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संसार
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दाएँ|अंगूठाकार|340x340पिक्सेल|बौद्ध धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत के अनुसार, चक्र में सचित्र साँसार के चक्र का वर्णन करने वाला भावचक्र अस्तित्व के छह क्षेत्र हैं जिनमें एक संवेदनशील प्राणी पुनर्जन्म ले सकता है। यम, मृत्यु के देवता, बाहरी किनारे के शीर्ष पर हैं। बाहरी किनारे बारह निदाना सिद्धांत को दर्शाता है।
संसार (Saṃsāra) एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ ‘भ्रमण’ के साथ-साथ ‘लोक’ भी होता है। इस शब्द में ‘चक्राकार परिवर्तन’ का भाव निहित है, अथवा साधारणतया कहें तो ‘लगातार चक्कर काटते रहने’ का अर्थ। संसार को ‘पुनर्जन्म’, ‘कर्मचक्र’, ‘पुनरजाति’ अथवा ‘निरर्थक भटकाव, भ्रमण या सांसारिक अस्तित्व का चक्र’ जैसे पदों से सम्बोधित किया जाता है। जब इसे कर्मसिद्धांत से जोड़ा जाता है, तब यह मृत्युमरण और पुनर्जन्म का चक्र दर्शाता है।Mark Juergensmeyer Wade Clark Roof 2011 271–72https://archive.org/details/buddhismafterpat00gros Buddhism After Patriarchy: A Feminist History, Analysis, and Reconstruction of Buddhism Rita M. Gross State University of New York Press 1993 978-1-4384-0513-1 148 registration
“सभी जीवन, पदार्थ और अस्तित्व की चक्रीयता” अधिकांश भारतीय धर्मों का मूलभूत विश्वास है। संसार की अवधारणा का मूल वैदिक परंपरा पश्चात् साहित्य में पाया जाता है; स्वयं वेदों में इस सिद्धांत का उल्लेख नहीं मिलता। प्रारंभिक उपनिषदों में यह परिपक्व रूप में, यद्यपि यांत्रिक विवरणों के बिना, प्रकट होती है। संसार के मत का पूर्ण विवेचन प्राचीन बौद्ध धर्म और जैन धर्म में, तथा विभिन्न हिंदू दार्शनिक विद्यालयों में मिलता है। संसार का सिद्धांत हिंदू धर्म के कर्मसिद्धांत से जुड़ा हुआ है, और संसार से मुक्ति प्राप्ति भारतीय परंपराओं की आध्यात्मिक खोज का केंद्र रही है, साथ ही उनके अंतर्विरोधों का भी विषय बनी रही है। संसार से मुक्ति को मोक्ष, निर्वाण, मुक्ति या कैवल्य कहते हैं। Vedic Cosmology and Ethics: Selected Studies Bodewitz Henk Brill Publishers 2019 978-90-04-40013-9 Heilijgers Dory H. Gonda Indological Studies 19 Leiden and Boston 3–19 Chapter 1 – The Hindu Doctrine of Transmigration: Its Origin and Background 10.1163/9789004400139_002 1382-3442 Houben Jan E. M. van Kooij Karel freehttps://books.google.com/books?id=pYNXC-HK1u0C Dying, Death and Bereavement in a British Hindu Community Shirley Firth Peeters Publishers 1997 978-90-6831-976-7 106, 29–43Michael Myers 2013 36Harold Coward 2008 103
संसार की व्युत्पत्ति और शब्दावली
संसार का अर्थ ‘भ्रमण’ के साथ-साथ ‘लोक’ भी होता है, जिसमें ‘चक्राकार परिवर्तन’ का भाव निहित है। संसार, जो सभी भारतीय धर्मों में एक मूलभूत अवधारणा है, कर्मसिद्धांत से जुड़ा हुआ है और इसका तात्पर्य यह विश्वास है कि सभी जीव लगातार जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से गुज़रते रहते हैं। इस शब्द का संबंध “अनुक्रमिक अस्तित्व का चक्र”, “पुनर्जन्म”, “कर्मचक्र”, “जीवनचक्र का पहिया” और “सभी जीवन, पदार्थ एवं अस्तित्व की चक्रीयता” जैसी अभिव्यक्तियों से है। अनेक विद्वानों की रचनाओं में ‘संसार’ को ‘सम्सारा’ रूप में भी लिखा जाता है। https://archive.org/details/buddhismafterpat00gros Buddhism After Patriarchy: A Feminist History, Analysis, and Reconstruction of Buddhism Rita M. Gross State University of New York Press 1993 978-1-4384-0513-1 148 registrationJeaneane D. Fowler 1997 10
