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411 समाचार
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वार (पंजाबी काव्य)

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वार पंजाबी साहित्य का एक काव्यभेद, जो वर्णनात्मक शैली में लिखा जाता है। "वार" शब्द संस्कृत की "वृ' धातु से व्युत्पन्न है। "कीर्ति', "घेरा', "धावा' (आक्रमण), "बार बार', बाह्य (पंजाबी वाहर = बाहर) प्रभृति "वार' शब्द के अर्थ अनुमित हुए हैं। किंतु रूढ़ अर्थों में यह युद्ध संबंधी काव्य का पर्यांय हो गया है। संयोग से फारसी शब्द "वार' (आक्रमण) और अंग्रेजी शब्द (war) (वार) में उच्चारण और रूपसाम्य ही नहीं, युद्धविषयक भावसाम्य भी है। वस्तुत: गुणगानसंपन्न युद्धविषयक काव्य के लिए "वार' शब्द क्यों प्रचलित हुआ, एतदर्थ इस शब्द के विभिन्न अर्थों के आधार पर यह विकल्प प्रस्तुत किया जा सकता है : "इसमें "बाहर' के (बाह्य) आक्रांताओं के "वार' (आक्रमण) और उसके प्रतिरोध में नायक पक्ष में "वार' (प्रत्याक्रमण) का "बार बार' वर्णन तथा दोनों पक्षों का "कीर्तिगान' होता है। वार में नायक की भरपूर प्रशंसा और विरोधी वर्ग का शौर्यप्रदर्शन एक प्रकार से परंपरागत हो गया है। यदि प्रतिनायक पक्ष की दुर्बलताओं का चित्रण करना भी होता है तो केवल उपहांसात्मक ढंग से। संभवत: "यश दी वाराँ गाना' पंजाबी मुहावरा इसी प्रथा और भाई गुरदास के इस कथन के अनुसार चल पड़ा है : "ढाढी वाराँ गाँवदे वैर विरोध जोध सालाही (वार १५। पौड़ी ६। चरण २)। सिक्ख गुरुओं ने "वार" शब्द को आध्यात्मिक काव्यक्षेत्र में भी स्थान दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि गुरु महाराजाओं ने सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति के हेतु हुए मानवीय संघर्ष को विशेष प्रश्रय न देकर जीव के ईश्वर तक पहुँचने और उसमें आत्मसात्‌ होने के द्वंद्वों को ही सबसे बड़ा युद्ध माना है। किंतु जनरुचि के अनुसार युद्ध संबंधी वारों को प्रेरणास्रोत के रूप में स्वीकार किया है। इतिहास वार साहित्य का मूल चारणों और राजाश्रयी कवियों की कविता में ढूँढा जा सकता है। वे राजाओं महाराजाओं का यशोगान और उनके पूर्वजों का कीर्तिवर्णन किया करते थे। युद्धक्षेत्र में भी वे वीरों के शौर्यगान से योद्धाओं को प्रेरित किया करते थे। असंभव नहीं कि ढाढी और रबाबी भी आजीविका उपार्जन के हेतु मेलो, तमाशों आदि में इन्हें गाया करते हों। अब तक उपलब्ध वीररस की वारों में कवि खुसरो विरचित "तुगलक दी वार' ही सर्वप्राचीन मानी जाती है। आध्यात्मिक वारों में गुरु नानकदेव प्रणीत "मलार की वार' है। यह सन्‌ १५२१ में कर्तारपुर रावी में लिखी गई थी। सिक्ख गुरुओं ने अपढ़ और सरल स्वभाव की जनता की रुचि को पहचानकर प्रचारहेतु "वार' को अपनाया। गुरु ग्रंथ साहिब में २२ वारें संकलित हैं। इनमें से एक वार पंचम गुरु अर्जुनदेव जी के रबाबी सत्ता और बलवंड निर्मित है, जिसमें गुरुओं का यशोगान हुआ है। शेष २१ वारों का प्रणेता और रागानुसार श्रेणीबंधन इस प्रकार है : (क) श्री गुरु नानकदेव - माझ राग (१), आसा राग (१)। (ख) श्री गुरु अमरदास - गूजरी राग (१), सूही राग (१), रामकली राग (१), मारू राग (१)। (ग) श्री गुरु रामदास - सिरी राग (१), गौड़ी राग (१), बिहागड़ा राग (१), वडहंस राग (१), सोरठ राग (१), बिलावल राग (१), सारंग राग (१), कानड़ा राग (१),। (घ) श्री गुरु अर्जनदेव - गौड़ी राग (१), गूजरी राग (१), जैतसरी राग (१), रामकली राग (१), मारू राग (१), बसंत राग (१)। श्री गुरु अंगददेव (द्वितीय गुरु) की कोई वार नहीं हैं। पंचम गुरु