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411 समाचार
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त्रिलोचन शास्त्री

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वासुदेव सिंह त्रिलोचन thumb|Trilochan Shastri with his student Dr. Lalit Mohan 170px त्रिलोचन शास्त्री त्रिलोचन शास्त्री 20 अगस्त, 1917 ग्राम- व पोस्ट- कटघरा चिरानी पट्टी, तहसील- कादीपुर सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश, भारत 9 दिसंबर, 2007 death_placeगाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत भारतीय हिन्दी आधुनिक काल गद्य और पद्य गीत, नवगीत, कविता, कहानी, लेख प्रगतिशील धारा यथार्थवाद धरती कविता संग्रह अमोला कवि त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है। वे आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के तीन स्तंभों में से एक थे। इस त्रयी के अन्य दो सतंभ नागार्जुन व केदारनाथ अग्रवाल थे। http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/12/071209_trilochan_death.shtml नहीं रहे जनपदीय कवि त्रिलोचन 10 दिसंबर 2007 एसएचटीएमएल बीबीसी https://web.archive.org/web/20071210102614/http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/12/071209_trilochan_death.shtml 10 दिसंबर 2007 live जीवन परिचय उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कटघरा चिरानी पट्टी में जगरदेव सिंह के घर 20 अगस्त 1917 को जन्मे त्रिलोचन शास्त्री का मूल नाम वासुदेव सिंह था। http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/trilochan/index.htm त्रिलोचन 10 दिसंबर 2007 एचटीएम अनुभूति https://web.archive.org/web/20071219034226/http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/trilochan/index.htm 19 दिसंबर 2007 dead उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए. अंग्रेजी की एवं लाहौर से संस्कृत में शास्त्री की उपाधि प्राप्त की थी। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के छोटे से गांव से बनारस विश्वविद्यालय तक अपने सफर में उन्होंने दर्जनों पुस्तकें लिखीं और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। शास्त्री बाजारवाद के धुर विरोधी थे। हालांकि उन्होंने हिंदी में प्रयोगधर्मिता का समर्थन किया। उनका कहना था, भाषा में जितने प्रयोग होंगे वह उतनी ही समृद्ध होगी। शास्त्री ने हमेशा ही नवसृजन को बढ़ावा दिया। वह नए लेखकों के लिए उत्प्रेरक थे। सागर के मुक्तिबोध स्रजन पीठ पर भी वे कुछ साल रहे। 9 दिसम्बर 2007 को ग़ाजियाबाद में उनका निधन हो गया। http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_3975094/ कवि त्रिलोचन शास्त्री नहीं रहे 10 दिसंबर 2007 जागरण याहूजून 2020 InternetArchiveBot कार्यक्षेत्र त्रिलोचन शास्त्री हिंदी के अतिरिक्त अरबी और फारसी भाषाओं के निष्णात ज्ञाता माने जाते थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी वे खासे सक्रिय रहे है। उन्होंने प्रभाकर, वानर, हंस, आज, समाज जैसी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। त्रिलोचन शास्त्री 1995 से 2001 तक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा वाराणसी के ज्ञानमंडल प्रकाशन संस्था में भी काम करते रहे और हिंदी व उर्दू के कई शब्दकोषों की योजना से भी जुडे़ रहे। उन्हें हिंदी सॉनेट का साधक माना जाता है। उन्होंने इस छंद को भारतीय परिवेश में ढाला और लगभग 550 सॉनेट की रचना की। http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2005/05/050504_trilochan_poet.shtml हिंदी सॉनेट के शिखर पुरुष 10 दिसंबर 2007 एसएचटीएमएल बीबीसी https://web.archive.org/web/20080113061906/http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2005/05/050504_trilochan_poet.shtml 13 जनवरी 2008 live इसके अतिरिक्त कहानी, गीत, ग़ज़ल और आलोचना से भी उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनका पहला कविता संग्रह धरती 1945 में प्रकाशित हुआ था। गुलाब और बुलबुल, उस जनपद का कवि हूं और ताप के ताए हुये दिन उनके चर्चित कविता संग्रह थे। दिगंत और धरती जैसी रचनाओं को कलमबद्ध करने वाले त्रिलोचन शास्त्री के 17 कविता संग्रह प्रकाशित हुए। समालोचना त्रिलोचन की काव्यगत विशेषताएँ त्रिलोचन ने भाषा शैली और विषयवस्तु सभी में अपनी अलग छाप छोड़ी। त्रिलोचन ने वही लिखा जो कमज़ोर के पक्ष में था। वो मेहनतकश और दबे कुचले समाज की एक दूर से आती आवाज़ थे। उनकी कविता भारत के ग्राम और