मोनियर-विलियम्स के अनुसार, संसार शब्द सृ धातु के साथ सं उपसर्ग से निर्मित सं-सृ (संसृ) से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है “परिक्रमण करना, अविरल विभिन्न अवस्थाओं से गुज़रना, किसी ओर प्राप्ति की ओर अग्रसर होना, चक्र में गतिशील होना।” इसी मूल से निर्मित एक नामरूप प्राचीन ग्रंथों में ‘संसरण’ के रूप में पाया जाता है, जिसका अर्थ है “विभिन्न अवस्थाओं में निरन्तर भ्रमण करना—जीवों और जगत का जन्म तथा पुनर्जन्म—बिना किसी विघ्न के।” इसी मूल से एक अन्य नामरूप ‘संसार’ भी है, जो “संसारिक अवस्थाओं के माध्यम से निरन्तर यात्रा, पुनर्जन्म, शरीर से शरीर में विचरण, एक नश्वर जीवन जिसमें जन्म, वृद्धि, क्षय एवं पुनर्मृत्यु का अनवरत क्रम शामिल है” की व्याप्ति को सूचित करता है। संसार को मोक्ष (जिसे मुक्ति, निर्वाण या कैवल्य भी कहते हैं) के विपरीत माना जाता है; मोक्ष का अर्थ है जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना। https://books.google.com/books?id=pYNXC-HK1u0C Dying, Death and Bereavement in a British Hindu Community Shirley Firth Peeters Publishers 1997 978-90-6831-976-7 106, 29–43https://books.google.com/books?id=_3NWAAAAcAAJ&pg=PA1040 A Sanskrit-English Dictionary Monier Monier-Williams Oxford University Press 1923 1040–41
संसार की अवधारणा वैदिक-परंपरा पश्चात् विकसित हुई और इसका संकेत ऋग्वेद के संहिता-स्तर के खंड १.१६४, ४.५५, ६.७० तथा १०.१४ में मिलता है। यद्यपि संहिता-स्तर में इस विचार का केवल आंशिक उल्लेख है तथा वहाँ स्पष्ट विवेचन नहीं मिलता, फिर भी यह विचार प्रारंभिक उपनिषदों में पूर्णतः विकसित रूप से प्रकट होता है। डेमियन कियौन के अनुसार, “चक्राकार जन्म और मृत्यु” की धारणा लगभग ईसा पूर्व ८०० के आसपास उत्पन्न हुई थी। ‘संसार’ शब्द ‘मोक्ष’ के साथ कई प्रमुख उपनिषदों में भी मिलता है, जैसे कि कथोपनिषद् के श्लोक १.३.७ में, श्वेताश्वतरोपनिषद् के श्लोक ६.१६ में तथा मैत्री उपनिषद् के श्लोक १.४ और ६.३४ में। Katha Upanishad प्रथमोध्यायः/तृतीयवल्ली https://web.archive.org/web/20200808211535/https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A4%A0%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A4%A6%E0%A4%A4%E0%A5%8D/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80 8 August 2020 WikisourceShvetashvatara Upanishad षष्ठः अध्यायः https://web.archive.org/web/20201026155809/https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A4%A4%E0%A5%8D/%E0%A4%B7%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%83_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 26 October 2020 WikisourceMaitri Upanishad https://web.archive.org/web/20201121174210/https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A4%A4%E0%A5%8D 21 November 2020 Wikisource, Quote: ३ चित्तमेव हि संसारम् तत्प्रयत्नेन शोधयेत्
संसार शब्द का संबंध ‘संश्रिति’ से है, जो “संसारिक अस्तित्व की धारा, पुनर्जन्म, प्रवाह या परिक्रमा” को सूचित करता है।https://books.google.com/books?id=_3NWAAAAcAAJ&pg=PA1040 A Sanskrit-English Dictionary Monier Monier-Williams Oxford University Press 1923 1040–41
परिभाषा एवं तर्क
शब्द का शाब्दिक अर्थ “परिक्रमण करते हुए बहते रहने का” होता है, जैसा कि स्टीफन जे. लौमाकिस कहते हैं—यानि “बिना उद्देश्य एवं बिना दिशा के भ्रमण”। संसार की संकल्पना इस विश्वास से गहराई से जुड़ी है कि व्यक्ति विभिन्न लोकों और रूपों में बारम्बार जन्म और पुनर्जन्म लेता रहता है।2014-02-27
वैदिक साहित्य की प्रारंभिक परतों में जीवन की अवधारणा के बाद परलोक में स्वर्ग या नरक में जीवन की कल्पना की जाती है, जो संचयी पुण्य या दोष के आधार पर निर्धारित होती है। किन्तु प्राचीन वैदिक ऋषियों ने इस परलोक की परिकल्पना को अत्यंत सरलीकृत मानकर अस्वीकार किया, क्योंकि मनुष्य समान रूप से सदाचारी या अधम नहीं रहता। सामान्यतः सदाचारी जीवनों के बीच भी कुछ लोग अधिक सदाचारी होते हैं, और अधर्म के भी भिन्न-भिन्न स्तर होते हैं। ग्रंथों में कहा गया है कि यदि यमदेव भिन्न-भिन्न स्तरों पर प्राप्त पुण्य या पाप के आधार पर “या तो” के एकमात्र नियम से और असमान रूप में निर्णय करेंगे तथा फल प्रदान करेंगे, तो वह अन्याय होगा। अतः ऋषियों ने यह विचार प्रस्तुत किया कि परलोक में स्वर्ग या नरक की स्थिति व्यक्ति के पुण्य-दोष के अनुपात में होनी चाहिए, और जब वह अनुपात समाप्त हो जाए, तब वह व्यक्ति वापस धरती पर आकर पुनः जन्म ले। यह विचार प्राचीन और मध्यकालीन ग्रंथों में जीवन, मृत्यु, पुनर्जन्म और पुनर्मृत्यु के चक्र के रूप में प्रकट होता है, जैसे महाभारत के अष्टम पर्व (६.३१) और देवीभागवत पुराण (६.१०) में।
