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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

नाथद्वारा शैली

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right|thumb|300px नाथद्वारा चित्रकारी राजस्थान राजसमंद जिले के नाथद्वारा में विकसित चित्रकारी की एक परम्परा है। इसकी कई उपशैलियाँ हैं जिनमें पिछवाई चित्रकला सबसे लोकप्रिय है। पिछवाई जटिल चित्र हैं जिनमें भगवान कृष्ण को चित्रित करते हैं। पिछवाई मुख्य रूप से ठाकुरजी के पीछे लगाई जाती है। उत्पत्ति और क्षेत्र नाथद्वारा शैली, चित्रकला के मेवाड़ शैली की ही एक उपशैली है। इसे 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में लघु चित्रों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शैली के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि श्रीनाथजी के मंदिर ने शहर में कला गतिविधियों को बढ़ावा दिया है। यह दर्ज किया गया है कि औरंगजेब के उत्पीड़न से बचने के लिए, श्रीनाथजी की छवि (कृष्ण की एक बाल छवि) 1670 में मथुरा के गोस्वामी पुजारियों द्वारा नाथद्वारा में लगायी गयी थी। इसके बाद, प्रसिद्ध आचार्य गोपीनाथजी समेत कई कलाकार धार्मिक उत्साह से प्रेरित हुए और श्रीनाथजी के चित्र बनाए। कृष्ण को विभिन्न मुद्राओं और हावभाव में कपड़े या कागज पर आमतौर पर पाए जाने वाले पोशाक में दिखाया जाता है। पिछवाई चित्रकला एक बड़े से कपड़े पर कलाकार द्वारा कडप लगाकर उसे सुखाकर फिर उस पर चित्र बनाया जाता है। इसमें प्रमुख रूप से प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है जो मुख्य रूप से पेड़-पौधों से प्राप्त होते हैं। इसके अलावा शुद्ध सोने-चांदी का उपयोग किया जाता है। पिछवाई को विभिन्न विषयों पर बनाया जाता है। चित्र का मूल्य कलाकार की मेहनत, उपयोग में आने वाले रंग, सोने व चांदी की कीमत आदि के साथ पिछवाई के आकार पर निर्भर होता है। पिछवाई 15 से 20 दिन में बन जाती है। पिछवाई बनने के बाद अन्त में इस पर घिसाई की जाती है जिससे सोना-चांदी उभरकर दिखाई देता है और पिछवाई की चमक दुगनी हो जाती है। दो से तीन कलाकार साथ में मिलकर एक पिछवाई को तैयार करते हैं। पिछवाई विभिन्न आकार की बनाई जाती है। श्रेणी:नाथद्वारा श्रेणी:राजस्थान की कलाएँ श्रेणी:राजसमन्द ज़िला