रख लीजिए। दोनों कुहनियाँ यथासंभव परस्पर स्पर्श कर रही हों। अब मुँह बंद करके मन ही मन पाँच तक की गिनती गिनने तक नाक से धीरे-धीरे साँस लीजिए।
इस बीच कंठ के नीचे हवा का प्रवाह अनुभव करते हुए कुहनियों को भी ऊपर उठाइए। ठोढ़ी से हाथों पर दबाव बनाए रखते हुए साँस खींचते जाएँ और कुहनियों को जितना ऊपर उठा सकें उठा लें। इसी बिंदु पर अपना सिर पीछे झुका दीजिए। धीरे से मुँह खोलें। आपकी कुहनियाँ भी अब एकदम पास आ जाना चाहिए। अब यहाँ पर छ: तक की गिनती गिनकर साँस बाहर निकालिए।
अब सिर आगे ले आइए। यह अभ्यास दस बार करें, थोड़ी देर विश्राम के बाद यह प्रक्रिया पुन: दोहराएँ। इससे फेफड़े की कार्यक्षमता बढ़ती है। तनाव से मुक्ति मिलती है और आप सक्रियता से कार्य में संलग्न हो सकती हैं।
सूर्य नमस्कार
सूर्य नमस्कार
सूर्य नमस्कार योगासनों में सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया है। यह अकेला अभ्यास ही साधक को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ पहुंचाने में समर्थ है।
मानव शरीर की सरंचना ब्रमह्माण्ड की पंच तत्वों से हुआ है। और इसे (शरीर रूपी यंत्र) सुचारू रूप से गतिमान स्नायु तंत्र करता है। जिस व्यक्ति के शरीर में स्नायुविक तंत्र जरा सा भी असंतुलित होता है वो गंभीर बीमारी की ओर अग्रसर हो जाता है।
"सूर्य नमस्कार" स्नायु ग्रंथि को उनके प्राकृतिक रूप में रख संतुलित रखता है।
इसके अभ्यास से साधक का शरीर नीरोग और स्वस्थ होकर तेजस्वी हो जाता है। 'सूर्य नमस्कार' स्त्री, पुरुष, बाल, युवा तथा वृद्धों के
लिए भी उपयोगी बताया गया है।
पादहस्त आसन
सीधे खड़ा होकर अपने नितंब और पेट को कड़ा कीजिए और पसलियों को ऊपर खीचें। अपनी भुजाओं को धीरे से सिर के ऊपर तक ले जाइए। अब हाथ के दोनों अँगूठों को आपस में बाँध लीजिए। साँस लीजिए और शरीर के ऊपरी हिस्से को दाहिनी ओर झुकाइए। सामान्य ढंग से साँस लेते हुए दस तक गिनती गिनें फिर सीधे हो जाएँ और बाएँ मुड़कर यही क्रिया दस गिनने तक दोहराएँ।
पुन: सीधे खड़े होकर जोर से साँस खींचें। इसके पश्चात कूल्हे के ऊपर से अपने शरीर को सीधे सामने की ओर ले जाइए। फर्श और छाती समानांतर हों। ऐसा करते समय सामान्य तरीके से साँस लेते रहें। अपने धड़ को सीधी रेखा में रखते हुए नीचे ले आइए।
बिना घुटने मोड़े फर्श को छूने की कोशिश करें। यथासंभव सिर को पाँवों से छूने का प्रयास करें। दस तक गिनती होने तक इसी मुद्रा में रहें। अपनी पकड़ ढीली कर सामान्य अवस्था में आ जाएँ। इस आसन से पीठ, पेट और कंधे की पेशियाँ मजबूत होती हैं और रक्त संचार ठीक रहता है।
शवासन
इस आसन में आपको कुछ नहीं करना है। आप एकदम सहज और शांत हो जाएँ तो मन और शरीर को आराम मिलेगा। दबाव और थकान खत्म हो जाएगी। साँस और नाड़ी की गति सामान्य हो जाएगी। इसे करने के लिए पीठ के बल लेट जाइए। पैरों को ढीला छोड़कर भुजाओं को शरीर से सटाकर बगल में रख लें। शरीर को फर्श पर पूर्णतया स्थिर हो जाने दें।
कपाल भाति क्रिया
अपनी एड़ी पर बैठकर पेट को ढीला छोड़ दें। तेजी से साँस बाहर निकालें और पेट को भीतर की ओर खींचें। साँस को बाहर निकालने और पेट को धौंकनी की तरह पिचकाने के बीच सामंजस्य रखें। प्रारंभ में दस बार यह क्रिया करें, धीरे-धीरे 60 तक बढ़ा दें। बीच-बीच में विश्राम ले सकते हैं। इस क्रिया से फेफड़े के निचले हिस्से की प्रयुक्त हवा एवं कार्बन डाइ ऑक्साइड बाहर निकल जाती है और सायनस साफ हो जाती है साथ ही पेट पर जमी फालतू चर्बी खत्म हो जाती है। इस प्राणायाम को करने के बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम भी करे।