इतिहास
पुनर्जन्म या पुनरुजाति की अवधारणा का ऐतिहासिक मूल अस्पष्ट है, पर यह विचार ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी में भारत और प्राचीन ग्रीस के ग्रंथों में प्रकट होता है। संसार की परिकल्पना का संकेत ऋग्वेद जैसे उत्तर वैदिक ग्रंथों में मिलता है, किन्तु वहाँ प्रत्यक्ष सिद्धांत उपस्थित नहीं है। सायर्स के अनुसार, वैदिक साहित्य की प्रारंभिक परतों में पूर्वज-पूजा और श्रद्धा (पूर्वजों को अन्न अर्पित करना) जैसे संस्कार दिखायी देते हैं। पश्चात् वैदिक ग्रंथ, जैसे कि अरण्यक और उपनिषद्, पुनर्जन्म पर आधारित भिन्न उद्धारतन्त्र प्रस्तुत करते हैं; ये ग्रंथ पूर्वजा-विधियों के प्रति कम रुचि रखते हुए पहले किए गए संस्कारों की दार्शनिक व्याख्या आरंभ करते हैं, यद्यपि विचार वहाँ पूर्णतः विकसित नहीं होता। प्रारंभिक उपनिषदों में ये विचार अधिक परिपक्व रूप से प्रकट होते हैं, परन्तु वहाँ भी यांत्रिक विवरण नहीं मिलता। विस्तृत सिद्धांत मध्य प्रथम सहस्राब्दी ईसा पूर्व के निकट विविध परंपराओं—बौद्ध धर्म, जैन धर्म, तथा विभिन्न हिंदू दार्शनिक विद्यालयों—में विशिष्ट स्वरूपों के साथ विकसित हुए। प्राचीन काल में किसने किस पर प्रभाव डाला, इसका प्रमाण नगण्य एवं अनुमानात्मक है; अतः ऐसा संभव है कि संसार-सिद्धांतों का ऐतिहासिक विकास विभिन्न परंपराओं में समानांतर रूप से, परस्पर प्रभाव के साथ हुआ हो। https://archive.org/details/bub_gb_4WZTj3M71y0C Karma and Rebirth in Classical Indian Traditions Wendy Doniger University of California Press 1980 978-0-520-03923-0 xvii–xviii; Quote: "There was such constant interaction between Vedism and Buddhism in the early period that it is fruitless to attempt to sort out the earlier source of many doctrines, they lived in one another's pockets, like Picasso and Braque (who were, in later years, unable to say which of them had painted certain paintings from their earlier, shared period)."
पुनर्मृत्यु: पुनः मृत्यु
यद्यपि संसार को सामान्यतः जीवात्मा (जीव) के पुनर्जन्म (पुनरजन्म) के रूप में वर्णित किया जाता है, परन्तु इस विचार का कालानुक्रमिक विकास मानव अस्तित्व की वास्तविक प्रकृति तथा क्या मनुष्य केवल एक बार ही मृत होता है—इस प्रश्न से आरंभ हुआ। इसी विचारधारा से पहले “पुनर्मृत्यु” और “पुनरावृत्ति” की अवधारणाएँ जन्मीं। प्रारंभिक विचारों के अनुसार मानव अस्तित्व में दो वास्तविकताएँ सम्मिलित हैं: एक अपरिवर्तनीय आत्मा (अक्षय आत्मन्), जो किसी प्रकार से परमानंद और अविनाशी ब्रह्म से सम्बद्ध होती है, और दूसरी वह विषय (शरीर) है जो माया के रूप में सदा परिवर्तनशील रहता है। वैदिक दार्शनिक अटकलों में पुनर्मृत्यु उस सुखद वर्षों के अंत का प्रतीक थी जिन्हें स्वर्ग (स्वर्गलोक) में बिताया जाता था, और उसके पश्चात् पुनः भौतिक लोक में जन्म होता था। संसार इस प्रकार अस्तित्व की एक मौलिक सिद्धान्त के रूप में विकसित हुआ, जो सभी भारतीय धर्मों में साझा था। Obeyesekere 1980 139–40
जॉन बोकर के अनुसार, मानव रूप में पुनर्जन्म को तब “मोक्ष—राहत प्राप्त करने—के लिए दुर्लभ अवसर” के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रत्येक भारतीय आध्यात्मिक परंपरा ने आत्मिक मुक्ति (मोक्ष) के लिए अपने-अपने मार्ग (मार्ग या योग) और पूर्वधारणाएँ विकसित कीं, जिनमें कुछ ने “जीवन्मुक्ति” (इस जीवन में मुक्ति और स्वतंत्रता) के विचार को जन्म दिया, और अन्य ने “विधेमुक्ति” (परलोक में मुक्ति और स्वतंत्रता) पर संतोष किया। John Bowker 2014 84–85Gerhard Oberhammer (1994), La Délivrance dès cette vie: Jivanmukti, Collège de France, Publications de l'Institut de Civilisation Indienne. Série in-8°, Fasc. 61, Édition–Diffusion de Boccard (Paris), 978-2868030610, pp. 1–9Paul Deussen, 2h0YAAAAYAAJ The philosophy of the Upanishads, pp. 356–57
