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मुहम्मद बिन तुग़लक़
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दिल्ली का सुल्तान 250px| मुहम्मद बिन तुगलक का प्रारंभिक मुगलकालीन चित्र 4 फ़रवरी 1325 20 मार्च 1351 तुग़लक़ राजवंश गयासुद्दीन तुग़लक़ फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ 1290 20 मार्च 1351
मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत में तुग़लक़ वंश का शासक था। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र 'जूना ख़ाँ', मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-1351 ई.) के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसका मूल नाम 'उलूग ख़ाँ' था। राजामुंदरी के एक अभिलेख में मुहम्मद तुग़लक़ (जौना या जूना ख़ाँ) को दुनिया का ख़ान कहा गया है। सम्भवतः मध्यकालीन सभी सुल्तानों में मुहम्मद तुग़लक़ सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान एवं योग्य व्यक्ति था। अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों एवं दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण इसे 'स्वप्नशील', 'पागल' एवं 'रक्त-पिपासु' कहा गया है। बरनी, सरहिन्दी, निज़ामुद्दीन, बदायूंनी एवं फ़रिश्ता जैसे इतिहासकारों ने सुल्तान को अधर्मी घोषित किया गया है। मुहम्मद बिन तुगलक अपनी सनक भरी योजनाओं के कारण अपने द्वारा किए गए अभियानों में लगातार असफल होता गया जिस कारण ये प्रजा के बीच अलोकप्रिय हो गया।http://archive.org/details/dli.ernet.527074 The Delhi Sultanate Majumdar R.c. 1960 Bharatiya Vidya Bhavan Bombay
पद व्यवस्था
सिंहासन पर बैठने के बाद तुग़लक़ ने अमीरों एवं सरदारों को विभिन्न उपाधियाँ एवं पद प्रदान किया। उसने तातार ख़ाँ को 'बहराम ख़ाँ' की उपाधि, मलिक क़बूल को 'इमाद-उल-मुल्क' की उपाधि एवं 'वज़ीर-ए-मुमालिक' का पद दिया था, पर कालान्तर में उसे 'ख़ानेजहाँ' की उपाधि के साथ गुजरात का हाक़िम बनाया गया। उसने मलिक अरूयाज को ख्वाजा जहान की उपाधि के साथ ‘शहना-ए-इमारत’ का पद, मौलाना ग़यासुद्दीन को (सुल्तान का अध्यापक) 'कुतुलुग ख़ाँ' की उपाधि के साथ 'वकील-ए-दर' की पदवी, अपने चचेरे भाई फ़िरोज शाह तुग़लक़ को 'नायब बारबक' का पद प्रदान किया था।
गुणवान व्यक्ति
मुहम्मद बिन तुग़लक़ कला-प्रेमी एवं अनुभवी सेनापति था। वह अरबी भाषा एवं फ़ारसी भाषा का विद्धान तथा खगोलशास्त्र, दर्शन, गणित, चिकित्सा, विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि में पारंगत था। अलाउद्दीन ख़िलजी की भाँति अपने शासन काल के प्रारम्भ में उसने, न तो ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृति ली और न उलेमा वर्ग का सहयोग लिया, यद्यपि बाद में ऐसा करना पड़ा। उसने न्याय विभाग पर उलेमा वर्ग का एकाधिपत्य समाप्त किया। क़ाज़ी के जिस फैसले से वह संतुष्ट नहीं होता था, उसे बदल देता था। सर्वप्रथम मुहम्मद तुग़लक़ ने ही बिना किसी भेदभाव के योग्यता के आधार पर पदों का आवंटन किया। नस्ल और वर्ग-विभेद को समाप्त करके योग्यता के आधार पर अधिकारियों को नियुक्त करने की नीति अपनायी। वस्तुत: यह उस शासक का दुर्भाग्य था कि, उसकी योजनाएं सफलतापूर्वक क्रियान्वित नहीं हुई। जिसके कारण यह इतिहासकारों की आलोचना का पात्र बना।
दिल्ली सल्तनत
