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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

राम चौधरी

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डॉ॰ रामदास चौधरी (८ अगस्त १९२७ – २० जून २०१५) भौतिकी के प्राध्यापक एवं हिन्दी सेवी थे। उन्होने अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति और बाद में विश्व हिंदी न्यास गठित कर संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को पहुंचाने की कोशिशें कीं। वे अमेरिका में 'हिन्दी की छत्रछाया' समझे जाते थे। http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1-story-485157.html हिंदी को दुनिया भर में ऐसे सपूत चाहिए हिंदी को दुनिया भर में ऐसे सपूत चाहिए 2 जुलाई 2015 https://web.archive.org/web/20150702202744/http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1-story-485157.html 2 जुलाई 2015 dead वह अक्सर कहा करते थे कि हमें सदियों पहले मॉरिशस, फिजी, ट्रिनिडाड पहुंचे गिरमिटिया मजदूरों से सबक लेना चाहिए, जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी भाषा व संस्कृति को बचाकर रखा। जीवन परिचय राम चौधरी उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के भूलपुर गांव में पैदा हुए थे। वे अपने गांव के पहले व्यक्ति थे जो हाईस्कूल पहुंचे। आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक होकर उन्होने मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय, भोपाल में ६ वर्ष तक भौतिकी का शिक्षण किया। उनकी प्रतिभा उन्हें अमेरिका ले गई। कनाडा से उन्होंने पीएचडी और आगे की पढ़ाई की। १९६४ में उन्होने कनाडा के ब्रिटिश कोलम्बिया विश्वविद्यालय (वैंकूवर) से पी-एचडी की।Ram Das Chaudhari Obituary http://www.tributes.com/obituary/show/Ram-Das-Chaudhari-102598009 ३ जुलाई २०१५ अंग्रेज़ी https://web.archive.org/web/20150714015524/http://www.tributes.com/obituary/show/Ram-Das-Chaudhari-102598009 14 जुलाई 2015 live उन्होने कनाडा के ही रॉयल मिलिटरी कॉलेज, किंग्स्टन (Kingston) से १९६६ में पोस्ट डॉक्टरेट किया। वह न्यूयॉर्क के ओसवेगो (Oswego) विश्वविद्यालय में भौतिक शास्त्र के प्रोफेसर बनाए गए। वहां वह मृत्युपर्यंत (88 साल की उम्र तक) एमिरेटस प्रोफेसर रहे। चौधरी जी ओसवेगो में ही रहते थे। उनकी सहधर्मिणी राज अभी जीवित हैं। हिन्दी-सेवा प्रोफेसर चौधरी अमेरिका में थे, पर वह अपने गांव को कभी नहीं भूले। उन्होंने अपने गांव में गरीब लड़कियों के लिए एक इंटर कॉलेज बनवाया, जिसके लिए अपनी जेब से एक लाख डॉलर दिया, अपनी पैतृक संपत्ति दी और अमेरिका से काफी चंदा भी जुटाया। हिंदी को उसका स्थान दिलाने के लिए वे आजीवन संघर्षरत रहे। प्रोफेसर चौधरी ने अमेरिका में पहले अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति और बाद में विश्व हिंदी न्यास गठित कर संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को पहुंचाने की कोशिशें कीं। