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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

वासवदत्ता

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स्वप्नवासवदत्ता इससे भिन्न नाटक है। right|thumb|350px|राजशेखरन परमेश्वरन द्वारा तैलचित्रित वासवदत्ता वासवदत्ता एक अलंकारिक संस्कृत नाटक (आख्यायिका) है। वासवदत्ता नामक राजकुमारी इसकी प्रमुख पात्र है। इसके रचयिता सुबन्धु हैं। सुबन्धु के बारे में ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है किन्तु विद्वान मानसिंह ने पता लगाया है कि सुबन्धु गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम (414-455) और स्कन्दगुप्त (455-467) के दरबार में थे। कथानक इस काव्य का कथानक बहुत ही साधारण है। राजा चिन्तामणि के पुत्र युवराज कन्दर्पकेतु ने स्वप्न में एक अति सुन्दर युवती को देखा और उसके सौन्दर्य से इतना आकृष्ट हुआ कि राजकुमारी (वासवदत्ता) को ढूँढ़ने के लिए अपनी राजधानी से चल पड़ा। अपने मित्र मकरन्द के साथ वह विन्ध्य प्रदेश में पहुंचा। रात्रि में उसने एक शुक-दम्पत्ति के वार्तालाप को सुना और उसे ज्ञात हुआ कि उसके स्वप्न की राजकुमारी पाटलिपुत्र के राजा शृंगार-शेखर की पुत्री वासवदत्ता है और वह भी उससे (कन्दर्पकेतु से) प्रेम करती है और उसी को ढूढ़ने के लिए उसने तमालिका नाम की मैना को भेजा है। पक्षी से निर्दिष्ट दोनों प्रेमी-प्रेमिका पाटलिपुत्र में मिले। चूंकि वासवदत्ता के पिता ने उसका विवाह किसी विद्याधर से निश्चित कर रखा था, इसलिए दोनों ने अज्ञात पलायन का निश्चय किया। एक मायावी घोड़े से विन्ध्यपर्वत में पहुँचे। कंदर्पकेतु अभी सो ही रहा था कि वासवदत्ता भ्रमण के लिए वन में गई जहाँ किरातों के दो गणों ने उसका पीछा किया। किरातों के दोनों गण वासवदत्ता को प्राप्त करने के लिए आपस में झगड़ पड़े। वासवदत्ता भाग निकली और उसे एक आश्रम के बीच से निकलना पड़ा जहाँ संन्यासी ने उसे शाप दिया और वह पत्थर में परिवर्तित हो गई। निराश हुए कंदर्पकेतु ने आत्महत्या करनी चाही परन्तु एक आकाश-ध्वनि ने इसका निवर्तन किया। अन्त में वह आश्रम में पहुँचा और उसके स्पर्श से राजकुमारी पुनः जीवित हो उठे। यद्यपि कथानक बहुत ही छोटा है तथापि लेखक की यह स्वकल्पित कृति है। इसका साम्य नहीं है। वार्तालाप करते हुए पक्षी, जादू के घोड़े, संन्यासियों का शाप एवं आकाशध्वनियां इत्यादि कई विषयों को लेखक ने प्रस्तावित किया है जो साधारणतः भारतीय लोक साहित्य में पाया जाता है। लेखक का उद्देश्य अपनी अलंकार-प्रतिभा का प्रदर्शन करना था न कि उपन्यास लिखने की शक्ति का। जैसा कि डॉ॰ सुशील कुमार दे का कहना है : कथा की रोचकता घटनाओं में न होकर प्रेमियों के वैयक्तिक सौन्दर्य के चित्रण, उसकी उदारहृदयता, पारस्परिक निरतिशय अनुराग, इच्छापूर्ति का बाधक दुर्भाग्य, खण्डित-प्रेम की वेदना एवं सब परीक्षाओं और कठिनाइयों में भी मिलन तक प्रेम की सुरक्षा में ही होती है। काव्यगत विशेषताएँ वासवदत्ता संस्कृत काव्यशास्त्रियों से अभिहित गौड़ी शैली में लिखी गई है। गौड़ी का लक्षण विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में ‘‘श्लिप्ट शब्दयोजना, कठोरध्वनि वाले शब्दों का प्रयोग एवं समास बहुलता’’ दिया है। सुबन्धु ने अपनी रचना को कई साहित्यक अलंकारों से विभूषित किया है जिनमें से श्लेष प्रधान हैं। सुबन्धु का स्वयं कहना है कि उसका काव्य : प्रत्यक्षरश्लेषमयप्रबन्धविन्यासवैदग्ध्यनिधिः। (प्रत्येक