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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

राजपुताना

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thumb|right|250px| राजस्थान पहले राज्य/क्षेत्र/प्रदेश के रूप में जाना जाता था। 1909 का ब्रिटिशकालीन नक्शा thumb|right|250px|मौजूदा राजस्थान के ज़िलों का मानचित्र राजपूताना जिसे राजस्थान भी कहा जाता है। राजपूतों की राजनीतिक सत्ता आयी तथा ब्रिटिशकाल में यह राज्य/क्षेत्र/प्रदेश नाम से जाने जाना लगा।John Keay (2001). India: a history. Grove Press. pp. 231–232 इस प्रदेश का आधुनिक नाम राजस्थान है, जो उत्तर भारत के पश्चिमी भाग में अरावली की पहाड़ियों के दोनों ओर फैला हुआ है। इसका अधिकांश भाग मरुस्थल है। यहाँ वर्षा अत्यल्प और वह भी विभिन्न क्षेत्रों में असमान रूप से होती है। यह मुख्यत: वर्तमान राजस्थान राज्य की भूतपूर्व रियासतों का समूह है, जो भारत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। मीणा समाज राजस्थान का एक अहम हिस्सा है और यह जाति राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति है भौगोलिक स्थिति 3,43,328 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस इलाक़े के दो भौगोलिक खण्ड हैं, अरावली पर्वत श्रृंखला का पश्चिमोत्तर क्षेत्र-जो अनुपजाऊ व ज़्यादातर रेतीला है। इसमें थार मरुस्थल का एक हिस्सा शामिल है और पर्वत श्रृंखला का दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र-जो सामान्यत: ऊँचा तथा अधिक उपजाऊ है। इस प्रकार समस्त क्षेत्र एक ऐसे सघन अवरोध का निर्माण करता है, जिसमें उत्तर भारत के मैदान और प्रायद्वीपीय भारत के मुख्य पठार के मध्य स्थित पहाड़ी और पठारी क्षेत्र सम्मिलित हैं। राजस्थान का उदय राज्य/क्षेत्र/प्रदेश में 23 राज्य, एक सरदारी, एक जागीर और अजमेर-मेवाड़ का ब्रिटिश ज़िला शामिल थे। शासक राजकुमारों में अधिकांश राजपूत थे। ये राजपूताना के ऐतिहासिक क्षेत्र के राजपूत क्षत्रिय थे, जिन्होंने सातवीं शताब्दी में इस क्षेत्र में प्रवेश करना आरम्भ किया। जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, जयपुर और उदयपुर सबसे बड़े राज्य थे। 1947 में विभिन्न चरणों में इन राज्यों का एकीकरण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप राजस्थान राज्य अस्तित्व में आया। दक्षिण-पूर्व राजपूताना के कुछ पुराने क्षेत्र मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में और कुछ क्षेत्र अब गुजरात का हिस्सा हैं। इतिहास भारत में मुसलमानों का राज्य स्थापित होने के पूर्व राजस्थान में कई शक्तिशाली क्षत्रिय (राजपूत) जातियों के वंश शासन कर रहे थे और उनमें सबसे प्राचीन चालुक्य थे। इसके उपरान्त कन्नौज के राठौरों , अजमेर के चौहान राजपूत, अन्हिलवाड़ के सोलंकियों, मेवाड़ के गहलोतों या सिसोदियों और जयपुर के कछवाहों ने इस प्रदेश के भिन्न-भिन्न भागों में अपने राज्य स्थापित कर लिये। क्षत्रिय जातियों में फूट और परस्पर युद्धों के फलस्वरूप वे शक्तहीन हो गए। यद्यपि इनमें से अधिकांश ने बारहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में मुसलमान आक्रमणकारियों का वीरतापूर्वक सामना किया, राणा साँगा दिल्ली सल्तनत की सत्ता स्वीकार करने के बाद भी मुसलमानों की यह प्रभुसत्ता राजपूत शासकों को सदेव खटकती रही और जब कभी दिल्ली सल्तनत में दुर्बलता के लक्षण दृष्टिगत होते, वे अधीनता से मुक्त होने को प्रयत्नशील हो उठते। 1520 ई. में बाबर के नेतृत्व में मुग़लों के आक्रमण के समय राजपूताना दिल्ली के सुल्तानों के प्रभाव से मुक्त हो चला था और मेवाड़ के राणा संग्राम सिंह ने बाबर के दिल्ली पर अधिकार का विरोध किया। बयाना के युद्ध फरवरी 1527ई में राणा संगा ने बाबर को धूल चटाया 1527ई. में खानवा के युद्ध में बाबर ने विश्वासघात किया इधर राजपूताने की तलवार लड़ रही थी उधर बाबर ने तोपों का इस्तेमाल किया। इस युद्ध में तोपों से तलवारे लड़ी थी, शुरू में राणा की पकड़ बनी रही युद्ध पर बाद में एक तीर आकर राणा के सर पर लगा जिससे वो मूर्छित हो गए और राणा की पराजय हुई और मुग़लों ने दिल्ली के सुल्तानों का राजपूताने पर नाममात्र को बचा प्रभुत्व फिर से स्थापित कर लिया। मुग़लों की अधीनता मुग़ल इस पराजय के बाद भी राजपूतों का विरोध शान्त न हुआ। अकबर की राजनीति का प्रभाव इन पर अवश्य पड़ा और मेवाड़ के अतिरिक्त अन्य सभी राजपूत शासक मुग़लों की पराधीनता स्वीकार कर ली। औरंगज़ेब के सिंहासनारूढ़ होने तक राजपूताना पराधीन रहा। परन्तु औरंगज़ेब की धार्मिक असहिष्णुता की नीति के कारण दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। जिसमे दुर्गादास राठौड़ व महाराणा राज सिंह ने औरंगजेब को लोहे के चने चबवा दिए। बाद में एक समझौते के फलस्वरूप राजपूताने में शान्ति स्थापित हुई। अंग्रेज़ों का मुकाबला मुग़लों के पतन से भी राजपूताने में नया जोश आया इसके फलस्वरूप उन्होंने आजादी की पहली जंग में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, 1756 ई. के लगभग राजपूताना में मराठों का शक्ति विस्तार आरम्भ हो गया। इसे देखते हुए अंग्रेजो ने राजपूताना राइफल्स नामक रेजिमेंट का गठन किया जिन्होंने मराठी ताकतों का प्रतिकार किया और अपने राजपूताना को सुरक्षित बचाए रखा भारतीय संघ भारतीय गणतंत्र की स्थापना के उपरान्त कुछ राजपूत रियासतें मार्च, 1948 ई. में और कुछ एक वर्ष बाद भारतीय संघ में सम्मिलित हो गईं। इस प्रदेश का आधुनिक नाम राजस्थान और इसकी राजधानी जयपुर है। राजप्रमुख (अब राज्यपाल) का निवास तथा विधानसभा की बैठकें भी जयपुर में ही होती हैं। इन्हें भी देखें राजपूत मीणा टीका टिप्पणी और संदर्भ (पुस्तक 'भारत ज्ञानकोश') पृष्ठ संख्या-59 (पुस्तक 'भारतीय इतिहास कोश') पृष्ठ संख्या-400 संबंधित लेख श्रेणी:मध्यकालीन भारत का इतिहास श्रेणी:राजपूत साम्राज्य