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनवाने के लिए प्रोफेसर चौधरी अमेरिका में सकारात्मक माहौल बनाने में लगे थे। वह अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हिंदी चेयर स्थापित करवाने की कोशिशों में भी लगे हुए थे। एक चेयर की स्थापना पर करीब एक करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च होते हैं। भारतवंशी अमेरिकियों के पास धन की कमी नहीं, मगर प्रोफेसर चौधरी इस बात पर चिंता जताते थे कि धार्मिक कार्यों के लिए तो वे जी भरकर धन देते हैं, लेकिन हिंदी के लिए नहीं। वह प्राय: चीनियों का उदाहरण देते कि किस तरह से वे अपनी भाषा-संस्कृति को दुनिया भर में स्थापित करने की जुगत में लगे रहते हैं। उन्होने कई मित्रों को विश्व हिंदी न्यास (न्यूयार्क) से जोड़ा। अपने खर्चे से ‘विज्ञान प्रकाश’ पत्रिका का 2002 से प्रकाशन किया। हिंदी में विज्ञान चेतना को जन आन्दोलन बनाने की दिशा में प्रयास करते रहे। डॉ राम चौधरी हिन्दी के विकास के लिए सदा चिन्तन करते रहते थे। ८वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के बाद उन्होने लिखा था- आज तक के सभी विश्व हिन्दी सम्मेलनों का प्रमुख उद्देश्य रहा हैं, हिन्दी को राष्ट्रसंघ की एक आधिकारिक भाषा बनाना, ताकि वह भारत की राजभाषा बन सके। न्यास ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। न्यास के उद्देश्य सम्मेलन के उद्देश्यों से अधिक व्यापक हैं, वे भारत तथा भारतवंशियों, के हित में हैं। न्यास के कुछ अतिरिक्त उद्देश्य हैं, अमेरिका में हिन्दी को बढ़ावा देना तथा भारत के सर्वांगीण विकास के लिए हिन्दी को सम्पूर्ण भाषा बनाना। न्यास के दो प्रकाशन 'बाल हिन्दी जगत' तथा 'विज्ञान प्रकाश' इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हैं। आज के भारत में, शिक्षा के सभी स्तरों पर, अंग्रेजी माध्यम की श्रेष्ठ पाठशालायें हैं, वहां अंग्रेज़ी का साम्राज्य है। वहां हिन्दी बोलने पर विद्यार्थियों को दंड दिया जाता है। हिन्दी माध्यम, समाज के निर्बल वर्ग की विवशता बन गई है। हमें इस स्थिति में बदलाव लाना होगा। आज अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान अनिवार्य है, इसे ध्यान में रख कर हमें, शिक्षा के सभी स्तरों पर, ऐसी पाठशालाएं प्रारम्भ करनी हैं, जहां शिक्षा का माध्यम हिन्दी हो, साथ में अच्छी अंग्रेज़ी सीखने पर भी बल दिया जाय। इन पाठशालाओं के विद्यार्थी, हिन्दी तथा अंग्रेज़ी में समान रूप से दक्ष होंगे, वे अंग्रेज़ी द्वारा हिन्दी में आधुनिक ज्ञान लाने में सक्षम होंगे, और हिन्दी आधुनिक ज्ञान-सम्पन्न भाषा बनेगी। प्रसन्नता का विषय है कि इस वर्ष, भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण शीर्ष 20 व्यक्तियों में दो ने हिन्दी माध्यम से परीक्षा दी थी। जैसा विदित है, हिन्दी माध्यम से कोचिंग देने वाली पाठशालाओं की संख्या नगण्य है। यदि हिन्दी के अच्छे कोचिंग स्कूल खोले जायें तो भारतीय प्रशासनिक सेवा तथा आई. आई. टी. जैसी प्रतियोगिताओं में हिन्दी माध्यम के अधिक विद्यार्थी सफल होंगे। मुझे विश्वास है कि हिन्दी तथा अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यार्थियों की होड़ में हिन्दी विद्यार्थी खरे उतरेंगे, वे हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों का मार्ग प्रशस्त करेंगे। इस प्रयोग में अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों को हिन्दी स्कूलों में परवर्तित कर देने की क्षमता है। न्यास के प्रकाशनों में, विशेषतः न्यास समाचार में अमरीकी विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण की स्थिति के बारे में लिखा जाता रहा है। जैसा निम्न तालिका, तथा भाषाओं के वर्गीकरण