मुहम्मद तुग़लक़ के सिंहासन पर बैठते समय दिल्ली सल्तनत कुल 23 प्रांतों में बँटा थी, जिनमें मुख्य थे - दिल्ली, देवगिरि, लाहौर, मुल्तान, सरमुती, गुजरात, अवध, कन्नौज, लखनौती, बिहार, मालवा, जाजनगर (उड़ीसा), द्वारसमुद्र आदि। कश्मीर एवं बलूचिस्तान भी दिल्ली सल्तनत में शामिल थे। दिल्ली सल्तनत की सीमा का सर्वाधिक विस्तार इसी के शासनकाल में हुआ था। परन्तु इसकी क्रूर नीति के कारण राज्य में विद्रोह आरम्भ हो गया। जिसके फलस्वरूप दक्षिण में नए स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई और ये क्षेत्र दिल्ली सल्तनत से अलग हो गए। बंगाल भी स्वतंत्र हो गया। तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से बदल कर दौलताबाद कर दी थी|राज्यारोहण के बाद मुहम्मद तुग़लक़ ने कुछ नवीन योजनाओं का निर्माण कर उन्हें क्रियान्वित करने का प्रयत्न किया। जैसे -
दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि (१३२६-२७ ई॰)
राजधानी परिवर्तन (१३२६-२७ ई॰)
सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन (१३२९-३० ई॰)
खुरासन एवं काराचिल का अभियान आदि।
कराचिल (कुमायु की पहाड़ियों) का अभियान
दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि
अपनी प्रथम योजना के द्वारा मुहम्मद तुग़लक़ ने दोआब के ऊपजाऊ प्रदेश में कर की वृद्धि कर दी (संभवतः 50 से 55 प्रतिशत), परन्तु उसी वर्ष दोआब में भयंकर अकाल पड़ गया, जिससे पैदावार प्रभावित हुई। तुग़लक़ के अधिकारियों द्वारा ज़बरन कर वसूलने से उस क्षेत्र में विद्रोह हो गया, जिससे तुग़लक़ की यह योजना असफल रही। मुहम्मद तुग़लक़ ने कृषि के विकास के लिए ‘दिवाण-ए-अमीर कोही’ नामक एक नवीन विभाग की स्थापना की। सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, किसानों की उदासीनता, भूमि का अच्छा न होना इत्यादि कारणों से कृषि उन्नति सम्बन्धी अपनी योजना को तीन वर्ष पश्चात् समाप्त कर दिया। मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने किसानों को बहुत कम ब्याज पर ऋण (सोनथर) उपलब्ध कराया।
राजधानी परिवर्तन
तुग़लक़ ने अपनी दूसरी योजना के अन्तर्गत राजधानी को दिल्ली से देवगिरि स्थानान्तरित किया। देवगिरि को “कुव्वतुल इस्लाम” भी कहा गया। सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने देवगिरि का नाम 'कुतुबाबाद' रखा था और मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने इसका नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया। सुल्तान की इस योजना के लिए सर्वाधिक आलोचना की गई। मुहम्मद तुग़लक़ द्वारा राजधानी परिवर्तन के कारणों पर इतिहासकारों में बड़ा विवाद है, फिर भी निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि, देवगिरि का दिल्ली सल्तनत के मध्य स्थित होना, मंगोल आक्रमणकारियों के भय से सुरक्षित रहना, दक्षिण-भारत की सम्पन्नता की ओर खिंचाव आदि ऐसे कारण थे, जिनके कारण सुल्तान ने राजधानी परिवर्तित करने की बात सोची। मुहम्मद तुग़लक़ की यह योजना भी पूर्णतः असफल रही और उसने 1335 ई. में दौलताबाद से लोगों को दिल्ली वापस आने की अनुमति दे दी। राजधानी परिवर्तन के परिणामस्वरूप दक्षिण में मुस्लिम संस्कृति का विकास हुआ, जिसने अंततः बहमनी साम्राज्य के उदय का मार्ग खोला।
सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन
thumb|मुहम्मद बिन तुगलक के वक्त के सिक्के
