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411 समाचार
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भांगराज

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भांगराजGreater Racket-tailed Drongo Greater racket-tailed drongo @ Kanjirappally 01.jpg भांगराज DicrurusParadiseusHead.jpg शीष LC IUCN3.1 BirdLife International. 2016. Dicrurus paradiseus. The IUCN Red List of Threatened Species 2016: e.T103711122A94102694. https://dx.doi.org/10.2305/IUCN.UK.2016-3.RLTS.T103711122A94102694.en. Downloaded on 11 December 2018. जंतु रज्जुकी (Chordata) पक्षी (Aves) पासरीफ़ोर्मीज़ (Passeriformes) डिक्रूरिडाए (Dicruridae) डिक्रूरस (Dicrurus) डी. पैराडिसेयस (D. paradiseus) Dicrurus paradiseus लीनियस, 1766 Dissemurus paradiseus Dissemuroides paradiseus Edolius grandis भांगराज (Greater racket-tailed drongo), , जिसका वैज्ञानिक नाम डिक्रूरस पैराडिसेयस (Dicrurus paradiseus) है, भुजंगा (डिक्रूरिडाए) कुल के पक्षियों की एक जीववैज्ञानिक जाति है। यह भारत से लेकर दक्षिणपूर्वी एशिया में इण्डोनेशिया तक पाई जाती है। भारत में यह हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट व प्रायद्वीपीय भारत की पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।Lamba, BS (1963) The nidification of some common Indian birds. 3. The Black Drongo (Dicrurus macrocercus Viellot). Res. Bull. Panjab Univ. 14(1–2):1–9.Shukkur EAA, Joseph KJ (1980). "Annual rhythm in the Black Drongo Dicrurus adsimilis (family Dicruridae, Passeriformes, Aves)". Comparative Physiology and Ecology. 5 (2): 76–77."Journal of the Asiatic Society of Bengal: Volume 66," Pg 666, Asiatic Society of Bengal, 1898, " ... Bhimraj (Dissemurus paradiseus) ... " विवरण thumb|left|पश्चिमी घाट से thumb|left|आबादी के साथ कलगीदार माप और आकार बदलता है यह पक्षी पूंछ के लम्बे परों (जिनके किनारों पर जाली होती है) के कारण विशिष्ट रूप से जाना जाता है। यह जंगल के अपने प्राकृतिक आवास में अक्सर खुले में बैठे होते हैं तथा ध्यान आकर्षित करने के लिए उच्च स्वर में कई ध्वनियां निकालते हैं, जिसमें कई पक्षियों की नकल करना सम्मिलित होता है। यह कहा जाता है कि इस प्रकार से नकल करने से कई प्रजाति के पक्षी समूह एक साथ चारा खोजने के लिए मिल जाते हैं। यह विशिष्टता वन के कई पक्षी समाजों में मिलती है जहां कीड़े खाने वाले कई प्रजातियों के पक्षी साथ में चारा ढूंढते हैं। यह भुजंगे पक्षी कभी-कभी झुण्ड में किसी अन्य पक्षी द्वारा पकडे गए अथवा निकाले गए कीट को चुरा लेते हैं। वे दिन के पक्षी हैं परन्तु सूर्योदय के पूर्व से लेकर देर शाम तक सक्रिय रहते हैं। अपने विस्तृत वितरण तथा क्षेत्रीय भिन्नताओं के कारण वे क्षेत्र के प्रभाव एवं अनुवांशिक अलगाव के कारण नयी प्रजातियों की उत्पत्ति के प्रमुख उदाहरण बन गए हैं।