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तूमा शिल्प
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तूमा शिल्प: छत्तीसगढ़ की एक विलुप्त होती सांस्कृतिक धरोहर
छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहाँ की लोककला, संस्कृति और हस्तशिल्प पारंपरिक रूप से सदियों से जीवित हैं। इन पारंपरिक कला रूपों में तूमा शिल्प एक अद्वितीय और महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह शिल्प मुख्य रूप से सूखी लौकी (जिसे स्थानीय भाषा में 'तूमा' कहा जाता है) से तैयार किया जाता है और इसका गहरा संबंध छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति से है।https://theindiantribal.com/2024/03/16/bastar-tuma-craft-chhattisgarh-tribal-artistry-imminent-extinction/ कहां खो गई बस्तर की प्रसिद्ध तूमा शिल्प? https://hamarchhattisgarh.in/ बस्तर का लौह शिल्प कलाजब भी हम छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति के बारे में सोचते हैं, तो इस हस्तशिल्प का उल्लेख अनिवार्य रूप से आता है। यह शिल्प न केवल कला का प्रतीक है, बल्कि छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जीवनशैली, उनकी परंपराओं और मान्यताओं का भी परिचायक है।
सामग्री और निर्माण की प्रक्रिया
तूमा शिल्प में मुख्य सामग्री के रूप में सूखी लौकी का प्रयोग होता है, जिसे "तूमा" कहा जाता है।यह लौकी खेतों में उगाई जाती है और इसे विशेष तरीके से सूखाया जाता है ताकि इसका बाहरी आवरण सख्त हो जाए। इसके बाद, शिल्पकार इसे अपने हाथों से काटते, तराशते और आकार देते हैं। इस प्रक्रिया में विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि लौकी का आकार सही बने और उसमें नक्काशी की जगह मिल सके।
शिल्पकार लौकी की सतह पर आदिवासी जीवन और प्रकृति से जुड़े चित्र उकेरते हैं। इन चित्रों में आमतौर पर जंगल, पशु-पक्षी, देवता, पक्षियों के झुंड, और प्राकृतिक दृश्य होते हैं, जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाते हैं। शिल्पकार प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं, जिन्हें वे खुद तैयार करते हैं। ये रंग मिट्टी, फूलों, पत्तियों, और खनिजों से बनाए जाते हैं। यह शिल्प पूरी तरह से प्राकृतिक है और इस कारण पर्यावरण के अनुकूल भी है।https://shashwat-shilp.blogspot.com/ छत्तीसगढ़ की शाश्वत हस्तशिल्प
तैयार वस्तुओं की विविधता
बाएँ|अंगूठाकार|294x294पिक्सेल|तूमा शिल्प
तूमा शिल्प से बनी वस्तुएं न केवल उपयोगी होती हैं, बल्कि सजावट के लिए भी अत्यंत आकर्षक होती हैं। इसमें प्रमुख रूप से संगीत वाद्ययंत्र तैयार किए जाते हैं, जैसे रावणहत्था, तम्बूरा और ढोलक, जो छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। इन वाद्ययंत्रों का उपयोग पारंपरिक गीतों, नृत्य और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। रावणहत्था जैसे वाद्ययंत्र की ध्वनि आदिवासी संगीत का हिस्सा है और इसे विभिन्न आयोजनों में इस्तेमाल किया जाता है।https://hamarchhattisgarh.in/ हमर छत्तीसगढ़: बस्तर का लौह शिल्प कला
इसके अलावा, शिल्पकार पानी रखने के पात्र, तेल रखने के पात्र, माला रखने के डिब्बे, दीपदान, मोमबत्तियाँ और खिलौने भी तैयार करते हैं। ये वस्तुएं न केवल उपयोगी होती हैं, बल्कि इनकी सुंदरता और रूपांकन भी इसे अद्वितीय बनाता है। विशेषकर, त्योहारों के दौरान इन वस्तुओं का उपयोग परिवारों और समुदायों में होता है।https://theindiantribal.com/2024/03/16/bastar-tribal-artistry-overview/ Bastar Tribal Artistry: An Overviewजून 2025 InternetArchiveBot
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
तूमा शिल्प का संबंध केवल शिल्पकला से नहीं, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज की संस्कृति और धर्म से भी जुड़ा हुआ है। आदिवासी समुदायों के लिए यह शिल्प न केवल सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि उनका धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन भी इससे जुड़ा हुआ है। रावणहत्था और तम्बूरा जैसे वाद्ययंत्र केवल संगीत बजाने के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों और त्यौहारों में देवी-देवताओं की पूजा में भी उपयोग होते हैं।https://www.scert.cg.gov.in/pdf/manuals/KalaVaShilpBook.pdf छत्तीसगढ़ राज्य की पाठ्यचर्या की रूपरेखा: कला व शिल्प 19 दिसंबर 2024 20 जून 2022 https://web.archive.org/web/20220620135629/http://scert.cg.gov.in/pdf/manuals/KalaVaShilpBook.pdf dead
इसके अलावा, गाँवों में यह शिल्प समाज के विभिन्न सामाजिक आयोजनों का हिस्सा होता है। जैसे कि विवाह, जन्म, और अन्य पारंपरिक उत्सवों के दौरान ये वस्तुएं विशेष रूप से उपयोग में आती हैं। इन वाद्ययंत्रों और सजावटी वस्तुओं का इस्तेमाल सामूहिक पूजा और नृत्य में भी किया जाता है, जो आदिवासी समाज की जीवनशैली का एक अभिन्न हिस्सा है।http://www.ignca.gov.in/ IGNCA (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र)