तीसरी योजना के अन्तर्गत मुहम्मद तुग़लक़ ने सांकेतिक व प्रतीकात्मक सिक्कों का प्रचलन करवाया। सिक्के संबंधी विविध प्रयोगों के कारण ही एडवर्ड टामस ने उसे ‘धनवानों का राजकुमार’ कहा है। मुहम्मद तुग़लक़ ने 'दोकानी' नामक सिक्के का प्रचलन करवाया। बरनी के अनुसार सम्भवतः सुल्तान ने राजकोष की रिक्तता के कारण एवं अपनी साम्राज्य विस्तार की नीति को सफल बनाने हेतु सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन करवाया। सांकेतिक मुद्रा के अन्तर्गत सुल्तान ने संभवतः पीतल (फ़रिश्ता के अनुसार) और तांबा (बरनी के अनुसार) धातुओं के सिक्के चलाये, जिसका मूल्य चांदी के रुपये टका के बराबर होता था। सिक्का ढालने पर राज्य का नियंत्रण नहीं रहने से अनेक जाली टकसाल बन गये। लगान जाली सिक्के से दिया जाने लगा, जिससे अर्थव्यवसथा ठप्प हो गई। सांकेतिक मुद्रा चलाने की प्रेरणा चीन तथा ईरान से मिली। वहाँ के शासकों ने इन योजनाओं को सफलतापूर्वक चलाया, जबकि मुहम्मद तुग़लक़ का प्रयोग विफल रहा। सुल्तान को अपनी इस योजना की असफलता पर भयानक आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ा।ऐसा नहीं था कि तुगलक ने सांकेतिक मुद्रा चलाने से पहले जांच पड़ताल न की हो ,इन से पहले 12वी शताब्दी में चीन के शासक कुबलई खाँ ने कागज की मुद्राएं चलायी थी,और उनका प्रयोग सफल भी हुआ था ।
और इसी क्रम में फारस के शासक गाईखात्तु खाँ ने चमड़े का सिक्का चलाया था ,जिसमे कुबलई खाँ का का प्रयोग सफल हुआ और फारस के शासक का असफल ।
अतः चीनी शासक कुबलई खाँ के प्रयोग से सीखकर उसने ऐसा किया लेकिन वह भी असफल रहा
खुरासान एवं कराचिल अभियान
चौथी योजना के अन्तर्गत मुहम्मद तुग़लक़ के खुरासान एवं कराचिल विजय अभियान का उल्लेख किया जाता है। खुरासन को जीतने के लिए मुहम्मद तुग़लक़ ने ३,७०,००० सैनिकों की विशाल सेना को एक वर्ष का अग्रिम वेतन दे दिया, परन्तु राजनीतिक परिवर्तन के कारण दोनों देशों के मध्य समझौता हो गया, जिससे सुल्तान की यह योजना असफल रही और उसे आर्थिक रूप से हानि उठानी पड़ी। कराचिल अभियान के अन्तर्गत सुल्तान ने खुसरो मलिक के नेतृत्व में एक विशाल सेना को पहाड़ी राज्यों को जीतने के लिए भेजा। उसकी पूरी सेना जंगली रास्तों में भटक गई, इब्न बतूता के अनुसार अन्ततः केवल दस अधिकारी ही बचकर वापस आ सके। इस प्रकार मुहम्मद तुग़लक़ की यह योजना भी असफल रही। सम्भवतः १३२८-२९ ई. के मध्य मंगोल आक्रमणकारी तरमाशरीन चग़ताई ने एक विशाल सेना के साथ भारत पर आक्रमण कर मुल्तान, लाहौर से लेकर दिल्ली तक के प्रदेशों को रौंद डाला। ऐसा माना जाता है कि, सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ ने मंगोल नेता को घूस देकर वापस कर दिया था ये भी संभव है कि मंगोल नेता ने सुल्तान को दिल्ली सल्लतन को खुद ही यथास्थिति कमज़ोर करने व इसी तरह मंगोल शासन के लिए ज़मीन तैयार करने के लिए घूस दी। उनके बीच जो भी हुआ, मंगोल नेता के प्रति इस समझोते की नीति के कारण सुल्तान को आलोचना का शिकार बनना पड़ा। ये सही है कि इसके बाद फिर कभी मुहम्मद तुग़लक़ के समय में भारत पर मंगोल आक्रमण नहीं हुआ और ये भी कि अपनी महत्त्वाकांक्षी असफल योजनाओं के कारण मुहम्मद तुग़लक़ को ‘असफलताओं का बादशाह’ कहा जाता है।
महत्त्वपूर्ण विद्रोह
मुहम्मद बिन तुग़लक़ के शासन काल में सबसे अधिक (३४) विद्रोह हुए, जिनमें से 27 विद्रोह अकेले दक्षिण भारत में ही हुए। सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ के शासन काल में हुए कुछ महत्त्वपूर्ण विद्रोहों का सारांश निम्नलिखित हैं-
