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गोरखा युद्ध
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{{Infobox military conflict
| conflict = एंग्लो-नेपाली युद्ध
| image = 300px
| image_size = 300px
| caption = <small>गोरखा के एक महान लड़ाकूसरदार भक्ति थापा (पिलें वस्त्रमें) ७४ वर्षके उम्र में लड़ते हुए</small>
| date = 1 नवंबर 1814 – 4 मार्च 1816
| location = नेपाल राज्य
| result = ब्रिटिश विजय
सुगौली की संधि
| territory = नेपाल ने विवादित तराई पर अपने सभी दावों का परित्याग कर दिया तथा काली नदी के पश्चिम और सतलुज नदी तक के अपने विजित क्षेत्रों को ब्रिटिशों को सौंप दिया।
| combatant1 = Flag of the British East India Company (1801).svg ईस्ट इंडिया कंपनीसमर्थन में:25px पटियाला राज्य
| combatant2 = Nepal old नेपाल राज्य
| commander1 = Flag of the British East India Company (1801).svg फ्रांसिस हेस्टिंग्स
Flag of the British East India Company (1801).svg डेविड ऑक्टरलोनी
Flag of the British East India Company (1801).svg रोलो गिलेस्पी
Flag of the British East India Company (1801).svg बेनेट मार्ले
Flag of the British East India Company (1801).svg जॉन वुड
| commander2 = Nepal old गिर्वाण युद्ध विक्रम शाह
Nepal old भीमसेन थापा
Nepal old अमर सिंह थापा (बड़ा)note इन्हें इसी नाम वाले गोरखा युद्ध में गोरखाली सेना के अधिक प्रसिद्ध सेनापति से भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। दोनों अमर सिंहों को बड़ा और सानु (छोटा) उपनामों के आधार पर अलग किया जाता है।
Nepal old उजिर सिंह थापा
Nepal old रणबीर सिंह थापा
Nepal old बख्तावर सिंह थापा
Nepal old रणजोर सिंह थापा
Nepal old दलभंजन पांडेhttp://www.bilder-aus-nepal.de/Pages/Philatelie/ANGLO-NEPALESE-1816.html Britisch-Nepalischer Krieg 1814-1816 www.bilder-aus-nepal.de 20 July 2020 10 April 2021 https://web.archive.org/web/20210410162908/http://www.bilder-aus-nepal.de/Pages/Philatelie/ANGLO-NEPALESE-1816.html livePradhan 2012 50
| strength1 = पहला अभियान:
22,000 सैनिक और 60 तोपेंhttps://books.google.com/books?id=L-X-XYB_ZkIC&dq=gorkha+war&pg=PA492 Historical Dictionary of the British Empire: A-J, Volume 1; Volume 6, pp. 493 978-0-313-29367-2 14 March 2023 27 April 2023 https://web.archive.org/web/20230427224313/https://books.google.com/books?id=L-X-XYB_ZkIC&dq=gorkha+war&pg=PA492 live Olson James Stuart Shadle Robert 1996 Greenwood Press https://books.google.com/books?id=HvE_Pa_ZlfsC&dq=Gorkha+War&pg=PA156 The Victorians at war, pp.155 978-1-57607-925-6 14 March 2023 11 April 2023 https://web.archive.org/web/20230411132130/https://books.google.com/books?id=HvE_Pa_ZlfsC&dq=Gorkha+War&pg=PA156 live Raugh Harold E. 25 October 2004 Bloomsbury Academic
दूसरा अभियान:
17,000 सैनिकNaravane 2006 189
| strength2 = 11,000 से कुछ अधिक सैनिकSmith 1852 218
}}एंग्लो-नेपाल युद्धसन् 1814 से 1816 (जिसे गोरखा युद्ध भी कहा जाता है) नेपाल अधिराज्य और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच लड़ा गया था। यह युद्ध सुगौली की संधि के साथ समाप्त हुआ, जिसके परिणामस्वरूप नेपाल को अपने लगभग एक-तिहाई भू-भाग से हाथ धोना पड़ा और इन क्षेत्रों का एक बड़ा हिस्सा ब्रिटिश शासन के अधीन चला गया।
इस युद्ध के दौरान अमर सिंह थापा, बलभद्र कुँवर और भक्ति थापा सहित नेपाली सैन्य कमांडरों ने उल्लेखनीय साहस, पराक्रम और सैन्य नेतृत्व का प्रदर्शन किया। उनके युद्ध कौशल और वीरता की चर्चा ब्रिटिश अधिकारियों तथा तत्कालीन ब्रिटिश क्षेत्रों में भी हुई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