पद्मासन
पद्मासन
शांति या सुख का अनुभव करना या बोध करना अलौकिक ज्ञान प्राप्त करने जैसा है, यह तभी संभव है, जब आप पूर्णतः स्वस्थ हों। अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करने के यूँ तो कई तरीके हैं, उनमें से ही एक आसान तरीका है योगासन व प्राणायाम करना।
पद्मासन
विधि: जमीन पर बैठकर बाएँ पैर की एड़ी को दाईं जंघा पर इस प्रकार रखते हैं कि एड़ी नाभि के पास आ जाएँ। इसके बाद दाएँ पाँव को उठाकर बाईं जंघा पर इस प्रकार रखें कि दोनों एड़ियाँ नाभि के पास आपस में मिल जाएँ।
मेरुदण्ड सहित कमर से ऊपरी भाग को पूर्णतया सीधा रखें। ध्यान रहे कि दोनों घुटने जमीन से उठने न पाएँ। तत्पश्चात दोनों हाथों की हथेलियों को गोद में रखते हुए स्थिर रहें। इसको पुनः पाँव बदलकर भी करना चाहिए। फिर दृष्टि को नासाग्रभाग पर स्थिर करके शांत बैठ जाएँ।
विशेष : स्मरण रहे कि ध्यान, समाधि आदि में बैठने वाले आसनों में मेरुदण्ड, कटिभाग और सिर को सीधा रखा जाता है और स्थिरतापूर्वक बैठना होता है। ध्यान समाधि के काल में नेत्र बंद कर लेना चाहिए। आँखे दीर्घ काल तक खुली रहने से आँखों की तरलता नष्ट होकर उनमें विकार पैदा हो जाने की संभावना रहती है।
लाभ : यह आसन पाँवों की वातादि अनेक व्याधियों को दूर करता है। विशेष कर कटिभाग तथा टाँगों की संधि एवं तत्संबंधित नस-नाड़ियों को लचक, दृढ़ और स्फूर्तियुक्त बनाता है। श्वसन क्रिया को सम रखता है। इन्द्रिय और मन को शांत एवं एकाग्र करता है।
इससे बुद्धि बढ़ती एवं सात्विक होती है। चित्त में स्थिरता आती है। स्मरण शक्ति एवं विचार शक्ति बढ़ती है। वीर्य वृद्धि होती है। सन्धिवात ठीक होता है।
योगमुद्रा
योग शास्त्र में मुद्राओं का एक अलग विभाग है। इन मुद्राओं का निर्माण आसन, प्राणायाम एवं बंधों को समन्वित कर किया गया है।
मुद्राओं के माध्यम से हम शरीर की उन क्रियाओं को नियमित करने का प्रयास करते हैं, जो हमारे वश में नहीं हैं।
योगमुद्रा को कुछ योगाचार्यों ने 'मुद्रा' के और कुछ ने 'आसनों' के समूह में रखा है, लेकिन इसे आसन ही माना गया है। यह आसन करने में अत्यंत सरल है।
सर्वप्रथम पद्मासन में बैठते हैं, इसके बाद दोनों हाथ पीछे लेकर दाहिने हाथ से बाएं हाथ की कलाई पकड़ते हैं। अब लंबी और गहरी श्वास अंदर लेते हैं तथा शरीर को शिथिल करते हुए धड़ को धीरे-धीरे बाईं जंघा पर रखते हैं। ऐसा करते समय श्वास छोड़ते हैं।
कुछ समय तक इसी अवस्था में रहने के बाद पुनः पहले वाली स्थिति में आ जाते हैं। अब यही क्रिया सामने की ओर झुककर करते हैं। ऐसा करते समय मस्तक और नाक दोनों जमीन से स्पर्श करते हैं। कुछ समय तक इसी अवस्था में रहने के बाद मूल स्थिति में आते हैं। फिर धड़ को दाहिनी जंघा पर रखते हैं।
यह आसन करने में आसान परंतु बड़ा लाभदायक है। इससे पेट का व्यायाम होता है तथा अपचन एवं पेट की अन्य शिकायतें दूर होती हैं। रीढ़ की हड्डी का भी अच्छा व्यायाम होता है और वह अपना काम सुचारु रूप से करती है। इस आसन के दौरान गर्दन एवं टांगों की मांसपेशियों का भी व्यायाम होता है।
कभी-कभी धड़ को सामने या दाहिनी ओर झुकाते समय पीठ, घुटनों या जांघों पर अधिक जोर पड़ता है। ऐसे समय जोर-जबर्दस्ती न करें।
माइग्रेन और योग योग और मोटापा योग से चिर यौवन योग निद्रा