पर्यावरण के अनुकूलता
तूमा शिल्प पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है, जो इस शिल्प को अन्य शिल्प विधाओं से अलग करता है। इसमें उपयोग होने वाली हर सामग्री प्राकृतिक है। लौकी, जिसे सामान्यत: अनुपयोगी समझा जाता है, शिल्पकारों के हाथों से एक सुंदर और उपयोगी वस्तु में बदल जाती है। इसके अलावा, इस शिल्प में कृत्रिम रंगों का प्रयोग नहीं होता, बल्कि सभी रंग प्राकृतिक पदार्थों से बनाए जाते हैं। मिट्टी, पत्तियाँ, फूल और खनिजों से रंग तैयार किए जाते हैं, जो न केवल पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि इनका उपयोग शिल्प में सुंदरता और गुणवत्ता को भी बढ़ाता है। इस प्रकार तूमा शिल्प एक उदाहरण है कि कैसे पारंपरिक ज्ञान और कला का उपयोग पर्यावरण संरक्षण में किया जा सकता है।
आर्थिक स्थिति और चुनौतियाँ
हालांकि तूमा शिल्प की मांग और महत्व आज भी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में बना हुआ है, लेकिन यह शिल्प बड़े पैमाने पर पहचान नहीं बना पाया है। आजकल मशीन से बने उत्पादों और सस्ते सामान के कारण इस शिल्प को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। शिल्पकारों को अपने उत्पादों के लिए उचित बाजार नहीं मिल पाता, जिससे उनकी आय में कमी आती है। इसके अलावा, इस शिल्प को बनाने के लिए उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री और कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती है, जो इसे एक महंगा उत्पाद बना देता है।https://theindiantribal.com/2024/03/16/bastar-tuma-craft-chhattisgarh-tribal-artistry-imminent-extinction/ Bastar Tribal Artistry: An Overview
शिल्पकारों को अपनी कला को जीवित रखने के लिए वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इसके साथ ही, शिल्प के संरक्षण के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की मदद की जरूरत हैIhttps://tribal.nic.in/ जनजातीय अनुसंधान संस्थान, 2021
संरक्षण और बढ़ावा देने के उपाय
तूमा शिल्प को पुनर्जीवित करने और इसे प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। सबसे पहले, शिल्पकारों को प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि वे अपनी कला को और अधिक आकर्षक और बाजार में प्रतिस्पर्धी बना सकें। इसके अलावा, शिल्पकारों को वित्तीय सहायता और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर इस शिल्प को बढ़ावा देने के लिए हस्तशिल्प मेले, प्रदर्शनियां और कार्यशालाएं आयोजित की जा सकती हैं। इन आयोजनों से शिल्पकारों को अपने उत्पादों को विस्तृत बाजार में पहुँचाने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही, शिल्प के प्रचार के लिए ऑनलाइन प्लेटफार्म भी उपयोग किए जा सकते हैं, जहाँ इस शिल्प का प्रचार और बिक्री की जा सके।https://www.cgculture.in/ लोक कला परिषद, छत्तीसगढ़
अंगूठाकार|238x238पिक्सेल|लौकी कला की बिक्री
वैश्विक स्तर पर पहचान की संभावना
तूमा शिल्प में वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने की अपार संभावनाएँ हैं। इसकी प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल विशेषताएँ इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक अलग स्थान दिला सकती हैं। इसे "हरित हस्तकला" के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, जो वैश्विक बाजार में आकर्षण का केंद्र बन सकता है। इस शिल्प को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मेलों और प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे इसे विश्वभर में पहचान मिल सकती है।https://nationalcraftsmuseum.nic.in/ राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय, 2019
निष्कर्ष
तूमा शिल्प छत्तीसगढ़ की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है। यह शिल्प न केवल कला का प्रतीक है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति, धार्मिक विश्वासों और रचनात्मकता का अद्वितीय मिश्रण है। अगर इस शिल्प को सही तरीके से संरक्षित किया जाता है और इसके लिए पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाता है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बन सकता है।
शिल्पकारों को प्रशिक्षण, वित्तीय मदद और बाजार के अवसर प्रदान करके इस शिल्प को पुनर्जीवित किया जा सकता है। साथ ही, इस शिल्प को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाए जा सकते हैं। यह शिल्प न केवल छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का एक प्रयास है, बल्कि यह एक आर्थिक स्रोत के रूप में भी विकास कर सकता है।https://hamarchhattisgarh.in/ हमर छत्तीसगढ़ (2023). बस्तर का लौह शिल्प कला
संदर्भ