से स्पष्ट होगा, भारत तथा विदेशों (अमेरिका) में हिन्दी शिक्षण अत्यन्त दुर्बल अवस्था में है। इसे दूर करने के लिए हमें मिलकर काम करना है। भाषा विद्यार्थी संख्या कालेजों की संख्या जपानी 52,238 782 चीनी 34,135 543 अरबी 10,584 264 कोरियन 5,211 102 हिन्दी 1,430 51 अमेरिका में विदेशी भाषाओं को दो वगों में विभाजित किया जाता है। अधिक विद्यार्थी वाली भाषाओं को पहले वर्ग मे तथा कम पढ़ाई जाने वाली भाषाओं को दूसरे वर्ग में रखा जाता है। उन्हें (Less Commonly Taught Languages, L. C. T. L.) भाषा कहा जाता है। हिन्दी दूसरे वर्ग में आती है। इस स्थिति से उबरने के लिए न्यास ने एक छोटा प्रयास किया है: रटगर्स विश्वविद्यालय को सन् 2001 में $8,000 का अनुदान देकर प्रारम्भिक हिन्दी कक्षाएं, तथा इस वर्ष $10,000 अनुदान देकर हिन्दी की माध्यमिक कक्षायें प्रारम्भ करवाई है। यदि हमें भारत सरकार, एवं अमेरिका के भारतीय धन कुबेरों का समर्थन मिले, तो वहां एक हिन्दीपीठ की स्थापना की जा सकती है। एक पीठ के लिए तीन मिलियन (तीस लाख) डालर चाहिए, अभी उत्तरी अमेरिका में हिन्दी का कोई पीठ नहीं है। कोरियन भाषा के 27 पीठ है। हमारा सुझाव है कि अमेरिका के पांच राज्यों, न्यू यार्क, न्यू जर्सी. कैलिफ़ोर्निया, टैक्साज़, तथा वाशिंगटन डी. सी. के विश्वविद्यालयों में 5 पीठों की स्थापना की जाय। इसमें भारत सरकार तथा अमेरिका के भारतवंशी समान भागीदारी करें। इन पीठों की आधार-शिला पर भारतीय अध्ययन केन्द्रों की स्थापना की जा सकती है।हर्ष का विषय है कि भारत के गांवों के साधारण परिवारों में जन्मे, पले कुछ भारतवंशियों ने कई मिलियन डालरों का अनुदान दिया है। न्यास समाचार के अंकों में उनकी चर्चा की गई है: www.worldhindifoundation.org पर देखा जा सकता है। यहां केवल उनका नाम दिया जा रहा है। ''उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर ज़िले की अनूप शहर तहसील के गांव बिचौला में जन्में श्री वीरेन्द्र सिंह ने सन् 2000 में बीस करोड़ रुपये तथा 42 एकड जमीन का दान देकर परदादा परदादी कन्या विद्यालय की स्थापना की। पिछले सात वर्षों से उन्होंने बिचौला में डेरा डाल दिया है। न्यू जर्सी निवासी श्री रामस्वरुप आर्य ने १ मिलियन की लागत से सुखराम इण्टर कॉलेज की स्थापना की। अमेरिका के रोढ अाइलैन्ड विश्वविद्यालय, किंग्स्टन में गणित के इमेरिटस प्रोफसर डा. घासीराम वर्मा ने पिछले दो दशकों में राजस्थान में शिक्षा के प्रसार तथा समाज सेवा कायों के लिए चार करोड़ रुपयों से अधिक का अनुदान दिया है। वे सभी हमारे सम्मान के पात्र हैं। पुस्तक प्रकाशन जो लोग कहते थे कि विज्ञान को हिंदी में नहीं पढ़ाया जा सकता, उन्हें उन्होंने हिंदी में विज्ञान की किताबें लिखकर करारा जवाब दिया। हिदी जगत, बाल हिंदी जगत, विज्ञान प्रकाश आदि पत्रिकाएं प्रकाशित करके हिंदी की मशाल जलाए रखी। ये पत्रिकाएं अमेरिका में तो हिंदी भाषियों के बीच सेतु का काम करती ही थीं, साथ ही विश्व भर में फैले हिंदी प्रेमियों के लिए भी संबल थीं। सन्दर्भ इन्हें भी देखें विश्व हिन्दी न्यास हिन्दी यूएसए बाहरी कड़ियाँ डॉ राम दास चौधरी : भारत की माटी से जुड़े मूर्धन्य वैज्ञानिक (डॉ ओम विकास ; 'विज्ञान प्रकाश' अंक १-२, २०१६) हिन्दी की समस्या, अथार्त भारत की समस्या (डॉ राम चौधरी का आलेख) A Plea for Hindi (राम चौधरी) श्रेणी:हिन्दीसेवी