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भोगेश्वरी फुकननी
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भोगेश्वरी फुकननी (Bhogeswari Phukanani)
भोगेश्वरी फुकननी (1872 – 20 सितंबर 1942) असम की एक वीरांगना और स्वतंत्रता सेनानी थीं। उन्हें असम में श्रद्धा से '६० वर्षीय शहीद' के रूप में याद किया जाता है। 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के मान की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए थे।
प्रारंभिक जीवन एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
भोगेश्वरी फुकननी का जन्म 1872 में असम के नगाँव (Nowgong) जिले के बरहामपुर क्षेत्र में हुआ था।
उनका विवाह भोगेश्वर फुकन से हुआ था। वे एक साधारण गृहिणी थीं और उनके छह बेटे और दो बेटियाँ थीं।
एक बड़े परिवार की जिम्मेदारियाँ सँभालते हुए भी वे सामाजिक गतिविधियों में रुचि रखती थीं।
जब महात्मा गांधी के आह्वान पर आज़ादी की लहर असम पहुँची, तो उन्होंने अपने बच्चों के साथ-साथ खुद को भी पूरी तरह राष्ट्रीय आंदोलन में समर्पित कर दिया।
स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी
1942 में महात्मा गांधी ने जब 'करो या मरो' का नारा दिया, तब भोगेश्वरी फुकननी अपने क्षेत्र में महिलाओं को संगठित करने लगीं:
उन्होंने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, खादी के प्रचार और शराब बंदी अभियानों का नेतृत्व किया।
वे अहिंसक प्रदर्शनों में ग्रामीणों को आगे लाने और युवाओं में देशभक्ति की अलख जगाने में हमेशा आगे रहती थीं।
18 सितंबर 1942: बरहामपुर की ऐतिहासिक घटना
18 सितंबर 1942 को नगाँव जिले के बरहामपुर में स्थानीय कांग्रेस कार्यालय को ब्रिटिश पुलिस द्वारा सील कर दिया गया था। ग्रामीणों और सत्याग्रहियों ने उस कार्यालय को पुनः अपने नियंत्रण में लेने का निश्चय किया।
शांतिपूर्ण उत्सव और जुलूस: कार्यालय को मुक्त कराने के उपलक्ष्य में एक शांतिपूर्ण सभा और भोज का आयोजन हुआ। इसके बाद तिरंगे के साथ एक विजय जुलूस निकाला गया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और ग्रामीण शामिल थे।
ब्रिटिश पुलिस का हस्तक्षेप: ब्रिटिश सेना के कैप्टन फिंच (Captain Finch) के नेतृत्व में पुलिस बल वहाँ आ धमका और उसने जुलूस को रोकने की कोशिश की।
ध्वज का अपमान और प्रतिरोध: कैप्टन फिंच ने आगे बढ़कर एक युवा सत्याग्रही (भोगेश्वरी की पोती/साथी रत्नावती) के हाथ से तिरंगा छीनने का प्रयास किया और झंडे को जमीन पर गिरा दिया।
अदम्य साहस: 60 वर्ष की आयु में भोगेश्वरी फुकननी यह अपमान सहन न कर सकीं। वे तुरंत आगे बढ़ीं और हाथ में ली हुई लाठी (या झंडे के डंडे) से सीधे ब्रिटिश सैन्य अधिकारी कैप्टन फिंच पर प्रहार कर दिया।
शहादत
अपने ऊपर हुए हमले से बौखलाकर कैप्टन फिंच ने तुरंत रिवॉल्वर निकाली और भोगेश्वरी फुकननी पर बेहद करीब से गोली चला दी।
गोली लगने के बाद वे गंभीर रूप से घायल होकर गिर पड़ीं।
उन्हें तुरंत चिकित्सा सहायता नहीं मिल सकी और ब्रिटिश पुलिस के पहरे के बीच 20 सितंबर 1942 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
उसी दिन असम के गोहपुर में कनकलता बरुआ और मुकुंद काकोटी भी शहीद हुए थे, जिससे 20 सितंबर का दिन असम के इतिहास में अमर हो गया।
विरासत और सम्मान
असम सरकार और स्थानीय संगठनों द्वारा नगाँव के बरहामपुर में भोगेश्वरी फुकननी की स्मृति में स्मारक बनाया गया है।
गुवाहाटी और नगाँव में कई शैक्षणिक संस्थानों, सड़कों और बालिका छात्रावासों का नाम उनके नाम पर रखा गया है।
उन्हें असम के स्वतंत्रता संग्राम में मातृत्व और अदम्य साहस के अनूठे प्रतीक के रूप में देखा जाता है।