1948 Evolution in the Family Dicruridae (Birds) Evolution 2 3 238–265 10.2307/2405383 Mayr E. Vaurie C. 18884665 http://jstor.org/stable/2405383 7 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20181127111812/https://www.jstor.org/stable/2405383 27 नवंबर 2018 dead एशिया में अपनी सम्पूर्ण विविधता में यह सबसे बड़ी ड्रोंगो प्रजाति है तथा अपनी जालीदार पूंछ तथा चेहरे पर चोंच के ऊपर घुमावदार पंखों के कारण बड़ी आसानी से पहचानी जाती है। घूमी हुई जालियों के साथ इनकी पूंछ विशिष्ट है तथा पक्षी के उड़ने के दौरान यह ऐसी प्रतीत होती है कि जैसे किसी काले पक्षी का पीछा दो बड़ी मधुमक्खियां कर रही हों. पूर्वी हिमालय में, इस प्रजाति का भ्रम लेसर रैकेट-पूंछ ड्रोंगो से हो सकता है, जिसकी जालियां घुमावदार न होकर सीढ़ी होती हैं तथा चोंच के ऊपर के घुमावदार पंख नहीं पाए जाते हैं।Rasmussen PC & JC Anderton 2005 Birds of South Asia: The Ripley Guide. Volume 2 Smithsonian Institution & Lynx Edicions 592–593 इन व्यापक फैलाव वाली प्रजातियों की आबादी में कई अलग रूप और कई उप-प्रजातियां हैं, जिनका नामकरण किया जा चुका है। इसी नाम की प्रजाति दक्षिण भारत में मुख्यतः वन क्षेत्रों तथा पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला के साथ प्रायद्वीपीय भारत में पायी जाती है। श्रीलंका में पायी जाने वाली उप-प्रजाति का नाम सीलोनिकस (ceylonicus) होता है तथा वह इसी नाम की प्रजाति से मिलती जुलती होती है हालांकि इसका आकार थोड़ा छोटा होता है। हिमालय के पास पायी जाने वाली उप-प्रजाति ग्रैन्डिस है और यह सबसे बड़ी होती है और इसकी गर्दन में लंबी चमकदार कलगियां होती हैं। अंडमान द्वीप समूह में पायी जाने वाली प्रजाति ऑटिओसस (otiosus) के गर्दन की कलगियां छोटी होती हैं तथा क्रेस्ट बहुत छोटी होती हैं, जबकि निकोबार द्वीप समूह में पायी जाने वाली प्रजाति नीकोबारिएन्सिस (nicobariensis) के सामने की क्रेस्ट छोटी तथा औटीओसस की तुलना में छोटी गर्दन की कलगियां होती हैं। श्रीलंकाई लोफॉर्निस (lophorinus) को इस सुझाव के कारण उप-श्रेणी माना जाता है क्योंकि इनके द्वारा केयलोनिकस के साथ संकर नस्ल को नए वर्गीकरण के अनुसार उनकी मिलती-जुलती श्रेणियों के कारण अलग प्रजाति माना गया है।1980 Occurrence of Dicrurus paradiseus lophorhinus (Vieillot) in Goa (India) J. Bombay Nat. Hist. Soc. 77 3 511–112 Saha, Bhabesh Chandra Mukherjee, Ajit Kumar इसी नाम की प्रजाति को कभी-कभी भूलवश लोफॉर्निस समझ लिया जाता है।Ripley,S Dillon 1981 Occurrence of Dicrurus paradiseus lophorhinus (Vieillot) in Goa (India) - a comment J. Bombay Nat. Hist. Soc. 78 1 168–169 दक्षिणपूर्व एशिया के द्वीपों में चोंच के आकार, क्रेस्ट के फैलाव, कल्गियों तथा पूंछ के रैकेट के आकारों में व्यापक विभिन्नताएं पायी जाती हैं। बोरनियन ब्रैकिफोरस (=इन्सुलारिस), बंग्गाई के बैंग्वे में क्रेस्ट नहीं होते (बैंग्वे में सामने के पंख होते हैं जो आगे की और मुड़े होते हैं) जबकि मिक्रोलोफस में बहुत छोटे क्रेस्ट पाए जाते हैं (=एंडोमाइकस ; नाटुनस, अनाम्बस तथा टियोमंस) तथा पलात्युरस (सुमात्रा). दक्षिणपूर्व एशियाई द्वीपों तथा मुख्यभूमियों में कई रूप ज्ञात हैं जिनमें फॉर्मोसस (जावा), हाइपोबैलस (थाईलैंड), रंगूनेंसिस (उत्तरी बर्मा, प्रारंभ में मध्य भारतीय संख्या भी इसमें सम्मिलित थीं) तथा जोह्नी (हैनान).Vaurie, C 1949 A revision of the bird family Dicruridae Am. Mus. Nat. Hist. 93 203–342 http://hdl.handle.net/2246/1240 युवा पक्षी सुस्त होते हैं, तथा उनमें क्रेस्ट अनुपस्थित हो सकते हैं, जबकि निर्मोक पक्षियों की पूंछ में लम्बे धारा-प्रवाही का आभाव हो सकता है। रैकेट का निर्माण फलक के भीतर के संजाल द्वारा होता है लेकिन यह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे बाहरी संजाल पर हो क्योंकि मेरुदंड स्पैटुला के ऊपर से मुड़ा हुआ होता है।