प्रथम विद्रोह १३२७ ई. में तुग़लक़ के चचेरे भाई सुल्तान गुरशास्प ने किया, जो गुलबर्ग के निकट सागर का सूबेदार था। वह सुल्तान द्वारा बुरी तरह से पराजित किया गया। मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध सिंध तथा मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा ऊर्फ किश्लू ख़ाँ ने १३२७-१३२८ ई. में विद्रोह किया। सैयद जलालुद्दीन हसनशाह का मालाबार विद्रोह १३३४-१३३५ ई. में किया गया। बंगाल का विद्रोह (1330-1331 ई.) प्रमुख हैं। बंगाल के विद्रोह को यद्यपि प्रारंभ में दबा लिया गया था, किन्तु 1340-1341 ई. के लगभग शम्सुद्दीन के नेतृत्व में बंगाल दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया। १३३७-१३३८ ई. में कड़ा के सूबेदार निज़ाम भाई का विद्रोह, १३३८-१३३९ ई. में बीदर के सूबेदार, नुसरत ख़ाँ का विद्रोह, १३३९-१३४० ई. में गुलबर्ग के अलीशाह का विद्रोह आदि भी मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध किये गये विद्रोहों में प्रमुख हैं। इस तरह के विद्रोहों का सुल्तान ने सफलतापूर्वक दमन किया। मुहम्मद तुग़लक़ के शासनकाल में ही दक्षिण में १३३६ ई. में 'हरिहर' एवं 'बुक्का' नामक दो भाईयों ने स्वतंत्र ‘विजयनगर’ की स्थापना की। अफ़्रीकी यात्री इब्न बतूता को 1333 ई. में मुहम्मद ने अपने राजदूत के रूप में चीन भेजा। इब्न बतूता ने अपनी पुस्तक ‘रेहला’ में मुहम्मद तुग़लक़ के समय की घटनाओं का वर्णन किया है। मुहम्मद तुग़लक़ धार्मिक रूप में सहिष्णु था। जैन विद्वान एवं संत 'जिनप्रभु सूरी' को दरबार में बुलाकर सम्मान प्रदान किया। मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने हिन्दू त्योहरों (होली, दीपावली) में भाग लिया। दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी शेख़ 'शिहाबुद्दीन' को 'दीवान-ए-मुस्तखराज' नियुक्त किया तथा शेख़ 'मुईजुद्दीन' को गुजरात का गर्वनर तथा 'सैय्यद कलामुद्दीन अमीर किरमानी' को सेना में नियुक्त किया। शेख़ 'निज़ामुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली' सुल्तान के विरोधियों में एक थे।
मृत्यु
अपने शासन काल के अन्तिम समय में जब सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ गुजरात में विद्रोह को कुचल कर तार्गी को समाप्त करने के लिए सिंध की ओर बढ़ा, तो मार्ग में थट्टा के निकट गोंडाल पहुँचकर वह गंभीर रूप से बीमार हो गया। यहाँ पर सुल्तान की २० मार्च १३५१ को मृत्यु हो गई। उसके मरने के पर इतिहासकार बदायूनी ने कहा कि, “सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई।” इसामी ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ को इस्लाम धर्म का विरोधी बताया है। डॉ॰ ईश्वरी प्रसाद ने उसके बारे में कहा है कि, “मध्य युग में राजमुकुट धारण करने वालों में मुहम्मद तुग़लक़, निःसंदेह योग्य व्यक्ति था। मुस्लिम शासन की स्थापना के पश्चात् दिल्ली के सिंहासन को सुशोभित करने वाले शासकों में वह सर्वाधिक विद्धान एवं सुसंस्कृत शासक था।” उसने अपने सिक्कों पर “अल सुल्तान जिल्ली अल्लाह”, “सुल्तान ईश्वर की छाया”, सुल्तान ईश्वर का समर्थक है, आदि वाक्य को अंकित करवाया। मुहम्मद बिन तुग़लक़ एक अच्छा कवि और संगीत प्रेमी भी था।
सन्दर्भ
श्रेणी:तुग़लक़ वंश
श्रेणी:दिल्ली का इतिहास