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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन-रियो,क्योटो,बाली

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चित्र:Ravi9.jpg कोपेनहेगेन सम्मेलन, रियो डि जेनेरियो में धरती की सेहत पर शुरू हुई गंभीर विचार-विमर्श की प्रकिया में ही, एक ताज़ा पहल है। ब्राज़ील में 1992 में हुए रियो पृथ्वी सम्मेलन में पर्यावरण की रक्षा के लिए एक संधि पर सहमति बनी जिसे 'युनाइटेड नेशन्स फ़्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज' या यूएनएफ़सीसीसी कहते हैं। कोपेनहेगेन सम्मेलन का औपचारिक नाम है- यूएनएफ़सीसीसी में शामिल पक्षों का 15वाँ सम्मेलन, या संक्षेप में- कॉप15। रियो और कोपेनहेगेन के बीच दो महत्वपूर्ण पड़ाव थे- 1997 में जापान के क्योटो और 2007 में इंडोनेशिया के बाली में आयोजित जलवायु सम्मेलन। क्योटो और बाली में भी रियो में बनी सहमित के अनुरूप कदम उठाने की कोशिशें की गईं। विचार-विर्मश के पश्चात रियो में यह सहमति बनी कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए ज़िम्मेवार गैसों गैसों की मात्रा को इस हद तक सीमित की जाए कि जलवायु परिवर्तन मानव नियंत्रण से पूरी तरह बाहर नहीं हो जाय। ग्लोबल वार्मिंग के लिए ज़िम्मेवार माने जाने वाले गैसों को हरितगृह गैस कहते हैं। इनमें मुख्य रूप से चार गैस- कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और सल्फ़र हेक्साफ़्लोराइड, तथा दो गैस-समूह- हाइड्रोफ़्लोरोकार्बन और परफ़्लोरोकार्बन शामिल हैं। हालाँकि मुख्य चिंता कार्बन डाइऑक्साइड गैस या कार्बन को लेकर है क्योंकि इसकी तुलना में अन्य हरितगृह गैसों की मात्रा बहुत ही कम है। क्योटो से आगे का रास्ता दो साल पहले बाली सम्मेलन में तय हुआ था कि ग्लोबल वार्मिंग के ख़िलाफ़ प्रभावी और दीर्घकालिक उपायों पर सहमति बनाई जाएगी। इसके लिए दिया गया वक़्त कोपेनहेगेन सम्मेलन के साथ ही ख़त्म होने वाला है। कोपेनहेगेन सम्मेलन का एक तात्कालिक उद्देश्य भी है- क्योटो जलवायु संधि के बाद की संधि पर सहमति बनाना। क्योंकि क्योटो संधि की अवधि 2012 में ख़त्म हो रही है। क्योटो में 1997 में हुई संधि की मुख्य बात ये थी, कि औद्योगीकृत देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से ५.२ प्रतिशत कम करेंगे। क्योटो संधि बाध्यकारी नहीं थी और अमरीका ने इस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे। इसलिए इससे ज़्यादा उम्मीदें लगाई भी नहीं गई थीं। फिर भी अधिकतर औद्योगीकृत देशों ने क्योटो संधि की मूल भावना के अनुरूप कुछ-न-कुछ क़दम ज़रूर उठाए। यानि क्योटो संधि कारगर भले ही न हुई हो, जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय आम सहमति बनाने की दिशा में वो एक महत्वपूर्ण पड़ाव ज़रूर साबित हुई है। कोपेनहेगेन के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में कोशिश, क्योटो संधि से कहीं ज़्यादा महत्वाकांक्षी संधि पर सहमति बनाने की है जो कि क़ानूनन बाध्यकारी भी हो। इन्हें भी देखें जलवायु परिवर्तन सम्मेलन उष्णकटिबंधीय वर्षा-वन श्रेणी:जलवायु परिवर्तन श्रेणी:पर्यावरण सम्मेलन