Ali, Salim 1929 The racket-feathers of Dissemurus paradiseus J. Bombay Nat. Hist. Soc. 33 3 709–710 वितरण और आवास इस प्रजाति का वितरण पश्चिमी हिमालय से पूर्वी हिमालय तथा मिश्मी पर्वत श्रृंखला, जो कि 4000 फीट नीचे तलहटी में है, तक फैला हुआ है। पश्चिम की ओर से जाने पर ये पूर्व में बोर्नियो द्वीप तथा जावा से लेकर सभी द्वीपों तथा मुख्यभूमियों में पाए जाते हैं। मुख्य रूप से वे जंगल में पाए जाते हैं।http://www.archive.org/stream/checklistofbirds151962pete#page/154/mode/2up/search/paradiseus Check-list of the birds of the world. Volume 15 1962 Peters, JL Museum of Comparative Zoology 154–156 7 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20121107070554/http://www.archive.org/stream/checklistofbirds151962pete#page/154/mode/2up/search/paradiseus 7 नवंबर 2012 liveAli S & SD Ripley 1986 Handbook of the birds of India and Pakistan 5 2 Oxford University Press 135–143 व्यवहार और पारिस्थितिकी thumb|left|बाहरी पूंछ के पंख के बढ़ने के साथ (पश्चिमी घाट, केरल) अन्य ड्रोंगो की तरह, ये मुख्य रूप से कीड़ों को खाते हैं परन्तु फल भी खाते हैं तथा फूल वाले पेड़ों पर ये नेक्टर की तलाश में भी जाते हैं। चूंकि इनके पैर छोटे होते हैं अतः ये सीधे बैठते हैं तथा अक्सर ये खुले में ऊंची टहनी पर बैठे दिखते हैं। ये आक्रामक होते हैं और कभी-कभी झुण्ड बना कर बड़े पक्षी पर भी आक्रमण कर देते हैं, विशेषकर घोंसले बनाने के समय. वे सांझ के समय में अक्सर अधिक सक्रिय रहते हैं। उनका स्वर काफी विविध होता है तथा इसमें नीरस बारम्बार की जाने वाली सीटियां, धात्विक तथा नासिका स्वर के साथ ही जटिल स्वर तथा दूसरे पक्षियों की नक़ल शामिल होते हैं। वे प्रातः 4 बजे से आवाजें निकालना प्रारंभ कर देते हैं जिनमें अक्सर धात्विक टुंक-टुंक-टुंक की श्रृंखला होती है।Neelakantan, KK 1972 On the Southern Racket-tailed Drongo Dicrurus paradiseus paradiseus (Linn.) J. Bombay Nat. Hist. Soc. 69 1 1–9 उनके पास अन्य पक्षियों की चेतावनी की ध्वनि की नक़ल करने की क्षमता होती है जिसे उन्होंने मिश्रित-प्रजाति के झुण्ड में सीखा होता है। यह काफी असामान्य है, जैसा कि पक्षियों की नक़ल करने की क्षमता के विषय में अभी तक काफी कम ज्ञान उपलब्ध है। अफ्रीकी ग्रे तोता के विषय में यह ज्ञात है कि वे मानव ध्वनि का अनुकरण करते हुए सही सन्दर्भ में बोल लेते हैं, परन्तु प्राकृतिक वातावरण में ये ऐसा नहीं करते हैं।Goodale E, Kotagama SW. 2006 http://eben.goodale.googlepages.com/RoyalSoc2006.pdf Context-dependent vocal mimicry in a passerine bird Proc. R. Soc. B 273 875–880 PDF 10.1098/rspb.2005.3392 16618682 Goodale E Kotagama SW 1588 1560225फ़रवरी 2023 InternetArchiveBot इस ड्रोंगो द्वारा अन्य प्रजातियों की चेतावनी की ध्वनि के संदर्भ को मानव के सीखने के क्रम से जोड़ कर देखा जा सकता है, जैसे कि मानव दूसरी भाषाओं के छोटे-छोटे वाक्यांश सीखने का प्रयास करते हैं। एक विशेष चेतावनी ध्वनि के रूप में वे शिकरा पक्षी की उपस्थिति जिसे लिखित में उच्च स्वर की क्वी-क्वी-क्वी...