शताब्दियों तक काठमांडू उपत्यका में स्थित तीन प्रमुख राज्यों—काठमांडू, पाटन और भादगाउँ (वर्तमान भक्तपुर)—के बीच आपसी संघर्ष चलता रहा। इन राज्यों के शासक बाहरी खतरों की अपेक्षा आपसी प्रतिद्वंद्विता और संघर्षों में अधिक उलझे रहे। इसी राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए सन् 1769 में गोरखा राज्य के राजा पृथ्वीनारायण शाह ने काठमांडू उपत्यका पर विजय प्राप्त की। इस विजय के परिणामस्वरूप उपत्यका गोरखा राज्य के अधीन आ गई और आगे चलकर आधुनिक नेपाल के एकीकरण की प्रक्रिया को आधार मिला।
सन् 1767 में काठमांडू उपत्यका के तत्कालीन शासकों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से गोरखा राज्य के विरुद्ध सहायता मांगी। इसके बाद कप्तान जॉर्ज किनलॉक के नेतृत्व में लगभग 2,500 सैनिकों का एक ब्रिटिश सैन्य दल नेपाल भेजा गया। अपर्याप्त तैयारी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह अभियान सफल नहीं हो सका और गोरखा सेना ने ब्रिटिश सैन्य दल को पराजित कर दिया।
काठमांडू उपत्यका पर विजय के बाद गोरखा राज्य ने अपने क्षेत्रीय विस्तार की नीति को और आगे बढ़ाया। सन् 1773 में गोरखा सेना ने पूर्वी नेपाल के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। इसके बाद सन् 1788 में उसने सिक्किम के पश्चिमी भाग में भी अपना प्रभाव और अधिकार स्थापित किया। पश्चिम की ओर गोरखा राज्य का विस्तार सन् 1790 तक महाकाली नदी तक हो गया। इसके पश्चात कुमाऊँ क्षेत्र तथा उसकी राजधानी अल्मोड़ा सहित पश्चिमी क्षेत्रों को भी गोरखा राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।
लडाई
प्रथम अभियान
प्रारम्भिक ब्रिटिश अभियान सतलज से कोशी तक 1,500 km से अधिक लंबी सीमा पर दो मोर्चों से किया गया सैन्य अभियान था। पूर्वी मोर्चे पर मेजर-जनरल बेनेट मार्ली और मेजर-जनरल जॉन सुलिवन वुड ने तराई क्षेत्र को पार करते हुए काठमांडू उपत्यका के केंद्र की ओर अपने-अपने सैन्य स्तंभों का नेतृत्व किया। पश्चिमी मोर्चे पर मेजर-जनरल रोलो गिलेस्पी और कर्नल डेविड ऑक्टरलोनी ने सैन्य स्तंभों की कमान संभाली। इन ब्रिटिश सैन्य स्तंभों का सामना अमरसिंह थापा के नेतृत्व वाली नेपाली सेना से हुआ।
द्वितीय अभियान प्रथम आंग्ल-नेपाल युद्ध' मुख्यतः सीमा विवादों और क्षेत्रीय विस्तार को लेकर उत्पन्न हुआ था। यह युद्ध सन् 1814 में शुरू हुआ और 1816 में सुगौली की संधि के साथ समाप्त हुआ। इस संधि के प्रावधानों के अनुसार काठमांडू में एक ब्रिटिश रेजिडेंसी की स्थापना की गई।
सन्धिवार्ता
नेपाली सैनिकों ने बहादुरी से युद्ध किया, किंतु संसाधनों और सैनिक संख्या के मामले में अधिक सुसज्जित ब्रिटिश सेना के साथ लंबे और भीषण संघर्ष में नेपाल निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सका। सेनापति काजी अमरसिंह थापा के आत्मसमर्पण के बाद नेपाल की युद्ध में विजय की संभावना और कमजोर हो गई। अंततः नेपाल सरकार को सन्धि के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा।
इसके बाद सन्धि के लिए वार्ता आरम्भ हुई। नेपाल सरकार की ओर से गजराज मिश्र और चन्द्रशेखर उपाध्याय ने तथा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की ओर से कर्नल ब्रैडशॉ ने सन्धि-वार्ता में भाग लिया। वार्ता के दौरान कम्पनी सरकार के प्रतिनिधि ने नेपाल के सम्पूर्ण तराई क्षेत्र पर कम्पनी सरकार का अधिकार होने की शर्त रखी। इस शर्त पर सहमति न बन पाने के कारण पहली वार्ता असफल हो गई और दोनों पक्षों के प्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों में लौट गए तथा पुनः युद्ध की तैयारियों में लग गए।