अक्षर में श्लेष होने के कारण वैदग्ध्य प्रतिभा की निधि है।) वस्तुतः श्लेष को प्रस्तुत करने का उद्देश्य वक्रोक्ति की शोभा बढ़ाना है। उदाहरणतः एक युवती के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए सुबन्धु कहते हैं : वानरसेनामिव सुग्रीवांगदोपशोभिताम्। अर्थात् वानरों की सेना के समान सुग्रीव (युवतीपक्ष में सुन्दरग्रीव) और अंगद (युवतीपक्ष में अंगद नामक आभूषण विशेष) से सुशोभित थी। श्लेष के पश्चात् विरोधाभास (विरोध के समान प्रतीति) अलंकार का प्रयोग आधिक्य से पाया जाता है। विरोधाभास में श्लेष की सहायता से वास्तविक अर्थ की प्रतीति होती है। उदाहरतः ‘अग्रहेणापि काव्यजीवज्ञेन’। अर्थात् यद्यपि वह ‘ग्रह’ नहीं था तो भी काव्य शुक्र (जीव) बुध का ज्ञाता था। इस विरोधाभास का परिहार इस अर्थ से होता है : यद्यपि वह चोरी इत्यादि से मुक्त था तो भी काव्य के सार को जानने में निष्णात था। परिसंख्या, मालादीपक, उत्प्रेक्षा, प्रौढ़ोक्ति, अतिशयोक्ति तथा काव्य-लिंग आदि दूसरे अलंकारों का भी सुबन्धु ने प्रयोग किया है। शब्दालंकारों में से अनुप्रास एवं यमक का प्रयोग किया गया है। अनुप्रास का उदाहरण दृष्टव्य है : ‘मदकलकलहंससरसरसितोदभ्रान्तम्’’ अथवा ‘‘उपकूलस×जातनलिनिकु×जपुंजितकुलायकुक्कुट घटद्यूत्कारभैरवातिशयम्’’ लगभग समान रूप से ही प्रयुक्त यमक का उदाहरण इस प्रकार है : आनन्दोलितकुसुमकेसरे केसररेणुमुषि रणितमधुरमणीनां रमणीनां सिकचकुमुदाकारे मुदाकारे। पाश्चात्य आलोचक डाक्टर ग्रे ने वासवदत्ता के बारे में कहा है : विलोल-दीर्घ समासों में वस्तुतः रमणीयता है एवं अनुप्रासों में अपना स्वतः का ललित संगीत। श्लेषों में सुश्लिष्ट संक्षिप्तता है। यद्यपि श्लेषों के द्वारा दो या दो से अधिक दुरूह अर्थों को प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया गया है तथापि वे दोनों पक्षों में घटने वाले वास्तविक रत्न हैं। सुबन्धु द्वारा किये गये वर्णन अधिक प्रशंसनीय है परन्तु उनके आधिक्य से प्रयुक्त होने के कारण कभी-कभी उद्वेजक से प्रतीत होते हैं। सम्पूर्ण आख्यान का अधिकतम भाग ये वर्णन ही हैं और कथानक इनके नीचे लुप्तप्राय हो जाते हैं। पर्वत, वन, नदियों अथवा नायिका आदि का भी वर्णन क्यों न हो उनके सर्वतोमुखी बाहुल्य के होने पर भी, सौन्दर्य एवं संगति का नितान्त अभाव है। शून्यबिन्दु गणित के इतिहास की दृष्टि से यह नाटक इस कारण महत्वपूर्ण है कि इसमें सुबन्धु ने "शून्यबिन्दु" शब्द का प्रयोग किया है, जो दर्शाता है कि (उनके) पहले से ही शून्य को एक बिन्दु के रूप में दर्शाया जाता रहा होगा। शून्य के स्वरूप (आकार) के विषय में ऐसा उल्लेख सबसे पहली बार इसी ग्रन्थ में मिलता है। विश्वं गणयतो विधातुः शशिकठिनीखण्डेन तमोमषीश्यामेऽजिन इव वियति संसारस्यातिशून्यत्वात् शून्यबिन्दव इव विततास् तारा व्यराजन्तेति। अर्थ - विधाता विश्व की गणना करते हैं। उनके पास चाँदरूपी सुधाखण्ड है। अन्धकाररूपी स्याही से काला आकाशरूपी मृगचर्म है। गणना करते हुए विधाता को लगता है कि संसार शून्य है। इसमें कुछ नहीं रखा। तब वे सुधाखण्ड की मदद से मृगचर्म पर तारों के रूप में शून्यबिन्दु बना देते हैं। वही तारे उस कालविशेष में प्रकाशित हो रहे थे। सन्दर्भ इन्हें भी देखें सुबन्धु संस्कृत साहित्य कथासरित्सागर भारतीय काव्यशास्त्र श्लेष शून्य बाहरी कड़ियाँ वासवदत्ता (संस्कृत विकिस्रोत) Vasavadatta: A Sanskrit Romance by Subandhu. श्रेणी:पौराणिक चरित्र श्रेणी:कथा सरित्सागर