प्रथम सत्य
प्रथम सत्य, दुःख (पाली: दुक्ख; संस्कृत: दुःख),
पुनर्जन्म के क्षेत्र में अस्तित्व का स्वभाव है,
जिसे संसार (शाब्दिक अर्थ “भ्रमण”) कहा जाता है। —चार आर्य सत्य, डोनाल्ड लोपेज़Four Noble Truths, Buddhist philosophy https://web.archive.org/web/20160422075712/https://www.britannica.com/topic/Four-Noble-Truths 22 April 2016 , Donald Lopez, Encyclopædia BritannicaRobert E. Buswell Jr. Donald S. Lopez Jr. The Princeton Dictionary of Buddhism https://books.google.com/books?id=DXN2AAAAQBAJ 2013 Princeton University Press 978-1-4008-4805-8 304–05 #ffd068 right
श्रमण परंपराएँ (बौद्ध और जैन धर्म) ने लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास नवीन विचार प्रस्तुत किए। इन परंपराओं ने बड़े परिप्रेक्ष्य में मानवीय दुःख पर विशेष ध्यान केंद्रित किया, और पुनर्जन्म, पुनर्मृत्यु तथा पीड़ा की सच्चाई को धार्मिक जीवन का मूल एवं प्रारंभ माना। श्रमणों के अनुसार संसार एक निरादि चक्रीय प्रक्रिया है, जिसमें प्रत्येक जन्म और मृत्यु उस प्रक्रिया में विराम चिन्ह के समान है, और आध्यात्मिक मुक्ति को पुनर्जन्म एवं पुनर्मृत्यु से मुक्ति के रूप में देखा गया। इन धर्मों में संसारिक पुनर्जन्म और पुनर्मृत्यु के विचारों को विभिन्न नामों से समझाया गया है, जैसे कि बौद्ध धर्म के प्रारंभिक पालि सूत्रों में ‘आगतिगति’ शब्द का प्रयोग।
विचारों का विकास
विभिन्न धर्मों में, संसार-सिद्धांतों के विकास के क्रम में भिन्न-भिन्न मोक्षतन्त्रों पर बल दिया गया। उदाहरणतः, ओबेयसेकेरे के अनुसार, हिन्दू परंपराओं ने आत्मा (आत्मन्) के अस्तित्व को स्वीकार कर इसे प्रत्येक जीव की अपरिवर्तनीय सार के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि बौद्ध परंपराओं ने आत्मा की उपस्थिति को नकारते हुए अनात्म (आत्महीनता) की संकल्पना विकसित की। हिन्दू परंपराओं में मोक्ष (मुक्ति) की व्याख्या आत्मा एवं ब्रह्म (सर्वव्यापी वास्तविकता) की अवधारणाओं के माध्यम से की गई, जबकि बौद्ध धर्म में निर्वाण को अनात्म एवं शून्यता (शून्यत्व) के माध्यम से समझाया गया। Moksha https://web.archive.org/web/20201025105212/https://berkleycenter.georgetown.edu/essays/moksha 25 October 2020, Georgetown UniversityStephen J. Laumakis 2008 68–70, 125–28, 149–53, 168–76https://archive.org/details/buddhisminterfai0000abem Buddhism and Interfaith Dialogue Masao Abe Steven Heine University of Hawaii Press 1995 978-0-8248-1752-7 7–8, 73–78 registrationLoy David 1982 Enlightenment in Buddhism and Advaita Vedanta: Are Nirvana and Moksha the Same? https://archive.org/details/sim_international-philosophical-quarterly_1982-03_22_1/page/64 International Philosophical Quarterly 22 1 65–74 10.5840/ipq19822217
आजीविका परंपरा ने संसार संबंधी सिद्धांतों को इस आधार पर गढ़ा कि स्वतंत्र इच्छा (स्वेच्छा) का अभाव है, जबकि जैन परंपरा ने आत्मा (‘जीव’) और स्वतंत्र इच्छा को स्वीकारते हुए संसार के बन्धन से मुक्ति के साधन के रूप में तपस्या तथा कर्मत्याग को महत्त्वपूर्ण माना। हिन्दू और बौद्ध धर्म की विभिन्न उप-परंपराओं ने स्वतंत्र इच्छा को स्वीकारा, कठोर तपस्या से परहेज़ करते हुए, त्याग और सन्यास को अंगीकार किया, तथा असली अस्तित्व की प्रकृति की अनुभूति के माध्यम से मुक्ति के अपने-अपने मार्ग विकसित किए। https://archive.org/details/bub_gb_4WZTj3M71y0C Karma and Rebirth in Classical Indian Traditions George L Jart III University of California Press 1980 978-0-520-03923-0 Wendy Doniger 131–33
हिंदू धर्म में