बाद में कम्पनी सरकार के अधिकारियों ने नेपाल के सम्पूर्ण तराई क्षेत्र पर अधिकार करने की अपनी पूर्व मांग को छोड़कर कोशी और गंडकी के बीच के भूभाग तथा कुछ अन्य क्षेत्रों को अपने अधीन रखने का प्रस्ताव रखा। इसके बदले कम्पनी सरकार ने नेपाल सरकार को दो लाख रुपये देने की पेशकश की। इस प्रस्ताव के आधार पर पुनः सन्धि-वार्ता आरम्भ हुई। सन्धि के प्रस्ताव पर मेजर ब्रैडशॉ ने 2 दिसम्बर 1815 को हस्ताक्षर किए, जबकि नेपाली प्रतिनिधियों ने 28 नवम्बर 1815 को ही इस पर हस्ताक्षर कर दिए थे।
सन्धि की अंतिम धारा के अनुसार नेपाल सरकार को पन्द्रह दिनों के भीतर तथा ब्रिटिश गवर्नर-जनरल को बीस दिनों के भीतर सन्धि की स्वीकृति प्रदान करनी थी, अथवा यथासंभव उससे पहले इसकी पुष्टि करनी थी। निर्धारित अवधि में नेपाल सरकार की स्वीकृति प्राप्त नहीं हो सकी। इसके बाद नेपाल दरबार में ब्रिटिश सरकार द्वारा भेजी गई सन्धि को स्वीकार करने या अस्वीकार करने को लेकर व्यापक चर्चा हुई। अमरसिंह थापा और रणजोर थापा सहित कुछ सैन्य अधिकारियों का मत था कि पुनः युद्ध किया जाना चाहिए। उनका अनुमान था कि वर्षा ऋतु आरम्भ होने के बाद ब्रिटिश सेना को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पीछे हटने के लिए विवश होना पड़ सकता है।
परिणाम
सुगौली सन्धि
thumb|261x261px|सुगौली सन्धि के परिणामस्वरूप सीमा में आया परिवर्तन
सुगौली सन्धि का अनुमोदन 24 फरवरी 1816 को किया गया था। सन्धि के अनुसार नेपाल ने सिक्किम (दार्जिलिंग सहित), कुमाऊँ और गढ़वाल तथा पश्चिमी तराई के कुछ क्षेत्रों पर अपना अधिकार खो दिया। मेची नदी नेपाल की नई पूर्वी सीमा और महाकाली नदी उसकी पश्चिमी सीमा निर्धारित हुई। तराई क्षेत्र से होने वाली राजस्व-हानि की क्षतिपूर्ति के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने नेपाल सरकार को वार्षिक दो लाख रुपये देने पर सहमति व्यक्त की। इसके अतिरिक्त, काठमांडू में एक ब्रिटिश रेजिडेंसी स्थापित की गई। नेपाल के शासकों ने ब्रिटिश रेजिडेंट को अपेक्षाकृत सीमित दायरे में रखने में सफलता प्राप्त की, जिसके कारण ब्रिटिश रेजिडेंसी का प्रभाव तत्काल अपेक्षा के अनुरूप व्यापक नहीं हो सका।
तराई के कुछ क्षेत्रों का प्रशासन ब्रिटिशों के लिए कठिन साबित हुआ। परिणामस्वरूप, इनमें से कुछ क्षेत्र बाद में सन् 1816 में नेपाल को वापस कर दिए गए और उनके बदले किए जाने वाले वार्षिक भुगतान को समाप्त कर दिया गया। हालांकि, आंग्ल-नेपाल युद्ध की समाप्ति के बाद भी दोनों राज्यों के बीच सीमा संबंधी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। नेपाल और अवध के बीच सीमा का अंतिम समायोजन सन् 1830 तक नहीं हो सका और नेपाल तथा ब्रिटिश-अधिकृत क्षेत्रों के बीच सीमा संबंधी विवाद कई वर्षों तक दोनों सरकारों के बीच चर्चा का विषय बने रहे।
गोरखा भर्ती
thumb|300px|खुकुरीनेपाली लोगों का पारंपरिक हथियार
डेविड ऑक्टरलोनी और राजनीतिक एजेंट विलियम फ्रेजर ने ब्रिटिश सेवा में नेपाली सैनिकों की सैन्य क्षमता को शीघ्र ही पहचाना। युद्ध के दौरान ब्रिटिश पक्ष ने नेपाली सेना से अलग हुए सैनिकों को अपने पक्ष में संगठित कर अनियमित सैनिक बल के रूप में उपयोग करने में रुचि दिखाई। उनकी सैन्य क्षमता और निष्ठा पर विश्वास के आधार पर अप्रैल 1815 में इन सैनिकों को लेफ्टिनेंट रॉस के नेतृत्व में नासिरी बटालियन नामक एक बटालियन के रूप में संगठित करने का प्रस्ताव रखा गया।
स्रोत
Gould, Tony. Imperial Warriors – Britain and the Gurkhas'', 2000,Granta Books ISBN 1-86207-365-1
बाहरी कड़ियाँ
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