शी-कुकू-शीकुकू-शीकुकू-व्हाई! लिख सकते हैं। वे शिकारी पक्षी की नक़ल करके अन्य पक्षियों को चेतावनी देते हैं जिससे कि इस भय की स्थिति में उनका शिकार चुरा कर खा सकें.Bourdillon, T. F. 1903 The birds of Travancore J. Bombay Nat. Hist. Soc. 15 3 455S. Harsha K. Satischandra, Prasanna Kodituwakku, Sarath W. Kotagama, and Eben Goodale Assessing "false" alarm calls by a drongo (Dicrurus paradiseus) in mixed-species bird flocks Behavioral Ecology 2010 10.1093/beheco/arp203 21 396–403 इन्हें ऐसी प्रजातियों की आवाज निकालने के लिए भी जाना जाता है (ये अपना शरीर फुला कर जंगल बैबलर की तरह सिर व शरीर हिलाते हैं) जो कि बैबलर की तरहDaniel,JC 1966 Behaviour mimicry by the Large Racket-tailed Drongo [Drongo paradiseus (Linnaeus)] J. Bombay Nat. Hist. Soc. 63 2 443 मिश्रित प्रजाति के झुण्ड के सदस्य होते हैं और ऐसा माना जाता है कि ऐसा मिश्रित प्रजाति के झुण्ड का हिस्सा बन्ने के लिए किया जाता है।Vocal mimicry by a passerine bird attracts other species involved in mixed-species flocks Goodale, E & S. Kotagama Animal Behaviour 2006 72 471–477 10.1016/j.anbehav.2006.02.004 http://eben.goodale.googlepages.com/AnimalBehaviour2006.pdf PDF 7 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20081217160358/http://eben.goodale.googlepages.com/AnimalBehaviour2006.pdf 17 दिसंबर 2008 dead कुछ स्थानों में वे मिश्रित-प्रजाति के झुंडों में दूसरे के पकड़े शिकार को खाने वाले (क्लेप्टोपैरासाईटिक) भी माने जाते हैं, विशेष रूप से लॉफिंगथ्रश का, परन्तु वे उनसे पारस्परिक तथा सहभोजी सम्बन्ध भी रखते हैं।King, DI & JH Rappole 2001 Kleptoparasitism of laughingthrushes Garrulax by Greater Racket-tailed Drongos Dicrurus paradiseus in Myanmar Forktail 17 121–122 http://www.orientalbirdclub.org/publications/forktail/17pdfs/King-Laughingthrushes.pdf PDF 7 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20081011022907/http://www.orientalbirdclub.org/publications/forktail/17pdfs/King-Laughingthrushes.pdf 11 अक्तूबर 2008 dead 2007 The benefits of joining mixed-species flocks for Greater Racket-tailed Drongos Dicrurus paradiseus Forktail 23 145–148 http://eben.goodale.googlepages.com/Forktail_2007.pdf PDF Harsha, S K Satischandra, EP Kudavidanageफ़रवरी 2023 InternetArchiveBot Goodale, E. & Kotagama, S.W. 2008 Response to conspecific and heterospecific alarm calls in mixed-species bird flocks of a Sri Lankan rainforest Behavioral Ecology 19 4 887–894 10.1093/beheco/arn045 कई पर्यवेक्षकों ने देखा है कि ये ड्रोंगो चारा खोजने वाले कठफोड़वे से सम्बन्ध रखते हैं,Possible association between the Large Yellownaped Woodpecker (Picus flavinucha) and the Large Racket-tailed Drongo (Dissemurus paradiseus) 941–942 50 4 J. Bombay Nat. Hist. Soc. Bates, RSP 1952Styring, AR & Kalan