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411 समाचार
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महाद्वीपीय व्यवस्था

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right|300px|thumb|1812 ईसवी में फ्रांस का साम्राज्य #008000 प्रत्यक्ष प्रशासन #49C946 समर्थक राज्य #008066 महाद्वीपीय व्यवस्था महाद्वीपीय व्यवस्था (Continental System) या महाद्वीपीय नाकाबन्दी (Continental Blockade) नेपोलियन युद्धों के समय ग्रेट ब्रिटेन विरुद्ध संघर्ष में नेपोलियन प्रथम की विदेश नीति थी। ब्रिटेन की सरकार ने 16 मई 1806 को फ्रेंच कोस्ट की नाकेबन्दी की थी। उसी के जवाब में नेपोलियन ने 21 नवम्बर 1806 को 'बर्लिन डिक्री' का ऐलान किया जिसके द्वारा ब्रिटेन के विरुद्ध बड़े पैमाने पर व्यापार-प्रतिबन्ध (embargo) लगा दिये गये। यह प्रतिबन्ध लगभग आधे समय ही प्रभावी था। इसका अन्त 11 अप्रैल 1814 को हुआ जब नेपोलियन ने पहली बार पदत्याग किया। इस प्रतिबन्ध से ब्रिटेन को कोई खास आर्थिक क्षति नहीं हुई। जब नेपोलियन को पता चला कि अधिकांश व्यापार स्पेन और रूस के रास्ते हो रहा है, तो उसने उन दोनों देशों पर आक्रमण कर दिया। परिचय नेपोलियन के साम्राज्यवादी विस्तार में सबसे बड़ी बाधा ब्रिटेन था और यूरोप में ब्रिटेन ही ऐसी शक्ति था जिसे नेपोलियन नहीं हरा सका था,क्योंकि ब्रिटेन की नौसैनिक शक्ति फ्रांस के मुकाबले अधिक श्रेष्ठ थी। अतः नेपोलियन ने इंग्लैण्ड को परास्त करने के लिए उसे आर्थिक दृष्टि से पंगु बना देने की नीति अपनाई। वस्तुतः उसने इंग्लैण्ड के विरूद्ध आर्थिक युद्ध का सहारा लिया और इसी क्रम में उसने महाद्वीपीय व्यवस्था को अपनाया। नेपोलियन अच्छी तरह जानता था कि सैन्य दृष्टि से इंग्लैण्ड को पराजित करना संभव नहीं क्योंकि इंग्लैण्ड की अपनी शक्ति तो उसके उन्नत उद्योगों में निहित थी। यदि इन उद्योगों के उत्पादित सामानों का यूरोपीय बाजार अवरूद्ध कर दिया जाए तो ये उद्योग स्वमेव बंद हो जायेंगे और वहाँ बेकारी की समस्या पैदा हो जायेगी। उसका मानना था कि व्यापार पर निर्भर इंग्लैण्ड की आर्थिक नाकाबंदी करने से वस्तुओं की कीमतें गिरेंगी और इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने लगेगी। दूसरी तरफ महाद्वीप को इंग्लैण्ड के लिए बंद करके इंग्लैण्ड को फ्रांस से खाद्य पदार्थ खरीदने को बाध्य कर उससे बहुमूल्य धातु (बुलियन) ले सकेगा। इससे इंग्लैण्ड की आर्थिक स्थित खराब हो जाएगी और फ्रांस उस पर विजय प्राप्त कर सकेगा। इस विचार के साथ नेपालियन ने 'बर्लिन आदेश', 'मिलान आदेश', 'फातबल्लों आदेश' द्वारा महाद्वीपीय व्यवस्था को लागू करने का प्रयास किया। इन आदेशों के जरिए उसने अपने अधीनस्थ राज्यों को इंग्लैण्ड से व्यापार करने की मनाही कर दी और यह भी स्पष्ट कर दिया कि जो राज्य या राजा इस आदेश का उल्लंघन कर इंग्लैण्ड के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष व्यापार करेंगे उनके खिलाफ युद्धजनित कार्यवाही की जाएगी। इंग्लैण्ड ने नेपालियन की महाद्वीपीय व्यवस्था का सामना करने के लिए ऑर्ड्र इन काउन्सिल (Order in Council) पास कर फ्रांस से व्यापारिक संबंध विच्छेद कर लिया तथा तटस्थ देशों को भी ऐसा करने का कहा। परिणाम महाद्वीपीय व्यवस्था अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में