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411 समाचार
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उत्तर प्रदेश के लोकनृत्य

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लोकनृत्य में उत्तर प्रदेश के प्रत्येक अंचल की अपनी विशिष्ट पहचान है। समृद्ध विरासत की विविधता को संजोये हुए ये आंगिक कलारूप लोक संस्कृति के प्रमुख वाहक हैं। ख़्याल नृत्य ख़्याल नृत्य पुत्र जन्मोत्सव पर बुंदेलखण्ड में किया जाता है। इसमें रंगीन कागजों तथा बाँसों की सहायता से मंदिर बनाकर फिर उसे सिर पर रखकर नृत्य किया जाता है।http://www.indiaheritage.org/perform/dance/dup.htm संग्रहीत प्रति 1 जून 2012 https://web.archive.org/web/20130704151826/http://www.indiaheritage.org/perform/dance/dup.htm 4 जुलाई 2013 dead रास नृत्य रास नृत्य ब्रज में रासलीला के दौरान किया जाता है। रासक दण्ड नृत्य भी इसी क्षेत्र का एक आकर्षक नृत्य है। http://www.dancesofindia.co.in/folk-dances-india/uttar-pradesh/ संग्रहीत प्रति 1 जून 2012 https://web.archive.org/web/20120615003259/http://www.dancesofindia.co.in/folk-dances-india/uttar-pradesh/ 15 जून 2012 dead झूला नृत्य झूला नृत्य भी ब्रज क्षेत्र का नृत्य है, जिसका आयोजन श्रावण मास में किया जाता है। इस नृत्य को इस क्षेत्र के मंदिरों में बड़े उल्लास के साथ किया जाता है। मयूर नृत्य मयूर नृत्य भी ब्रज क्षेत्र का ही नृत्य है। इसमें नर्तक मोर के पंख से बने विशेष वस्त्र धारण करते हैं। धोबिया नृत्य धोबिया नृत्य पूर्वांचल में प्रचलित है। यह नृत्य धोबी समुदाय द्वारा किया जाता है। इसके माध्यम से धोबी एवं गदहे के मध्य आजीविका संबंधों का भावप्रवण निरूपण किया जाता है। धोबी जाति द्वारा मृदंग, रणसिंगा, झांझ, डेढ़ताल, घुँघरू, घंटी बजाकर नाचा जाने वाला यह नृत्य जिस उत्सव में नहीं होता, उस उत्सव को अधूरा माना जाता है। सर पर पगड़ी, कमर में फेंटा, पावों में घुँघरू, हातों में करताल के साथ कलाकारों के बीच काठ का सजा घोडा ठुमुक- ठुमुक नाचने लगता है तो गायक-नर्तक भी उसी के साथ झूम उठता है। टेरी, गीत, चुटकुले के रंग, साज के संग यह एक अनोखा नृत्य है। चरकुला नृत्य चरकुला नृत्य ब्रज क्षेत्रवासियों द्वारा किया जाता है। इस घड़ा नृत्य में बैलगाड़ी अथवा रथ के पहिये पर कई घड़े रखे जाते हैं फिर उन्हें सिर पर रखकर नृत्य किया जाता है। तेल के दीपक अपने सिर पर महिलाएं रख कर नाचती है कठघोड़वा नृत्य कठघोड़वा नृत्य नृत्य पूर्वांचल में माँगलिक अवसरों पर किया जाता है। इसमें एक नर्तक अन्य नर्तकों के घेरे के अंदर कृत्रिम घोड़ी पर बैठकर नृत्य करता है। जोगिनी नृत्य जोगिनी नृत्य विशेषकर रामनवमी के अवसर पर किया जाता है। इसके अंतर्गत साधु या कोई अन्य पुरुष महिला का रूप धारण करके नृत्य करते हैं। ये नृत्‍य अवध में किया जाता है꫰ धींवर नृत्य धींवर नृत्य अनेक शुभ अवसरों पर विशेषकर कहार जाति के लोगों द्वारा आयोजित किया जाता है। शौरा नृत्य शौरा या सैरा नृत्य बुंदेलखण्ड के कृषक अपनी फसलों को काटते समय हर्ष प्रकट करने के उद्देश्य से करते हैं। कर्मा नृत्य कर्मा व शीला नृत्य सोनभद्र और मिर्जापुर के खरवार आदिवासी समूह द्वारा आयोजित किया जाता है। पासी नृत्य पासी नृत्य पासी जाति के लोगों द्वारा सात अलग अलग मुद्राओं की एक गति तथा एक ही लय में युद्ध की भाँति किया जाता है। घोड़ा नृत्य घोड़ा नृत्य बुंदेलखण्ड में माँगलिक अवसरों पर बाजों की धुन पर घोड़ों द्वारा करवाया जाता है। धुरिया नृत्य धुरिया नृत्य को बुंदेलखण्ड के प्रजापति (कुम्हार) स्त्री वेश धारण करके करते हैं। छोलिया नृत्य छोलिया नृत्य छोलिया नृत्य राजपूत जाति के लोगों द्वारा विवाहोत्सव पर किया जाता है। इसे करते समय नर्तकों के एक हाथ में तलवार तथा दूसरे हाथ में ढाल होती है। छपेली नृत्य छपेली नृत्य एक हाथ में रुमाल तथा दूसरे हाथ में दर्पण लेकर किया जाता है। इस के माध्यम से नर्तक आध्यात्मिक समुन्नति की कामना करते हैं। नटवरी नृत्य नटवरी नृत्य पूर्वांचल क्षेत्र के अहीरों द्वारा किया जाता है। यह नृत्य गीत व नक्कारे के सुरों पर किया जाता है। देवी नृत्य देवी नृत्य अधिकांशतः बुंदेलखण्ड में ही प्रचलित है। इस लोक नृत्य में एक नर्तक देवी का स्वरूप धारण कर अन्य नर्तकों के सामने खड़ा रहता है तथा उसके सम्मुख शेष सभी नर्तक नृत्य करते हैं। राई नृत्य राई नृत्य बुंदेलखण्ड की महिलाओं द्वारा किया जाता है। यहाँ की महिलाएँ इस नृत्य को विशेषतः श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर करती हैं। इसको मयूर की भाँति किया जाता है, इसीलिेए यह मयूर नृत्य भी कहलाता है। दीप नृत्य बुंदेलखण्ड के अहीरों द्वारा अनेकानेक दीपकों को प्रज्वलित कर किसी घड़े, कलश अथवा थाल में रखकर प्रज्वलित दीपकों को सिर पर रखकर दीप नृत्य किया जाता है। पाई डण्डा नृत्य पाई डण्डा नृत्य गुजरात के डाण्डिया नृत्य के समान है जो कि बुंदेलखण्ड के अहीरों द्वारा किया जाता है। कार्तिक नृत्य कार्तिक नृत्य बुंदेलखण्ड क्षेत्र में कार्तिक माह में नर्तकों द्वारा श्रीकृष्ण तथा गोपियों का रूप धरकर किया जाता है। कलाबाज नृत्य कलाबाज नृत्य अवध क्षेत्र के नर्तकों द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में नर्तक मोरबाजा लेकर कच्ची घोड़ी पर बैठ कर नृत्य करते हैं। मोरपंख व दीवारी नृत्य ब्रज की लट्ठमार होली की तरह बुंदेलखण्ड विशेषकर चित्रकूट में दीपावली के दिन ढोल-नगाड़े की तान पर आकर्षक वेशभूषा के साथ मोरपंखधारी लठैत एक दूसरे पर ताबड़तोड़ वार करते हुए मोरपंख व दीवारी नृ्त्य व खेल का प्रदर्शन करते हैं। ठडिया नृत्य सोनभद्र व पड़ोसी जिलों में संतान की कामना पूरी होने पर ठडिया नृ्त्य का आयोजन सरस्वती के चरणों समर्पित होकर किया किया जाता है। चौलर नृत्य मिर्जापुर और सोनभद्र आदि जिलों में चौलर नृत्य अच्छी वर्षा तथा अच्छी फसल की कामना पूर्ति हेतु किया जाता है। ढेढ़िया नृत्य ढेढ़िया नृत्य का प्रचलन दो-आब क्षेत्र में है, जो प्रमुखतः फ़तेहपुर ज़िले में प्रचलित है। राम के लंका विजय के पश्चात वापस आने पर स्वागत में किया जाता है। इसमें सिरपर छिद्रयुक्त मिट्टी के बर्तन में दीपक रखकर किया जाता है। ढरकहरी नृत्य सोनभद्र की जनजातियों द्वारा ढरकहरी नृत्य का आयोजन किया जाता है। सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ भारत की विरासत भारत के लोकनृत्य "उत्तरप्रदेश के सभी लोक नृत्य की सूचि" श्रेणी:उत्तर प्रदेश के नृत्य श्रेणी:उत्तर प्रदेश श्रेणी:लोक नृत्य