श्री अर्जनदेव ने "गुरु ग्रंथ साहिब' का संकलन करते समय वारों के भाव को सुबोध बनाने के हेतु प्रत्येक गुरु की वारों की पौड़ियों के साथ उसी गुरु के सलोक भी जोड़ दिए हैं। अपनी वारों में उन्होंने स्वरचित सलोकों का ही व्यवहार किया है। कौन सी वार किस गुरु की है, इसका बोध "महला' ("महिला' से व्युत्पन्न; गुरुओं ने अपने को स्त्री और ईश्वर को पति रूप में स्वीकार किया है) शब्द और संख्याविशेष से हो जाता है (जैसे महला १ = गुरु नानकदेव, महला ३ = गुरु अमरदास आदि)। इन वारों में से नौ वारों की धारणा (तर्ज) भी दे दी गई है। कतिपय विद्वानों के अनुसार छठे गुरु हरगोविंद साहिब के ढाढियों मीर अब्दुल्ला और मीर नत्या ने ७२ वारों की रचना की थी। इनमें से केवल नौ की तर्जों का ष्ठष्ठ गुरु ने प्रतीक रूप में गुरवाणी की वारों के प्रारंभ में उद्धृत कर दिया। किंतु यह मत सर्वमान्य नहीं है। अधिकांश विद्वानों का विचार है कि गुरु हरगोविंद जी की प्रार्थना पर उनके पिता पंचम गुरु श्री अर्जनदेव ने प्राचीन भाटों की धारणा के अनुसार (धुनि गावणी = तर्ज या धारणा के अनुसार गाना) चुनी हुई वारों की तर्ज भी प्रस्तुत कर दी। गुणवाणी की इन २१ वारों का विषय आध्यात्मिक है। यथास्थान समाजगत न्यूनताओं का चित्रण, जीवनोपयोगी अनेक तथ्यों का निर्धारण एवं गुरुओं के जीवदर्शन का प्रदर्शन हुआ है। इनका नायक अकालपुरुष (ईश्वर) है। नायक की प्राप्ति में सहायक विट पात्र "सत्गुरु' है। ईश्वर से बिछुड़ी आत्मा सत्गुरु (सच्चे गुरु) के उपदेश एवं दया से प्राप्त हरिनामस्मरण से, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार नामक पाँच शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर परमात्मा से मिलती है। इनकी भाषा केंद्रीय पंजाबी है। रागों में आबद्ध होने के कारण गाकर इनका पाठ होता है। आध्यात्मिक वारों में भाई गुरदास की वारों का स्थान महत्वपूर्ण है। भाई साहब की ४० वारें उपलब्ध हैं, जिनमें प्रत्येक को "ज्ञान रत्नावली' कहा गया है और यथाक्रम उनकी संख्या दी गई है। "गुरु ग्रंथ साहिब' में संकलित वारसाहित्य से ये पृथक्‌ हैं। इनकी भाषा भी केंद्रीय पंजाबी है, जिसमें यत्र तत्र ब्रज का पुट भी है। दृष्टांत और अन्योक्ति के व्यवहार में गुरदास जी सिद्धहस्त हैं। इनकी वारों में बुद्धिवाद और भाव का सुंदर द्वंद्व है, जिसमें अंतत: बुद्धिवाद की विजय होती है। वर्ण्य विषय और नायकादि गुरवाणी के सदृश हैं। विद्वानों ने गुरदास जी की वाणी को "गुरवाणी की कुंजी' कहा है, जिसमें किंचित्‌ भी अत्युक्ति नहीं है। ""वार श्री भगउती जी की पातशाही १०, जो एक अन्य गुरदास की रचना है, का प्रणयन सन्‌ १७२३-२८ ई. के लगभग हुआ है। इसमें भी सिक्ख गुरुओं का विशेषत दशम गुरु श्री गोविंदसिंह जी का, गुणगान हुआ है। वीर रस की वारें "गुरु ग्रंथ साहिब' की वारों को गाने के लिए जो नौ वारें तर्ज के रूप में प्रस्तुत की गई हैं, वे वीर-रस-संपृक्त हैं। इनमें से छह तो गुरु नानकदेव (संवत्‌ १५२६-१५९६) के समय से पूर्व की हैं। शेष तीन में से 'मलक मुरीद तथा चंद्रहड़ा सोहीआँ ' की वार में अकबर के दो सूरदारों का, 'राणै कैलास तथा मालदेव' की वार में जहाँगीर के समकालीन दो राजपूत भाइयों का तथा 'जौधै वीरै पूरबाणी' की वार में लक्खी जंगल के मुगलकालीन दो वीरों का युद्ध एवं यशोगान वर्णित है। ये वारें अधूरी ही मिलती हैं। गुरु गोविन्द सिंह जी प्रणीत 'चंडी दी वार' (दुर्गासप्तशती पर आधृत) के उपरांत बहुत सी वीररसात्मक वारें रची गईं। उनमें से जशोधानंदनकृत 'लवकुश दी वार', पीरमुहम्मद रचित 'चट्ठियाँ दी वार' (परगना