right Meerabai (crop).jpg 165 भक्ति Bronze figure of Kashmiri in Meditation by Malvina Hoffman Wellcome M0005215.jpg 160 ध्यान संसार से मुक्ति, जिसे मोक्ष कहा जाता है, हिंदू धर्म में अंतिम लक्ष्य माना जाता है।
हिन्दू धर्म में संसार को आत्मा (Ātman) की यात्रा समझा जाता है। शरीर मर जाता है, पर आत्मा मृत्यु के अधीन नहीं होती, क्योंकि आत्मा अनन्त सत्य, अविनाशी और परमानंद स्वरूप है। समस्त सृष्टि एक-दूसरे में अंतर्निहित है, चक्रीय है और दो तत्वों से मिलकर बनी है: आत्मा (आत्मन्) और शरीर अथवा पदार्थ। यह अनन्त आत्मा, जिसे आत्मन् कहा जाता है, फिर कभी जन्म नहीं लेती; हिन्दू विश्वासानुसार आत्मा कभी नहीं बदलती और बदल भी नहीं सकती। इसके विपरीत शरीर और व्यक्तित्व में परिवर्तन होता रहता है, ये जन्मते हैं और मरते हैं। वर्तमान कर्मों का प्रभाव इस जीवन की परिस्थितियों के साथ-साथ भविष्य के जन्मों और उन जीवों के रूप या लोकों पर भी पड़ता है। श्रेष्ठ संकल्प और उत्तम कर्म अच्छे भविष्य के निर्माण में सहायक होते हैं, जबकि अधम संकल्प और दुष्ट कर्मों से दुर्दैवपूर्ण भविष्य बनता है। संसार की यात्रा आत्मा को प्रत्येक जन्म में सकारात्मक या नकारात्मक कर्म करने का अवसर देती है, ताकि वह आध्यात्मिक प्रयत्न करके मोक्ष प्राप्त कर सके। Moksha and the Hindu World View Mishra R.C SAGE Publications 2013 22–24 English
हिन्दुओं का मानना है कि धर्मशील जीवन और धर्मानुकूल कर्में व्यक्ति के इस जीवन या आने-वाले जन्मों में श्रेष्ठ फल प्रदान करते हैं। भक्ति, कर्म, ज्ञान, या राजयोग के मार्ग द्वारा आत्मा का उद्धार, अर्थात् मोक्ष, इस यात्रा का लक्ष्य है।http://www.bbc.co.uk/religion/religions/hinduism/concepts/concepts_1.shtml Hindu concepts Flood Gavin 2009-08-24 BBC Online BBC https://web.archive.org/web/20140411171600/http://www.bbc.co.uk/religion/religions/hinduism/concepts/concepts_1.shtml 2014-04-11 2015-07-31https://books.google.com/books?id=HLZMAgAAQBAJ The Bloomsbury Companion to New Religious Movements George D. Chryssides Benjamin E. Zeller Bloomsbury Academic 2014 978-1-4411-9829-7 333
उपनिषद्, जो हिन्दू धर्मग्रंथों का महत्वपूर्ण अंश हैं, मुख्यतः आत्मा को संसार से मुक्त करने पर केंद्रित हैं। भगवद्गीता में मोक्ष प्राप्ति के लिए विविध मार्गों का विवेचन किया गया है। जैसा कि प्रख्यात विद्वान हारोल्ड कॉवर्ड ने कहा है, उपनिषद् मानव स्वभाव की परिपूर्णता के प्रति बहुत आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, और इन ग्रन्थों में मानव प्रयास का लक्ष्य आत्म-परिपूर्णता तथा आत्म-ज्ञान की सतत यात्रा है, जिससे अन्ततः संसार समाप्त हो सके। उपनिषदिक परंपराओं में आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य अपना वास्तविक स्व (आत्मा) आत्मावलोकन के माध्यम से खोजना और आत्म-ज्ञान प्राप्त करना है, क्योंकि ऐसा होने पर मोक्ष की सुखद एवं स्वतंत्र अवस्था प्राप्त होती है। Harold Coward 2008 129, 130–55
हिन्दू परंपराओं में भिन्नताएँ
सभी हिन्दू परंपराएँ संसार की अवधारणा को स्वीकारती हैं, परन्तु वे विवरणों में भिन्न हैं तथा यह भी अलग-अलग बताती हैं कि संसार से मुक्ति की स्थिति क्या होगी। संसार को निरंतर परिवर्तनशील जगत में पुनर्जन्म का चक्र माना गया है, जहाँ माया (भ्रमित दृश्य) अस्थायी है और ब्रह्म वह सत्य है जो कभी नष्ट या परिवर्तित नहीं होता। मोक्ष वह अवस्था है जिसमें आत्मा ब्रह्म का बोध कर लेती है और संसार के चक्र से स्वतन्त्र हो जाती है। Moksha https://web.archive.org/web/20201025105212/https://berkleycenter.georgetown.edu/essays/moksha 25 October 2020, Georgetown Universityhttps://books.google.com/books?id=QeRIP-TuKLAC The Essentials of Indian Philosophy M. Hiriyanna Motilal Banarsidass 1995 978-81-208-1330-4 24–25, 160–66
द्वैताद्वैत मत आदि उपविधाएँ:
