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411 समाचार
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यूहन्ना का सुसमाचार

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यूहन्ना का सुसमाचार JRL19060215 (cropped).jpg ईसाई धर्म पारंपरिक रूप से यूहन्ना प्रेरित 90–100 ईस्वी कोइने ग्रीक 21 अध्याय 879 यूहन्ना का सुसमाचार ईसाई धर्म के पवित्र ग्रंथ बाइबल के 'नए नियम' का चौथा विहित सुसमाचार है। यह यीशु मसीह के जीवन, उनकी शिक्षाओं, मृत्यु और पुनरुत्थान का एक विस्तृत और प्रतीकात्मक विवरण प्रस्तुत करता है। इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य यह स्थापित करना है कि यीशु ही मसीहा और परमेश्वर के पुत्र हैं, और उन पर विश्वास करने से मनुष्य को शाश्वत जीवन प्राप्त होता है। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इसे 90 से 100 ईस्वी के बीच लिखा गया था। संरचना और सामग्री इस सुसमाचार को मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में बांटा गया है: चिह्नों की पुस्तक: इसमें यीशु के सात प्रमुख चमत्कारों (जैसे पानी को दाखमधु में बदलना, और लाजर को मृत अवस्था से जीवित करना) का वर्णन है, जो उनकी ईश्वरीय शक्ति को प्रमाणित करते हैं। महिमा की पुस्तक: इसमें यीशु के जीवन के अंतिम सप्ताह, उनके शिष्यों के साथ अंतिम भोजन, क्रूस पर मृत्यु और पुनरुत्थान का गहन वर्णन है। धर्मशास्त्र और विचार यूहन्ना का सुसमाचार अपनी उच्च 'क्रिस्टोलॉजी' के लिए जाना जाता है। इसमें यीशु को स्पष्ट रूप से ईश्वर के रूप में दर्शाया गया है: लोगोस: ग्रंथ की शुरुआत में यीशु को 'वचन' कहा गया है, जो सृष्टि के आरंभ से ही ईश्वर के साथ था और स्वयं ईश्वर था। "मैं हूँ" के कथन: यीशु स्वयं को सात बार "मैं हूँ" कहकर संबोधित करते हैं (जैसे: "मैं जीवन की रोटी हूँ", "मैं जगत की ज्योति हूँ")। यह पुराने नियम में ईश्वर द्वारा बताए गए नाम को दर्शाता है। अन्य सुसमाचारों से तुलना इसमें दृष्टांतों और दुष्टात्माओं को निकालने का कोई उल्लेख नहीं है। अन्य सुसमाचारों में यीशु का प्रचार एक वर्ष का प्रतीत होता है, जबकि यूहन्ना में यह तीन साल (तीन फसह के त्योहार) तक चलता है। इसमें यीशु के जन्म या वंशावली का विवरण नहीं है, बल्कि उन्हें ब्रह्मांडीय और ईश्वरीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। मुख्य संदर्भ तथ्य 1. रचना काल: अधिकांश आधुनिक विद्वान मानते हैं कि यह सुसमाचार 90 से 100 ईस्वी के बीच लिखा गया था। 2. लेखक: हालांकि पारंपरिक रूप से इसे यूहन्ना प्रेरित द्वारा लिखा माना जाता है, ग्रंथ स्वयं को "उस शिष्य जिसे यीशु प्रेम करते थे" की गवाही पर आधारित बताता है। 3. प्रमुख विषय: इसका मुख्य विषय यीशु को परमेश्वर के 'वचन' के रूप में स्थापित करना है। 4. विशिष्टता: यह अन्य तीन सुसमाचारों की तुलना में बहुत अधिक दार्शनिक और प्रतीकात्मक है। 5. ऐतिहासिक प्रामाणिकता: यद्यपि इसे मुख्य रूप से एक धर्मशास्त्रीय ग्रंथ माना जाता है, आधुनिक विद्वान इसे ऐतिहासिक यीशु को समझने के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्रोत मानते हैं। इन्हें भी देखें बाइबल नया नियम ईसाई धर्म यीशु श्रेणी:ईसाई धर्म