Ickes 2001 Interactions between the Greater Racket-tailed Drongo Dicrurus paradiseus and woodpeckers in a lowland Malaysian rainforest Forktail 17 119–120 http://www.orientalbirdclub.org/publications/forktail/17pdfs/Styring-Drongo.pdf PDF 7 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20081123034527/http://www.orientalbirdclub.org/publications/forktail/17pdfs/Styring-Drongo.pdf 23 नवंबर 2008 dead Johnson,JM 1975 The Racket Tailed Drongo - Dicrurus paradiseus behaviour of imitating the call of the Great Black Wood-pecker, Dryocopus javensis in Mudumalai Sanctuary Indian Forester 98 7 449–451 तथा ऐसी रिपोर्टें हैं इन्होने कि इन्होंने बंदरों के दल का पीछा भी किया है।Ganesh,T 1992 A silent association J. Bombay Nat. Hist. Soc. 89 3 374 Incorrectly notes species as remifer ग्रेटर रैकेट-पूंछ ड्रोंगो अपनी पूर्ण सीमा में प्रजनक रहते हैं। भारत में प्रजनन का मौसम अगस्त-अप्रैल है। अपनी प्रणय निवेदन में उन्हें खेल की इच्छा से कूदते तथा शाखाओं पर घूमते तथा किसी वस्तु को गिरा कर हवा में ही उसको पकड़ते देखा जाता है। उनका कप रुपी घोंसला किसी पेड़ की शाखा में बनाया जाता है तथा इसमें आमतौर पर तीन से चार अंडे दिए जाते हैं। अंडे क्रीम श्वेत रंग के होते हैं जिसमें लाल-भूरे से धब्बे होते हैं, जो कि चौड़े छोर पर अधिक घने होते हैं।Whistler, Hugh 160–161 Popular handbook of Indian Birds. Fourth edition. 1949 Gurney and Jackson, London संस्कृति में सामान्य सीटी का स्वर जो ये निकालते हैं इनके स्थानीय नाम का कारण बनता है, भारत के कई भागों में इन्हें कोतवाल कहते हैं (जिसका अर्थ है "पुलिसवाला" अथवा "चौकीदार", जो अपनी सीटी से मिलता-जुलता स्वर निकालता है), अन्य स्थानों में काले ड्रोंगो पर एक अन्य नाम लागू होता है भीमराज अथवा भृंगराज .Vernacular Names of the Birds of the Indian Subcontinent Buceros Anonymous 1998 3 1 http://www.bnhsenvis.nic.in/pdf/vol%203%20(1).pdf PDF 53–109 7 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20100401015111/http://www.bnhsenvis.nic.in/pdf/vol%203%20(1).pdf 1 अप्रैल 2010 dead भारत में 1950 के दशक से पहले अक्सर लोगों के द्वारा इसे पिंजरे में रखा जाता था। इसे बहुत दृढ़ माना जाता है तथा किसी कौवे की तरह किसी भी प्रकार के आहार पर रह लेता है।Finn, Frank 1900 On a new species of Bhimraj (Dissemurus), with some observations on the so-called family Dicruridae J. Bombay Nat. Hist. Soc. 13 2 377–378http://www.archive.org/stream/birdsofcalcutta00finnrich#page/32/mode/2up The Birds of Calcutta Finn, Frank 1904 Thacker, Spink & Co, Calcutta 32 7 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20110629044347/http://www.archive.org/stream/birdsofcalcutta00finnrich#page/32/mode/2up 29 जून 2011 live इन्हें भी देखें कालकलाची डिक्रूरिडाए पासरीफ़ोर्मीज़ बाहरी कड़ियाँ इंटरनेट बर्ड संग्रह सन्दर्भ श्रेणी:भुजंगा श्रेणी:भारत के पक्षी श्रेणी:एशिया के पक्षी श्रेणी:बांग्लादेश के पक्षी श्रेणी:श्रीलंका के पक्षी श्रेणी:इंडोनेशिया के पक्षी श्रेणी:चीन के पक्षी श्रेणी:1766 में जानवर वर्णित