द्वैताद्वैत मत के द्वैतवादात्मक भक्तिवाद की परंपराएँ, जैसे माध्वाचार्य का द्वैत वेदांत, अधिष्ठित निमित्त हैं; इनके अनुसार व्यक्ति का आत्मा और परमात्मा (विश्णु, कृष्ण) दो पृथक् वास्तविकताएँ हैं। इनकी दृष्टि में केवल विश्णु के प्रति प्रेमपूर्वक भक्ति द्वारा ही संसार से विमोचन (मोक्ष) सम्भव है, और मोक्ष केवल विश्णु की कृपा से ही प्राप्त होता है। इनके यहाँ मोक्ष केवल परलोक में (विधेमुक्ति) हासिल हो सकता है।
इसके उलट, अद्वैत वेदांत की परंपराएँ, जैसे आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत, आध्यात्मिक एकात्मता (एकाध्यात्मवाद) पर आधारित हैं। इनके अनुसार आत्मा (आत्मन्) और ब्रह्म दोनों एक ही हैं; केवल अज्ञान, तृष्णा और जड़ता के कारण ही व्यक्ति संसाराराधन में दु:खी होता है। वास्तव में कोई द्वैत नहीं है—ध्यान और आत्म-ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग हैं। जब व्यक्ति आत्मा और ब्रह्म के एक ही होने का बोध कर लेता है, तब वह जीवनमुक्ति की अवस्था प्राप्त कर लेता है, अर्थात् मोक्ष इस जीवन में ही संभव है।Loy David 1982 Enlightenment in Buddhism and Advaita Vedanta: Are Nirvana and Moksha the Same? https://archive.org/details/sim_international-philosophical-quarterly_1982-03_22_1/page/64 International Philosophical Quarterly 22 1 65–74 10.5840/ipq19822217Loy, David (1982). "Enlightenment in Buddhism and Advaita Vedanta: Are Nirvana and Moksha the Same?". International Philosophical Quarterly. 22 (1): 65–74. doi:10.5840/ipq19822217.Jeaneane D. Fowler 2002 238–40, 243–45, 249–50, 261–63, 279–84
जैन धर्म में
अंगूठाकार|जैन धर्म के श्री महावीरजी मंदिर में सासरा का प्रतीकात्मक चित्रण।
जैन धर्म में संसार और कर्म का मत उसके वैचारिक आधार का केन्द्रीय अंग हैं, जैसा कि जैन सम्प्रदायों के प्राचीन से मौजूदा विस्तृत साहित्य से स्पष्ट होता है। जैन दृष्टि में संसार निरन्तर पुनर्जन्मों और दुखों से युक्त सांसारिक जीवन का चक्र है। Jaini 1980 226–28https://books.google.com/books?id=X8iAAgAAQBAJ The Jains Paul Dundas Routledge 2003 978-0415266055 14–16, 102–05https://books.google.com/books?id=QYdlKv8wBiYC Ahimsā, Anekānta, and Jainism Tara Sethia Motilal Banarsidass 2004 978-81-208-2036-4 30–31
जैन परंपराओं की संसार-निर्मिति अन्य भारतीय धर्मों से भिन्न है। उदाहरणतः जैनों के यहाँ आत्मा (जीव) का अस्तित्व सत्य माना गया है—वहीं हिन्दू परंपराओं में भी आत्मा स्वीकृत है, पर बौद्ध परंपराओं में आत्मा की कल्पना नहीं। जैन मतानुसार संसार या पुनर्जन्मों का चक्र यहाँ निश्चित आरंभ और अंत दोनों रखता है। Jaini 1980 226
आत्मा अपनी यात्रा एक आदिभूत अवस्था में आरंभ करती है, और संसार के चक्र में निरंतर विकसित होती रहती है। कुछ आत्माएँ उच्चतर अवस्थाओं तक विकसित होती हैं, जबकि कुछ पतित भी होती हैं; यह सारा विकास कर्म के आधार पर चलता है। जैन परंपराओं में अभाव्य नामक आत्मा का एक वर्ग माना गया है, जो कभी मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता। अभाव्य अवस्था में प्रवेश हेतु कोई व्यक्ति जान-बूझकर अत्यन्त दुष्ट कर्म करता है। https://books.google.com/books?id=X8iAAgAAQBAJ The Jains Paul Dundas Routledge 2003 978-0415266055 104–05
जैन मतानुसार प्रत्येक आत्मा संसार में ८४,००,००० प्रकार के जन्म-परिस्थितियों से गुजरती है। जैसे-जैसे आत्मा चक्र में आगे बढ़ती है, उसके शरीर पाँच प्रकार के होते हैं—पृथ्वी-देह, जल-देह, अग्नि-देह, वायु-देह और वनस्पति-जीव। जब भी वर्षा होती है, कृषि की जाती है, भोजन किया जाता है या श्वास ली जाती है, सूक्ष्मजीव जन्म और मृत्युपर्यन्त स्थित होते हैं। जैन धर्म में किसी भी जीव को, चाहे वह मानव हो या सूक्ष्मजीव, पीड़ा पहुँचाना या मारना पाप माना जाता है और उससे आत्मा के संसार चक्र में नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।Jaini 1980 224–25https://books.google.com/books?id=QYdlKv8wBiYC Ahimsā, Anekānta, and Jainism Tara Sethia Motilal Banarsidass 2004 978-81-208-2036-4 30–31Tara Sethia (2004). Ahimsā, Anekānta, and Jainism. Motilal Banarsidass. pp. 30–31. ISBN 978-81-208-2036-4.