असफल रही। ब्रिटिश व्यापार को नष्ट करना इसका उद्देश्य था जो पूरा नहीं हो सका। इंग्लैण्ड की परेशानी से भी कठिन परेशानी स्वयं फ्रांस को झेलनी पड़ी। महाद्वीपीय व्यवस्था स्वयं नेपोलियन व यूरोप के लिए आत्मघाती हुई। इस योजना को लागू करने के लिए नेपोलियन ने अनेक देशों के खिलाफ कठोर कदम उठाए। फलतः वह घातक आक्रामक युद्धों में उलझता चला गया और उसके साम्राज्य का विघटन हुआ। वस्तुतः महाद्वीपीय व्यवस्था को सफल बनाने के लिए पुर्तगाल पर नियंत्रण आवश्यक था क्योंकि ब्रिटेन का माल पुर्तगाली समुद्र तटों से ही यूरोप में चोरी छिपे पहुँचाए जाते थे। पुर्तगाल पर नियंत्रण के लिए स्पेन के साथ युद्ध आवश्यक हो गया। उन दोनों जगहों पर नेपोलियन ने कब्जा तो कर लिया किन्तु फ्रांस के साधनों पर अत्यधिक दबाव बढ़ा और स्पेन के राष्ट्रवादी विस्फोट ने नेपोलियन के साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया और उसके पतन की राहें खोल दी। इसी संदर्भ में नेपोलियन ने कहा कि स्पेन के सैनिक घावों ने मुझे बर्बाद कर दिया। इस प्रकार महाद्वीपीय व्यवस्था इंग्लैंण्ड के लिए आर्थिक दृष्टिकोण से हानिकारक तो जरूर रहीं परन्तु उससे भी कहीं ज्यादा इसने अपने निर्माता को क्षति पहुंचाई और उसके पतन का मार्ग प्रशस्त किया। महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता के कारण (१) नेपोलियन के पास एक सक्षम नौसेना का अभाव था जिसके कारण वह इंग्लैण्ड के सामुद्रिक व्यापार की नाकेबंदी पूर्ण रूप से नहीं कर सका और तस्करी (Smuggling) को भी नहीं रोक पाया। (२) इस व्यवस्था से यूरोप में वस्तुओं का संकट पैदा हो गया व्यापारियों का व्यापार चौपट होने लगा। कारण था-फ्रांस के कारखानों का उतना विकसित नहीं हो पाना कि वे सभी वस्तुओं का उत्पादन कर सके और यूरोपीय जनता की आवश्यकता की पूर्ति हो सके। फलतः तस्कर व्यापार में वृद्धि हुई और तटस्थ राज्यों से चोरी छिपे माल पहुँचने लगा। (३) नेपोलियन ने महाद्वीपीय व्यवस्था की घोषणा करते हुए कहा था कि यदि यूरोपीय, देश इंग्लैण्ड की समुद्री निरंकुशता से बचना चाहते हैं तो सम्पूर्ण यूरोप को अस्थायी रूप से कष्ट सहना पड़ेगा। जब नेपोलियन स्वयं कुछ चीजों के व्यापार का लाइसेंस देने लगा और चुंगी लगाने लगा तो स्पष्ट हो गया कि परेशानी यूरोप को उठानी है फ्रांस को नहीं। नेपोलियन के वाणिज्यिक नियंत्रण के प्रति तुर्की, पुर्तगाल, स्पेन रूस, हॉलैण्ड में विरोध प्रदर्शन होने लगे। धीरे-धीरे इन देशों ने इंग्लैण्ड से अपने संबंध विकसित किए। (४) नेपोलियन इस बात को भूल गया कि यूरोप से बाहर ब्रिटेन के अनेक उपनिवेश स्थापित हैं और जब तक दुनिया भर में फैले उसके उपनिवेशों पर प्रतिबंध नहीं लगा दिया जाता है तब तक इस व्यवस्था के सफल होने की आशा करना व्यर्थ था। (५) इंग्लैण्ड में अन्न का अभाव था परन्तु नेपोलियन उसके धन को कम करने के लिए बराबर भारी मूल्य पर अन्न भेजता रहा। यदि इंग्लैण्ड में यह अन्न न पहुँचता तो वहाँ जनता भूख से त्रस्त हो उठती और संभवतः विवश होकर इंग्लैण्ड संधि करता। (६) नेपोलियन एक तानाशाह बनकर इसी नियम को अपने देश में तो लागू कर सकता था किन्तु दूसरे देशों पर ऐसे नियम को लागू करने के लिए अधिक समय तक दबाव बनाना संभव नहीं था। इन्हें भी देखें यूरोपीय व्यवस्था (युरोपियन कॉन्सर्ट) श्रेणी:आर्थिक युद्ध श्रेणी:राजनय