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श्रीभाष्य
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श्रीभाष्य रामानुजाचार्य द्वारा रचित सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ तथा आचार्य वादरायण के वेदान्तसूत्र का भाष्य है। यह ग्रन्थ रामानुजाचार्य के लगभग १०० वर्ष की आयु प्राप्ति के बाद पूर्ण हुआ था। इस ग्रन्थ में रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत के दार्शनिक सिद्धान्तों का विवेचन किया है। यह एक प्रकार से आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त दर्शन (और विशेष रूप से माया के सिद्धान्त) का खण्डन भी है।
श्रीभाष्य में रामनुजाचार्य ने तीन प्रकार के 'तत्त्वों' का वर्णन किया है- ब्रह्म, जीवात्मा और जगत् मध्वाचार्य सहित बाद के वैष्णव आचार्यों ने इसी सिद्धान्त का अनुसरण किया है। इस ग्रन्थ में भक्ति को 'मोक्ष' का साधन बताया गया है। आचार्य रामानुज ने श्रीभाष्य को और अच्छी तरह समझने के लिए 'वेदान्तदीप' तथ 'वेदान्तसार' नामक ग्रन्थों को रचा।
अपने इस भाष्य के आरम्भ में आचार्य रामानुज ने बोधायन द्वारा किए गए ब्रह्मसूत्र के भाष्य को उद्धृत किया है और कहा है कि इस ग्रन्थ में जो भी विचार रामानुज ने दिए हैं वे सब पहले के आचार्यों जैसे बोधायन के विचारों के अनुकूल हैं।
अंगूठाकार
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
वेदान्तसूत्र
रामानुजाचार्य
विशिष्टाद्वैत
बाहरी कड़ियाँ
श्रीभाष्यम् भाग-१ और भाग-२ https://web.archive.org/web/20201113184716/https://www.onlinesanskritbooks.com/2019/02/shree-bhashyam-with-hindi-translation.html 13 नवंबर 2020 डाउनलोड करें।
श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