जैन धर्म में मुक्त आत्मा वे हैं जो संसार के चक्र से परे पहुँच चुके हैं, ब्रह्मगृह (सिद्धलोक) पर पहुंच चुके हैं, सर्वज्ञानी हो चुके हैं और वहाँ अनन्तकाल पूरक होते हैं; इन्हें सिद्ध कहा जाता है। पुरुष मानव को मोक्ष-योग का निकटतम रूप माना जाता है, विशेषतः तपस्या के माध्यम से। महिला को मोक्ष के योग्य बनने के लिए प्रथम पुण्य-संचय करना आवश्यक होता है ताकि वह पुनर्जन्म में पुरुष रूप धारण कर सके; तभी वह मोक्ष प्राप्त कर सकती है, खासकर दिगंबर सम्प्रदाय में। किन्तु ऐतिहासिक रूप से जैन धर्म के भीतर इस पर विविध मत प्रचलित रहे हैं; श्वेतांबर सम्प्रदाय के अनुसार महिलाएँ भी सीधें मोक्षप्राप्ति कर सकती हैं।https://books.google.com/books?id=wrTsCwAAQBAJ&pg=PT182 Religions in Focus: New Approaches to Tradition and Contemporary Practices Graham Harvey Routledge 2016 978-1-134-93690-8 182–83https://books.google.com/books?id=X8iAAgAAQBAJ The Jains Paul Dundas Routledge 2003 978-0415266055 55–59
इसके विपरीत बौद्ध और हिन्दू ग्रंथों में जहाँ पादपों और सूक्ष्मजीवों को क्षति पहुँचाना स्पष्ट रूप से वर्जित नहीं है, वहीं जैन ग्रंथ इसे कायर्य और दुष्कर्म मानते हैं। पादपों तथा सूक्ष्मजीवों को हानि पहुँचाने पर भी आत्मा का संसार चक्र प्रभावित होता है।Lambert Schmithausen (1991), Buddhism and Nature, Studia Philologica Buddhica, The International Institute for Buddhist Studies, Tokyo Japan, pp. 6–7Christopher Chapple (1990), Ecological Nonviolence and the Hindu Tradition, in Perspectives on Nonviolence, Springer, 978-1-4612-4458-5, pp. 168–77;L. Alsdorf (1962), Beiträge zur Geschichte von Vegetarismus und Rinderverehrung in Indien, Akademie der Wissenschaften und der Literatur, F. Steiner Wiesbaden, pp. 592–93
बौद्ध धर्म में
अंगूठाकार|बौद्ध ब्रह्मांड विज्ञान में भावचक्र और सासरा के छह क्षेत्रों को दिखाने वाला पारंपरिक तिब्बती थांगका।https://books.google.com/books?id=40i38mGQ6aAC&pg=PA61 The Words of My Perfect Teacher: A Complete Translation of a Classic Introduction to Tibetan Buddhism Patrul Rinpoche Dalai Lama Rowman Altamira 1998 978-0-7619-9027-7 61–99
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बौद्ध धर्म में संसार, जैसा कि जेफ विल्सन कहते हैं, “दुःखयुक्त जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म का अनादि-अनंत चक्र” है। इसे भुवनचक्र (भावचक्र) भी कहते हैं और पालि ग्रन्थों में पुनर्भव अथवा पुनर्जन्म के रूप में वर्णित किया गया है। इस चक्र से मुक्ति—निर्वाण—ही बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य है।Saṃsāra and Rebirth, in Buddhism Jeff Wilson Oxford University Press 2010 978-0195393521 10.1093/obo/9780195393521-0141https://books.google.com/books?id=kY5TAQAAQBAJ Buddhist Thought in India: Three Phases of Buddhist Philosophy Edward Conze Routledge 2013 978-1-134-54231-4 71, Quote: "Nirvana is the raison d’être of Buddhism, and its ultimate justification."Gethin 1998 119
बौद्ध धर्म में अन्य भारतीय धर्मों की तरह संसार को स्थायी माना जाता है। कर्म बौद्ध विचार में इस स्थायी संसार को चलाता है, पॉल विलियम्स कहते हैं, और "ज्ञान प्राप्त करने से कम, प्रत्येक पुनर्जन्म में एक व्यक्ति पैदा होता है और मर जाता है, अपने स्वयं के कर्म की पूरी तरह से अवैयक्तिक कारण प्रकृति के अनुसार कहीं और पुनर्जन्म होता है।"Williams 2002 74–75 सभी बौद्ध परंपराओं द्वारा स्वीकार किए गए चार महान सत्य का उद्देश्य इस सासरा से संबंधित पुनः होने (पुनर्जन्म और पीड़ितों के संबंधित चक्र) को समाप्त करना है।Paul Williams Anthony Tribe Alexander Wynne 2012 30–42Robert Buswell Jr. Donald Lopez Jr. 2013 304–05https://books.google.com/books?id=P_lmCgAAQBAJ A Companion to Buddhist Philosophy Peter Harvey John Wiley & Sons 2015 978-1-119-14466-3 Steven M. Emmanuel 26–44 Quote: "the first features described as painful [dukkha] in the above DCPS [Dhamma-cakka-pavatana Sutta in Vinaya Pitaka] quote are basic biological aspects of being alive, each of which can be traumatic. The dukkha of these is compounded by the rebirth perspective of Buddhism, for this involves repeated re-birth, re-aging, re-sickness, and re-death."