रसूलनगर के चट्ठे मुस्लिम जाटों तथा शुक्र चक्किए मिसल के सरदारों का युद्ध) तथा नजाबत निर्मित 'नादरशाह दी वार' (नादिरशाह दुर्रानी और मुगल नरेश मुहम्मद शाह का युद्ध) तथा भाई जवाहर सिंह लिखित 'वार सिरी राम जी की' (सूर्यवंशी रामचंद्र और राक्षसों के युद्ध) मुगलों के ह्रासकाल में रची गईं। अंग्रेजों के शासनकाल में रामसिंह ने 'आनंदपुर दी वार' (सोढी सुरजनसिंह आनंदपुरवाले तथा बिलासपुर के राजा महाचंद कहिलूरिया का युद्ध), हरिंदर सिंह रूप ने 'बंदे दी वार' (बंदा वैरागी का मुगलों से युद्ध), प्रो॰ मोहनसिंह ने 'वार राणी साहब कौर' (महाराजा पटियाला की वीरांगना बहन का मराठों से युद्ध), हजारासिंह ने 'राणापरताप दी वार' (राजस्थानकेसरी महाराणा प्रताप तथा अकबर का युद्ध), हरसासिंह ने 'वार महाराजा पोरस' की रचना की। वार साहित्य की यहीं पर इतिश्री नहीं हो जाती। कुछेक प्राचीन वारें तो भूत के गर्भ में ही विलीन हो चुकी हैं। कुछेक अधूरी मिल रही हैं, कई ऐसी भी हैं जो अज्ञातनामा हैं। छंदयोजना पंजाबी के युद्धविषयक काव्य के लिए "वार' के अतिरिक्त "जंगनामा' और "भेड़ा' शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। किंतु अधिकांश विद्वानों का यही मत है कि "वार' केवल "पौड़ी' छंद में ही रची जा सकती है। "पौड़ी' शब्द संस्कृत के "नि:श्रेणी' (निसेनी) का ही पर्यांय है। कवि रामदास जी ने इसके लिए "सीढ़ी' शब्द का प्रयोग भी किया है। इसके प्रत्येक चरण में २३ मात्राएँ रहती हैं, जिसमें १३ और १० पर यति होती है और अंत में गुरु+गुरु। प्रत्येक वृत्त में चरणों की संख्या में विभिन्नता दृष्टिगत होती है, कम से कम चार चरण तो प्राय: मिलते हैं। अधिकतर वारों में अत्यानुप्रास मिलता है, किंतु "रामकली की वार' (गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित) में अंतिम चरण का अंतिम चरण का अंतिम शब्द बदल जाने से अत्यानुप्रास नहीं रह पाया है। "आसा की वार' में गुरु नानकदेव जी ने एक और नवीन प्रयोग किया है। उसमें अंत्यानुप्रास तो उपलब्ध है, परंतु पौढ़ी के अंतिम चरण को थोड़ा छोटा कर दिया गया है। भाई गुरदास ने भी इसी प्रवृत्ति को कई वारों में अपनाया है। वस्तुत: "पौड़ी' के विविध रूप तथा शिखंडी ही "वार' में बहुप्रयुक्त छंद हैं। जिन कवियों ने वीररस की कविता में "पौड़ी' के अतिरिक्त सोरठा, दोहा, कवित्त प्रभृति छंद भी व्यहृत किए हैं, उन्होंने "गुरु ग्रंथ साहिब' की वारों के साथ "सलोक' जुड़े देखकर, गुरु अर्जनदेव के मंतव्य को न समझकर, स्वयं अपने ही भ्रमवश अन्य छन्दों का प्रयोग कर दिया है। किंतु कई एक ने पौड़ी को भी अवश्य ही अपनाया है, जैसे अणीरायकृत "जंगनामा श्री गुरु गोविंद सिंह जी का' में। प्रत्युत कवि केशवदास विरचित "वार राजा अमरसिंह' में अन्य छंदों के साथ जहाँ "पौड़ी' का प्रयोग हुआ है, वहाँ साथ ही संकेत रूप में ""वारछंद (पौड़ी) का उल्लेख हुआ है। सन्दर्भ ग्रन्थ क्ह्रासिंह : महान कोश : गुरु शब्द रत्नाकर (भाषा विभाग, पंजाब, पटियाला; द्वितीय संस्करण १९६०); गंडासिंह : पंजाब दीआँ वाराँ; शमशेर सिंह अशोक : प्राचीन जंगनामे (श्रोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, अमृतसर, प्रथम संस्करण सन्‌ १९५०); साहिब सिंह : दस वाराँ (लाहौर बुक शॉप, लुधियाना, प्रथम संस्करण); सुरिंदर सिंह कोहली : पंजाबी साहित दा इतिहास (लाहौर बुक शॉप, लुधियाना); वाराँ भाई गुरदास जी (श्रोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, अमृतसर); पंजाबी दुनीआ : बीर साहित्त अंक; अप्रैल-मई, १९६३ (पंजाबी विभाग, पंजाब, पटियाला)। श्रेणी:पंजाबी साहित्य