कम्प्यूटर और योग
उन लोगों के लिए जो कंप्यूटर पर लगातार आठ से दस घंटे काम करके कई तरह के रोगों का शिकार हो जाते हैं या फिर तनाव व थकान से ग्रस्त रहते हैं। निश्चित ही कंप्यूटर पर लगातार आँखे गड़ाए रखने के अपने नुकसान तो हैं ही इसके अलावा भी ऐसी कई छोटी-छोटी समस्याएँ भी पैदा होती है, जिससे हम जाने-अनजाने लड़ते रहते हैं। तो आओं जाने की इन सबसे कैसे निजात पाएँ।
नुकसान
स्मृति दोष, दूर दृष्टि कमजोर पड़ना, चिड़चिड़ापन, पीठ दर्द, अनावश्यक थकान आदि। कंप्यूटर पर लगातार काम करते रहने से हमारा मस्तिष्क और हमारी आँखें इस कदर थक जाती है कि केवल निद्रा से उसे राहत नहीं मिल सकती। देखने में आया है कि कंप्यूटर पर रोज आठ से दस घंटे काम करने वाले अधिकतर लोगों को दृष्टि दोष हो चला है। वे किसी न किसी नंबर का चश्मा पहने लगे हैं। इसके अलावा उनमें स्मृति दोष भी पाया गया। काम के बोझ और दबाव की वजह से उनमें चिड़चिड़ापन भी आम बात हो चली है। यह बात अलग है कि वह ऑफिस का गुस्सा घर पर निकाले। कंप्यूटर की वजह से जो भारी शारीरिक और मानसिक हानि पहुँचती है, उसकी चर्चा विशेषज्ञ अकसर करते रहे हैं।
बचाव
पहली बात कि आपका कंप्यूटर आपकी आँखों के ठीक सामने रखा हो। ऐसा न हो की आपको अपनी आँखों की पुतलियों को ऊपर उठाये रखना पड़े, तो जरा सिस्टम जमा लें जो आँखों से कम से कम तीन फिट दूर हो। दूसरी बात कंप्यूटर पर काम करते वक्त अपनी सुविधानुसार हर 5 से 10 मिनट बाद 20 फुट दूर देखें। इससे दूर दृष्टि बनी रहेगी। स्मृति दोष से बचने के लिए अपने दिनभर के काम को रात में उल्टेक्रम में याद करें। जो भी खान-पान है उस पर पुन: विचार करें। थकान मिटाने के लिए ध्यान और योग निद्रा का लाभ लें।
योग एक्सरसाइज
इसे अंग संचालन भी कहते हैं। प्रत्येक अंग संचालन के अलग-अलग नाम हैं, लेकिन हम विस्तार में न जाते हुए बताते हैं कि आँखों की पुतलियों को दाएँ-बाएँ और ऊपर-नीचे नीचे घुमाते हुए फिर गोल-गोल घुमाएँ। इससे आँखों की माँसपेशियाँ मजबूत होंगी। पीठ दर्द से निजात के लिए दाएँ-बाएँ बाजू को कोहनी से मोड़िए और दोनों हाथों की अँगुलियों को कंधे पर रखें। फिर दोनों हाथों की कोहनियों को मिलाते हुए और साँस भरते हुए कोहनियों को सामने से ऊपर की ओर ले जाते हुए घुमाते हुए नीचे की ओर साँस छोड़ते हुए ले जाएँ। ऐसा 5 से 6 बार करें फिर कोहनियों को विपरीत दिशा में घुमाइए। गर्दन को दाएँ-बाएँ, फिर ऊपर-नीचे नीचे करने के बाद गोल-गोल पहले दाएँ से बाएँ फिर बाएँ से दाएँ घुमाएँ। बस इतना ही। इसमें साँस को लेने और छोड़ने का ध्यान जरूर रखें।
प्राणायाम
प्राणायाम
योग साधना के आठ अंग हैं, जिनमें प्राणायाम चौथा सोपान है। अब तक हमने यम, नियम तथा योगासन के विषय में चर्चा की है, जो हमारे शरीर को ठीक रखने के लिए बहुत आवश्यक है।
प्राणायाम के बाद प्रत्याहार, ध्यान, धारणा तथा समाधि मानसिक साधन हैं। प्राणायाम दोनों प्रकार की साधनाओं के बीच का साधन है, अर्थात् यह शारीरिक भी है और मानसिक भी। प्राणायाम से शरीर और मन दोनों स्वस्थ एवं पवित्र हो जाते हैं तथा मन का निग्रह होता है।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
योगासनों की सूची
अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस
बाहरी कड़ियाँ
Asana योगासन
योग भगाये रोग (गूगल पुस्तक ; लेखक - स्वामी अक्षय आत्मानन्द)
योगासन योगासन विडियो
श्रेणी:योग