जैन की भाँति बौद्ध धर्म ने भी अपने संसार-सिद्धांत का विकास किया, जिसमें पुनर्जन्म और पुनर्मृत्यु के यांत्रिक विवरण समय के साथ विस्तृत हुए। प्रारंभिक बौद्ध परंपराओं में संसार का वर्णन पाँच लोकों द्वारा किया गया: नरक (निरय), भूत (पेत), पशु (तिर्यञ्च), मानव (मनुष्य) और देव (स्वर्गलोक)। बाद के ग्रंथों में छह लोकों की संख्या हो गई, जिसमें असुर (दैत्य) भी सम्मिलित हुआ। “पेत लोक, देव लोक, निरय लोक” क्रमशः अनेक समकालीन बौद्ध परंपराओं में क्रमशः अनुष्ठान, साहित्य एवं नैतिक आयामों को निरूपित करते हैं। https://books.google.com/books?id=_PrloTKuAjwC Buddhism: The Illustrated Guide Kevin Trainor Oxford University Press 2004 978-0-19-517398-7 62–63; Quote: "Buddhist doctrine holds that until they realize nirvana, beings are bound to undergo rebirth and redeath due to their having acted out of ignorance and desire, thereby producing the seeds of karma".
बौद्ध धर्म में संसार में ये छह-छह दिव्य, असुर, मानव, पशु, भूत और नरक लोक अन्तःसङ्गठित माने गए हैं, जहाँ प्रत्येक जीव अपनी अज्ञानता, तृष्णा तथा कर्म-परिणामों के कारण बारम्बार पुनर्जन्म लेता है। निर्वाण को इस पुनर्जन्म-चक्र से मुक्ति ही माना गया है, और बौद्ध ग्रंथों में निर्वाह्य मृत्यु (अमृतता) तथा निर्वाण को समरूपी माना गया है। https://books.google.com/books?id=d5pshUYiUVwC Nirvana: Concept, Imagery, Narrative Steven Collins 2010 Cambridge University Press 978-0-521-88198-2 38https://books.google.com/books?id=O3ecE9j3qXsC Rationality and Mind in Early Buddhism Frank J. Hoffman Motilal Banarsidass 2002 978-81-208-1927-6 103–06
सिख धर्म में
सिख धर्म ने संसार, कर्म और काल की चक्रीयता की अवधारणा को अपनाया है। पन्द्रहवीं सदी में स्थापित सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव ने प्राचीन भारतीय धर्मों की चक्रीय काल-धारणा को अंगीकार किया। किन्तु सिख धर्म में संसार की अवधारणा कई महत्वपूर्ण भिन्नताएँ प्रस्तुत करती है। सिखों के अनुसार मोक्ष केवल ईश्वर की कृपा से ही सम्भव है, और मुक्ति का मार्ग एकेश्वर भक्ति (एक ही ईश्वर की आराधना) है। https://books.google.com/books?id=Jn_jBAAAQBAJ Sikhism: A Guide for the Perplexed Arvind-Pal Singh Mandair Bloomsbury Academic 2013 978-1-4411-5366-1 145–46, 181, 220https://books.google.com/books?id=gqIbJz7vMn0C The Encyclopedia of Sikhism H. S. Singha Hemkunt Press 2000 978-81-7010-301-1 68, 80
सिख धर्म, प्राचीन तीनों भारतीय परंपराओं की भाँति, शरीर को नश्वर मानता है, पुनर्जन्म के चक्र को सत्य मानता है तथा प्रत्येक पुनर्जन्म के साथ दुःख भी जुड़ा हुआ मानता है। किन्तु जैन धर्म की तरह तपस्या को मार्ग नहीं मानता; सिख धर्म सामाजिक सहभागिता एवं गृहस्थ जीवन को महत्व देता है। यहाँ मोक्ष की प्राप्ति के लिए ईश्वर की भक्ति एवं उस पर पूर्ण विश्वास आवश्यक माना गया है, तथा संसार के चक्र से विशुद्ध भक्ति एवं गुरु ग्रन्थ साहिब की शिक्षाओं के माध्यम से ही मुक्ति सम्भव है। https://books.google.com/books?id=7YwNAwAAQBAJ The Oxford Handbook of Sikh Studies Pashaura Singh Louis E. Fenech Oxford University Press 2014 978-0-19-100411-7 230–31
यह भी देखें
पुनर्जन्म (बौद्ध धर्म)
पुनरुत्थान
संदर्भ
उद्धरण
स्रोत
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आगे पढ़ें (अंग्रेज़ी में)
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बाहरी लिंक
पुनर्जन्मः एक सरल व्याख्या
द व्हील ऑफ लाइफ, सी. जॉर्ज बोएरी, शिप्पेनसबर्ग विश्वविद्यालय
सासरा और पुनर्जन्म, बौद्ध धर्म, ऑक्सफोर्ड ग्रंथ सूची
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