देहात समाज के उस निम्न वर्ग को संबोधित थी जो कहीं दबा था कही जग रहा था कहीं संकोच में पड़ा था। उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है नंगा है अनजान है कला नहीं जानता कैसी होती है वह क्या है वह नहीं मानता http://www2.dw-world.de/hindi/Welt/1.231388.1.html त्रिलोचन शास्त्री नहीं रहे 10 दिसंबर 2007 एचटीएमएल डॉयशेवेलेजून 2020 InternetArchiveBot त्रिलोचन ने लोक भाषा अवधी और प्राचीन संस्कृत से प्रेरणा ली, इसलिए उनकी विशिष्टता हिंदी कविता की परंपरागत धारा से जुड़ी हुई है। मजेदार बात यह है कि अपनी परंपरा से इतने नजदीक से जुड़े रहने के कारण ही उनमें आधुनिकता की सुंदरता और सुवास थी। प्रगतिशील धारा के कवि होने के कारण त्रिलोचन मार्क्सवादी चेतना से संपन्न कवि थे, लेकिन इस चेतना का उपयोग उन्होंने अपने ढंग से किया। प्रकट रूप में उनकी कविताएं वाम विचारधारा के बारे में उस तरह नहीं कहतीं, जिस तरह नागार्जुन या केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं कहती हैं। त्रिलोचन के भीतर विचारों को लेकर कोई बड़बोलापन भी नहीं था। उनके लेखन में एक विश्वास हर जगह तैरता था कि परिवर्तन की क्रांतिकारी भूमिका जनता ही निभाएगी। http://www2.dw-world.de/hindi/Welt/1.231388.1.html त्रिलोचन शास्त्री नहीं रहे 10 दिसंबर 2007 एचटीएमएल डॉयशेवेलेजून 2020 InternetArchiveBot वैसे तो उन्होंने गीत, गजल, सॉनेट, कुंडलियां, बरवै, मुक्त छंद जैसे कविता के तमाम माध्यमों में लिखा, लेकिन सॉनेट (चतुष्पदी) के कारण वह ज्यादा जाने गए। वह आधुनिक हिंदी कविता में सॉनेट के जन्मदाता थे। हिंदी में सॉनेट को विजातीय माना जाता था। लेकिन त्रिलोचन ने इसका भारतीयकरण किया। इसके लिए उन्होंने रोला छंद को आधार बनाया तथा बोलचाल की भाषा और लय का प्रयोग करते हुए चतुष्पदी को लोकरंग में रंगने का काम किया। इस छंद में उन्होंने जितनी रचनाएं कीं, संभवत: स्पेंसर, मिल्टन और शेक्सपीयर जैसे कवियों ने भी नहीं कीं। सॉनेट के जितने भी रूप-भेद साहित्य में किए गए हैं, उन सभी को त्रिलोचन ने आजमाया। http://www.amarujala.com/Aakhar/detail.asp?section_id=1&id=652 वयोवृद्ध कवि त्रिलोचन शास्त्री नहीं रहे 10 दिसंबर 2007 एएसपी अमर उजाला https://web.archive.org/web/20071213081426/http://www.amarujala.com/Aakhar/detail.asp?section_id=1&id=652 13 दिसंबर 2007 dead पुरस्कार व सम्मान त्रिलोचन शास्त्री को 1989-90 में हिंदी अकादमी ने शलाका सम्मान से सम्मानित किया था। हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हे 'शास्त्री' और 'साहित्य रत्न' जैसे उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है। 1982 में ताप के ताए हुए दिन के लिए उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला था। http://www.rashtriyasahara.com/NewsDetailFrame.aspx?newsid=45060 वयोवृद्ध कवि त्रिलोचन शास्त्री नहीं रहे 10 दिसंबर 2007 राष्ट्रीय सहारा https://web.archive.org/web/20071211114443/http://www.rashtriyasahara.com/NewsDetailFrame.aspx?newsid=45060 11 दिसंबर 2007 dead इसके अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी समिति पुरस्कार, हिंदी संस्थान सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, शलाका सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र राष्ट्रीय पुरस्कार, सुलभ साहित्य अकादमी सम्मान, भारतीय भाषा परिषद सम्मान आदि से भी सम्मानित किया गया था। http://www.amarujala.com/Aakhar/detail.asp?section_id=1&id=652 वयोवृद्ध कवि त्रिलोचन शास्त्री नहीं रहे 10 दिसंबर 2007 अमर उजाला https://web.archive.org/web/20071213081426/http://www.amarujala.com/Aakhar/detail.asp?section_id=1&id=652 13 दिसंबर 2007 dead प्रकाशित कृतियाँ कविता संग्रह- धरती(1945), गुलाब और बुलबुल(1956), दिगंत(1957), ताप के ताए हुए दिन(1980), शब्द(1980), उस जनपद का कवि हूँ (1981) अरधान (1984), तुम्हें सौंपता हूँ(1985), मेरा घर, चैती, अनकहनी भी कुछ कहनी है, जीने की कला(2004) संपादित- मुक्तिबोध की कविताएँ कहानी संग्रह- देशकाल डायरी- दैनंदिनी सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ त्रिलोचन की कहानी अभिव्यक्ति में त्रिलोचन की रचनाएँ कविता कोश में त्रिलोचन की रचनाएँ अनुभूति में त्रिलोचन का कुछ ही दिन पूर्व लिया गया वीडियो साहित्यकार उदय प्रकाश के चिट्ठे पर श्रेणी:प्रगतिशील कवि श्रेणी:साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी भाषा के साहित्यकार श्रेणी:शलाका सम्मान