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स्वामीनारायण मंदिर, जूनागढ़
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स्वामीनारायण मंदिर,जूनागढ़ गुजरात के गिरनार पर्वत की तलहटी में स्थित मंदिर है। जिसका निर्माण स्वयं भगवान श्रीस्वामीनारायण करवा कर अपने स्वहस्तों से देवप्रतिष्ठा की थी। स्वयं भगवान के द्वारा निर्मित होने के कारण यह मंदिर स्वामीनारायण संप्रदाय के छह सर्वोच्च तीर्थधाम में से एक है।
श्रीस्वामिनारायण मन्दिर, जूनागढ़ Shri Swaminarayan Mandir, Junagadh
thumb Location in Gujarat भारत गुजरात जूनागढ़ जूनागढ़ भगवान स्वामीनारायण सिद्धेश्वर महादेव स्वामीनारायण जयंती स्वामीनारायणीय १ मई,१८८१ भगवान स्वामिनारायण http://www.swaminarayanmandirjunagadh.com/
इस मंदिर में स्थित हरिकृष्ण महाराज (भगवान स्वामीनारायण का किशोर स्वरूप) तथा सिद्धेश्वर महादेव के चमत्कारिक विग्रहों की मन्नत रखने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं । जूनागढ़ का स्वामीनारायण मंदिर आध्यात्मिकता, भक्ति और स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो आज भी अपने गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है।
इतिहास
इस मंदिर का निर्माण भगवान स्वामीनारायण की इच्छा पर हुआ था। इस मंदिर के लिए जमीन [[जूनागढ़] के तत्कालीन राजा, हेमंतसिंह (जिनाभाई, पंचला के दरबार) ने दान में दी थी, जिनकी स्मृति को आज भी यहाँ सहेज कर रखा गया है।
आधारशिला: इस मंदिर की नींव 10 मई 1826 को गुणातीतानंद स्वामी, गोपालानंद स्वामी और अन्य वरिष्ठ संतों की उपस्थिति में रखी थी।
निर्माण: मंदिर का निर्माण कार्य सद्गुरु ब्रह्मानंद स्वामी ने किया। यह मंदिर राजस्थान के गुलाबी पत्थरों से बना है। इसकी वास्तुकला बेहद भव्य है, जिसमें पांच गुंबद और कई मूर्तियाँ हैं। मंदिर का घेरा 278 फीट का है, और इसका शांत और आध्यात्मिक वातावरण भक्तों को आकर्षित करता है। की देखरेख में पूरा हुआ।
देवता
मंदिर में मुख्य रूप से तीन प्रमुख गर्भगृह हैं:
मुख्य गर्भगृह: यहाँ श्रीराधारमण देव और भगवान स्वामीनारायण की मूर्तियाँ स्थापित हैं।
thumb| भगवान स्वामीनारायण तथा राधारमण देव
पूर्वी गर्भगृह: यहाँ श्रीनरनारायण देव और श्री लक्ष्मी-नारायण की मूर्तियां हैं।
पश्चिमी गर्भगृह: यहाँ श्री सिद्धेश्वर महादेव, पार्वती, गणेश और नंदीश्वर की मूर्तियां हैं। यह विशेषता दर्शाती है कि मंदिर वैष्णव और शैव संप्रदायों के बीच सद्भाव का प्रतीक है।
भगवान स्वामीनारायण ने इस मंदिर के पहले महंत (धार्मिक और प्रशासनिक प्रमुख) के रूप में गुणातीतानंद स्वामी को नियुक्त किया था, जिन्होंने 40 वर्षों से अधिक समय तक इस पद पर सेवा की।
प्रतिष्ठा: 1 मई, 1828 को स्वयं भगवान स्वामीनारायण ने इस मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा कर के अपने ऐश्वर्य को इन मूर्तियों में स्थापित किया । मान्यताओं के अनुसार यह चमत्कारिक मूर्तियां सभी दुखों को हर लेती हैं और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं।